घर की सांकल खोलता हुआ कवि हरपाल

बजरंग बिहारी   कविता जीवन का सृजनात्मक पुनर्कथन है। इस सृजन में यथार्थ, कल्पना, आकांक्षा, आशंका और संघर्ष के तत्व शामिल रहते हैं। रचनाकार अपनी प्रवृत्ति, समय के दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप इन तत्वों का अनुपात तय करता है। विचार जीवन से आगे बढ़े हुए होते हैं। जीवन की गति स्वाभाविक रूप से धीमी होती है। कवि भावों के लेप से विचार और जीवन में सामंजस्य बैठाने का प्रयास करता है। यह कवि के विवेक पर निर्भर करता है कि वह जीवन और विचार में किसे प्रमुखता दे। ऐसा…

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आक्रोश और साहित्य: बजरंग बिहारी तिवारी

आक्रोश पुराना शब्द है| पाणिनि के यहाँ (अष्टाध्यायी, 6.3.21) इसका प्रयोग मिलता है- ‘षष्ठया आक्रोशे’| इसका आशय है कि यदि भर्त्सना का भाव हो तो षष्ठी तत्पुरुष समास करने में विभक्ति का लोप नहीं होता| आक्रोश गम्यमान हो तो उत्तरपद रहते षष्ठी विभक्ति का अलुक् होता है जैसे ‘चौरस्य कुलम्’ चोर का खानदान, और अगर आक्रोश गम्यमान न होकर प्रतीत हो अर्थात् सामान्य अर्थ में हो तो अलुक् नहीं होता जैसे ‘ब्राह्मण कुलम्’| पुराने कोशों में ‘नामलिंगानुशासन’ जिसका प्रचलित नाम ‘अमरकोश’ है में आक्रोश दोष देने के अर्थ में है…

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‘ प्रेमकथा एहि भांति बिचारहु ’

  (संत वैलेन्टाइन की तरह प्रेम के पक्षधर मगर कई मामलों में उनसे भिन्न संत रविदास थे। उनकी  रचना जगत में प्रेम एक विराट भाव है. रैदास की प्रेम परिकल्पना व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित है . प्रेम दिवस पर संत रविदास के प्रेम के वैशिष्ट्य को व्याख्यायित करता बजरंग बिहारी तिवारी का यह निबन्ध पढ़िए)   प्रेम की सामर्थ्य देखनी हो तो संतों का स्मरण करना चाहिए| संतों में विशेषकर रविदास का. प्रेम की ऐसी बहुआयामी संकल्पना समय से बहुत आगे है. उनके समकालीनों में वैसा कोई नहीं दिखता. आधुनिक आलोचक…

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