गौरी लंकेश को अपने विचारों में जिंदा रखें

यह मातम मनाने का वक्त नहीं है. लंकेश के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम लंकेश की मुहिम को आगे बढ़ाएँ. ‘फेक न्यूज फैक्ट्री’ के षड़यंत्र को लगातार बेनकाब करते रहें. तार्किकता, वैज्ञानिकता, समाजवाद, लोकतंत्र, भाईचारे के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करते रहें. लंकेश को अपने विचारों में जिंदा रखें.

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सत्ता संपोषित मौजूदा फासीवादी उन्माद प्रेमचंद की विरासत के लिए सबसे बड़ा खतरा:डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन

लोकतंत्र, संविधान और साझी संस्कृति के नेस्तनाबूद करने की हो रही है गहरी साजिश-कल्याण भारती प्रेमचंद के सपनों के भारत से ही बचेगी हमारी साझी संस्कृति-डॉ. राम बाबू आर्य 31 जुलाई, दरभंगा । आज स्थानीय लोहिया चरण सिंह कॉलेज के सभागार में “मौजूदा फासीवाद उन्माद और प्रेमचंद की विरासत” विषय पर संगोष्ठी आयोजित कर जन संस्कृति मंच, दरभंगा द्वारा महान कथाकार प्रेमचंद की 138वीं जयंती मनाई गई । इस अवसर पर बोलते हुए जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सह ‘समकालीन चुनौती’ के संपादक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि “हमारे…

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प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था : प्रो. रविभूषण

प्रेमचंद ने आज से काफी पहले ही आवारा पूंजी के ग्लोबल चरित्र और उसके साम्राज्यवादी गठजोड़ की शिनाख्त कर ली थी . उन्होंने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था.

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फासीवाद का परीक्षण पूरे सवाब पर है

“अभी पूरी दुनिया में क्या चल रहा है इसे समझने के लिए हमें दो चीजों पर गौर करने की जरूरत है। पहला यह है कि हम परीक्षण के दौर में हैं। दूसरा यह है कि जो चल रहा है वह फासीवाद है – एक ऐसा शब्द जिसे सचमुच बहुत सावधानी से इस्तेमाल करने की जरूरत है, लेकिन जब यह क्षितिज पर इतना साफ दिखाई दे रहा है तो इसका प्रयोग करने से परहेज भी नहीं होना चाहिए. ” फासीवाद के बाद ” के वक्त को भूल जाइए – हम जिस समय में जी रहे हैं वह पूर्व-फासीवाद का दौर है.

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हिटलर और फ़ासीवाद का नया उभार

सोवियत संघ के पतन और विश्व अर्थतंत्र में आए बदलावों के चलते तेजी से उभरी नवफ़ासीवादी सक्रियता फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति बन गई है. मार्टिन ए ली की किताब ‘ द बीस्ट रीअवेकेन्स: फ़ासिज्म’स रीसर्जेन्स फ़्राम हिटलर’स स्पाइमास्टर्स टु टुडे’ज नीओ-नाज़ी ग्रुप्स ऐंड राइट-विंग एक्सट्रीमिस्ट्स ’ में इसी बात को समझने की कोशिश की गई है कि पचास साल पहले जो फ़ासीवाद पूरी तरह बदनाम था वह फिर से किस तरह मजबूत बना.

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