त्रासदी बनते इतिहास का आख्यानः मदन कश्यप का काव्य

प्रणय कृष्ण (कवि मदन कश्यप को जनमत टीम की ओर से जन्मदिन की हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पढ़िए ‘नीम रोशनी में’ संग्रह पर लिखा गया प्रणय कृष्ण का आलेख और साथ में ही संग्रह की कुछ कविताएं भी) कवि मदन कश्यप द्वारा 1990 के दशक में लिखी कवितायें आज़ाद भारत के सबसे विलक्षण कालखंड के बीच खड़े ‘कालयात्री’ की संत्रस्त सभ्यता-परिक्रमा की द्योतक हैं. नब्बे के दशक , खास कर सन ‘93 से लेकर सन ‘97 के बीच लिखी उनकी कविताओं का प्रतिनिधि संकलन है ‘नीम रोशनी में’ (2000).…

Read More

नक्सलबाड़ी विद्रोह का सांस्कृतिक पक्ष : प्रणय कृष्ण

(नक्सलबाड़ी आन्दोलन  की  51 वीं वर्षगांठ (25/5/18) के अवसर पर नक्सलबाड़ी आन्दोलन के सांस्कृतिक पक्ष पर रौशनी डाल रहें हैं, इलाहा बाद विश्वविद्यालय  में प्राध्यापक और आलोचना के लिए देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित प्रो. प्रणय कृष्ण) नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह (1967) ने भारत की एक नई कल्पना का सृजन किया जिसने कला, संस्कॄति और साहित्य पर गहरा अखिल भारतीय असर डाला. किसी आंदोलन में उतार-चढ़ाव, आत्म-संघर्ष, निराशा, बिखराव और उत्साह के तमाम मंज़र आते और जाते रह सकते हैं, लेकिन नक्सलबाड़ी से प्रेरित आंदोलनों के भू-राजनीतिक विस्तार से कहीं बड़ा…

Read More

क्यों डरती रही हैं भारत की सरकारें 1857 से

1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

Read More

मार्क्स ने खुद के दर्शन को निर्मम और सतत आलोचना के रूप में विकसित किया : दीपंकर भट्टाचार्य

मार्क्स के दबे हुए लोग और अंबेडकर के बहिष्कृत लोग एक ही हैं। इसी तरह मार्क्स ने भारत में जिसे जड़ समाज कहा, अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद-मनुवाद कहा, एक ही है। उन्होंने कहा कि बुद्ध, अंबेडकर और मार्क्स अगर पूरक लगते हैं तो ऐसा मानने वालों को ही यह काम करना है, नई लड़ाई को चलाना है।

Read More