कहानी दो फैसलों की : आसिया बीबी और सबरीमाला

आज दोनों पड़ोसी देशों में कई मामलों मे एक-से हालात हैं। कुछ दशक पहले तक भारत का चरित्र अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक, उदार एवं धर्मनिरपेक्ष था किंतु सन् 1990 के दशक से भारत में पाकिस्तान की तरह रूढ़िवाद हावी हो रहा है और राजनीति में धर्म का दखल बढ़ता जा रहा है।

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अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

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ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

अखिलेश प्रताप सिंह. खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है. यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने…

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क्या नवाज़ शरीफ़ का सियासी सर्कल पूरा हो गया है ?

पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक हुसैन हक़्क़ानी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है, पाकिस्तान में आप एक साथ भ्रष्ट और एंटी-मिलिट्री नहीं हो सकते. मतलब आप भ्रष्ट हैं लेकिन फौज़ को उपर मानते हैं तो आसिफ़ अली ज़रदारी की तरह राजनीती कर सकते हैं. लेकिन भ्रष्टाचार और सेना की खिलाफ़वर्ज़ी एक साथ हुआ तो आपका ‘ शरीफ़ ‘ होना लाज़मी है.

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यह सब हमारे ही समयों में होना था

मोनीजा हाशमी इस सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर अपनी बात रखने वाली थीं. ऐसे समय में जब बलात्‍कारों की सुर्खियां भारत की छवि को दागदार किये है क्‍या यह मिशनरी उनके सवालों को झेलने से इतना डर गयी कि उन्‍हें न केवल सम्‍मेलन में भाग नहीं लेने दिया बल्कि उन्‍हें उस सम्‍मेलन में एक दर्शक के बतौर शामिल तक होने से रोक दिया. पथराती ताकतों का वजूद कैसा कांपता है, भाषाई कीमियागिरी के सामने, यह उसका एक नमूना है.

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मंटो को याद करने का मतलब

अभी तक भारतीय साहित्य का व्यवस्थित और विश्वसनीय इतिहास नहीं लिखा गया है। जब कभी इसका इतिहास लिखा जाएगा उर्दू अफसानानिगार सआदत हसन मंटो का साहित्य बिल्कुल हाशिए के लोगों, जिन पर आम रूप से लोग खुसुर-फुसुर भी नहीं करना चाहते उनकी जिंदगी में घुसकर उनकी तल्ख और तुर्श सचाइयों से रू-ब-रू कराने में सबसे आगे प्रमाणित होंगे।

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