लखनऊ में शीरोज बतकही की 9वीं कड़ी : न्याय का अधिनायकवाद बनाम जनविरोधी न्याय तंत्र

आज तीन करोड़ के लगभग मुकदमे विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं. हमारे जातिवादी समाज में दलितों और पिछड़ों की न्यायालयों में न के बराबर भागीदारी है. न केवल जजों की संख्या बल्कि योग्य वकीलों की संख्या में भी इन वर्गों का बहुत कम स्थान है. ऐसे में ऊंच-नीच और गैरबराबरी के इस समाज में, जहां निम्न समाज के लोग न्यायालयों तक पहुंच ही नहीं पा रहे, वहां न्याय प्रक्रिया का समदर्शी होना, संदेह के घेरे में स्वतः आ जाता है. न्यायालयों के अंदर की दुनिया के बारे में आम जन को जानने-समझने पर जो दीवार खड़ी की गई है, वह न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के बजाय, मनमाने व्यवहार की ओर ले जाती है.

Read More