प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती पल्लवी त्रिवेदी की कविताएँ

निरंजन श्रोत्रिय   युवा कवयित्री पल्लवी त्रिवेदी की कविताओं को महज़ ‘प्रेम कविताएँ’ या रागात्मकता की कविताएँ कहने में मुझे ऐतराज़ है। पल्लवी की विलक्षण काव्य-प्रतिभा प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती हैं जिसमें स्त्री-विमर्श, पुरूष का अहं, रिश्तों की संरचना और मनोभावों के उदात्त स्वरूप सभी कुछ सम्मिलित हैं। प्रेम को परिभाषित करना वैसे भी दुष्कर है। उसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह ‘मूकास्वादनवत्’ एवं ‘सूक्ष्मतरमनुभव स्वरूपम्’ है। प्रेम की प्रक्रिया का विकास स्थूल से सूक्ष्म और व्यष्टि से समष्टि की ओर होता है। युवा…

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अपने समय की आहट को कविता में व्यक्त करता कवि विवेक निराला

युवा कवि विवेक निराला की इन कविताओं को पढ़ कर लगता है मानो कविता उनके लिए एक संस्कार की तरह है-एकदम नैसर्गिक और स्वस्फूर्त! इन कविताओं में एक निर्झर-सा प्रवाह है-एक-एक शब्द, संवेदनों और शिल्प में कल-कल की ध्वनि-सा! उनकी कविता एक यत्नहीन कविता-सी है, सायास या प्रविधि जैसा कुछ भी नहीं। इस युवा कवि में अपने समय की आहट सुनने का गजब का माद्दा है। अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं को वे बहुत हौले-से, बगैर किसी काव्य-उत्तेजना के अपनी कविता में उतारते हैं। बगैर किसी आहट के…

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