वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

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प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ : विह्वल करने से ज़्यादा विचार-विकल करती हैं

नदी समुद्र में जाकर गिरती है, यह तो सब जानते हैं. लेकिन यह सच्चाई तो प्रदीप की कविता को पता है कि नदी अपना दुःख दूसरी नदियों को सुनाने जाती है. क्योंकि स्त्री का दुःख स्त्री ही समझ सकती है. नदी जानती है कि समुद्र में उसका अस्तित्व खो जायेगा. इसलिए अपने होने का अर्थ एक नदी को दूसरी नदी ही बता सकती है.
लोकतंत्र के नाम पर जिस तंत्र का त्रास हमारे जन-सामान्य को झेलना पड़ रहा है, प्रदीप की निगाह उस पर भी रहती है. करुणा और व्यंग्य के मेल से ऐसी कविताएँ विह्वल करने से ज्यादा विचार-विकल करती हैं

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