गुजराती दलित साहित्य : बजरंग बिहारी तिवारी

गुजराती दलित साहित्य की नींव मजबूत है. उसकी उपलब्धियां गौरवपूर्ण हैं. उसका वर्तमान समृद्ध प्रतीत होता है. लेकिन, अपने भविष्य को लेकर उसे ज्यादा सावधान होना पड़ेगा. नई पीढ़ी के बहुत कम रचनाकार उसकी ओर उन्मुख हो रहे हैं. दलित स्त्रियाँ तो अत्यल्प हैं ! अभी यहाँ के संगठनों की आंदोलनधर्मिता शिथिल है. हिंदूवादी ताकतों से उनकी टकराहट समाप्तप्राय लगती है. उना कांड (जुलाई, 2016) से उभरे सवालों पर जिस तीव्रता, तैयारी और गंभीरता से रचनाकारों के बीच मंथन होना था वह अभी प्रतीक्षित है. फासीवादी हिंदुत्व से टक्कर लेने वाले नए नेतृत्व के प्रति एक हिचक है जो दूर नहीं हो रही.

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