गुजराती दलित साहित्य : बजरंग बिहारी तिवारी

गुजराती दलित साहित्य की नींव मजबूत है. उसकी उपलब्धियां गौरवपूर्ण हैं. उसका वर्तमान समृद्ध प्रतीत होता है. लेकिन, अपने भविष्य को लेकर उसे ज्यादा सावधान होना पड़ेगा. नई पीढ़ी के बहुत कम रचनाकार उसकी ओर उन्मुख हो रहे हैं. दलित स्त्रियाँ तो अत्यल्प हैं ! अभी यहाँ के संगठनों की आंदोलनधर्मिता शिथिल है. हिंदूवादी ताकतों से उनकी टकराहट समाप्तप्राय लगती है. उना कांड (जुलाई, 2016) से उभरे सवालों पर जिस तीव्रता, तैयारी और गंभीरता से रचनाकारों के बीच मंथन होना था वह अभी प्रतीक्षित है. फासीवादी हिंदुत्व से टक्कर लेने वाले नए नेतृत्व के प्रति एक हिचक है जो दूर नहीं हो रही.

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दलितों का भारत बंद : दलित आन्दोलन का नया दौर और नया रूप

  पिछले चार सालों में भारत में दलित आन्दोलन नए रूप में विकसित होना प्रारम्भ कर चुका है.रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या,गुजरात का ऊना आन्दोलन,सहारनपुर में भीम आर्मी का आन्दोलन,महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का संघर्ष और 2 अप्रैल का दलितों द्वारा किया गया स्वत:स्फूर्त भारत बंद,इन सभी आंदोलनों ने यह साबित किया है कि भारत में दलित आन्दोलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है. आज के समय में दलित आन्दोलन ज्यादा व्यापक मुद्दों,विस्तृत नजरिये और उग्र तेवर के साथ सामने आया है. लोकतंत्र पर बढ़ते फासीवादी हमले और…

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