‘ यह तश्ना की है गज़ल, इस शायरी में गाने-बजाने को कुछ नही ’

तश्ना आलमी की याद में लखनऊ में सजी गज़लों की शाम लखनऊ । तश्ना आलमी की शायरी गहरे तक छूती है। ऐसा लगता है कि एक शायर वंचितों की पीड़ा देख रहा है और उन तक पहुंचा रहा है। हम उस सबसे बड़े लोकतंत्र में हैं जहां आज भी न जाने कितने गरीब एक वक्त का फांका करके सोते हैं। यहां आज भी महिलाएं सर पर मैला उठाने को विवश हैं। ऐसे माहौल में चुप रहना भी जालिम की मदद करने जैसा है। अगर हम तश्ना को सच्ची श्रद्धांजलि देना…

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