‘ संस्कृति खरगोश की तरह है, जो आने वाले खतरे का आभास देती है ’

कौशल किशोर   यह कैसा समय है कि साथ के लोग साथ छोड़े जा रहे हैं. कुंवर जी और दूधनाथ सिंह को हम ठीक से अभी याद भी नहीं कर पाये थे कि हमारे अत्यंत प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के निधन की बुरी खबर मिली. कई बार लगता है कि हम पके आम के बाग में हैं. कब कौन टपक पड़े कहना मुश्किल है. अब तो अधपके और कच्चे भी गिर रहे हैं. सुशील सिद्धार्थ के दाह संस्कार की राख अभी ठण्डी भी नहीं हो पाई कि दूसरे ही दिन…

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