जनगीतों का सामाजिक सन्दर्भ

डॉ. राजेश मल्ल   साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्तर्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों के मूल विषय हैं। जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और…

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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर पटना में ‘कोरस’ द्वारा प्रतिरोध की एक शाम का आयोजन

14 अगस्त, पटना . स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कोरस द्वारा सांस्कृतिक प्रतिरोध की एक शाम का आयोजन किया गया . यह आयोजन सरकारी संरक्षण में हो रहे मुजफ्फरपुर,पटना,देवरिया समेत पूरे देश में महिलाओं पर हो रही वीभत्स यौन हिंसा के ख़िलाफ़ था. कार्यक्रम की शुरुआत 1857 के नायक अजीमुल्ला खां के गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ से हुई.  इसी दौरान वामदलों का कैंडिल मार्च जीपीओ गोलंबर से चलकर बुद्ध स्मृति पार्क पहुंचा . कार्यक्रम की शुरुआत 1857 के नायक अजीमुल्ला खां के गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान…

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भिखारी ठाकुर लिखित ‘ गबरघिचोर ‘ के मंचन के साथ नाट्योत्सव का समापन

भोजपुरी के नामी कवि-नाटककार भिखारी ठाकुर का यह नाटक अभी भी प्रासंगिक है. ‘गबरघिचोर’ सामाजिक संरचना में स्त्री की जगह, महिला-पुरुष सम्बंध और विभिन्न क़िस्म की सांस्कृतिक सत्ताओं से हमारा साक्षात कराता है

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