भारतीय चित्रकला और ‘कथा’ : 4

चित्रकला के सन्दर्भ में ‘कथा’ का महत्व केवल भारत तक ही सीमित है, ऐसा कहना गलत होगा। पर जिन देशों के लोगों के चिंतन में वैज्ञानिक, तार्किक और आधुनिक विचारों को विस्तार मिला है वहाँ ऐसे चित्र अपनी उपयोगिता खो चुके हैं और अब उन देशों में , उन्हें केवल संग्रहालयों में ही देखा जा सकता है। पर जहाँ स्थितियाँ नहीं बदल सकी हैं वहाँ आज भी लोग चित्रकला को ‘कथाओं’ के वाहक समझते हुए चित्रों को देखने के बजाय सुनना या पढ़ना चाहते हैं। स्वाभाविक रूप से यह , राज सत्ता और धर्म सत्ता के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है।

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मोनालिसा : तस्वीर के कई और रंग भी हैं

( मोनालिसा को लेकर  शताब्दी से भी ज्यादा समय से कई किस्म के  विवाद चलते रहे हैं।  कई इसे एक साधारण सा चित्र मानते हैं, जिसे मीडिया द्वारा इस कारण से उछाला गया ताकि फ्रांस के लूव्र कला संग्रहालय का नाम हो सके जहाँ यह चित्र प्रदर्शित है। इसके विपरीत कुछ इसे चित्रकला की सबसे नायाब कृति मानते हैं. इस चित्र पर असंख्य कथाओं के साथ-साथ, इस चित्र के तरह-तरह के विश्लेषणों को वर्षों से हम सुनते-पढ़ते आ रहें है. इस बार के तस्वीरनामा में अशोक भौमिक ‘मोनालिसा’ चित्र को…

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कला बाजार का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़

यह चित्र हालाँकि अपने ऐतिहासिकता के लिए चर्चित रहा है और अमरीका में दासप्रथा का दस्तावज है , पर साथ ही यह बिना किसी लाग लपेट के, ‘चित्र’ को एक विपणन योग्य पण्य ( मार्केटेबल कमोडिटी) के रूप में स्थापित भी करता है ( हालाँकि यह इस चित्र का प्राथमिक उद्देश्य नहीं है ) , और इसी कारण से यह चित्र एक नए अर्थ के साथ चित्रकला के इतिहास में अपने को एक महत्व दस्तावेजी चित्र होने का दावा पेश करता है.

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घाट पर प्रतीक्षा : ज़ैनुल आबेदिन का एक महान चित्र

सदियों से चित्रकला में ऐसे सहज-सरल लोगों की जिन्दगियों से जुड़े साधारण विषयों पर कभी किसी ने चित्र बनाने की जरूरत नहीं समझी. ज़ैनुल आबेदिन उन चित्रकारों में प्रमुख थे जिन्होंने अपने चित्रों में ऐसे साधारण से लगने वाले विषयों पर असाधारण चित्र बना कर , दर्शकों को चित्रकला की नयी संभावनाओं के साथ परिचित कराया.

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काला सच और रणजीत सिंह की कला

अमेरिकी कला ने परम स्वतंत्रता के नाम पर एक तरफ अमूर्तन की भूलभुलैया खड़ी की तो दूसरी तरफ फोटो रियलिज्म ( सुपर रियलिज्म या हाइपर रियलिज्म) को भी खड़ा करने का श्रेय उसी को जाता है. 1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरूआती दौर में लगभग पाॅप आर्ट के बाद के दौर में फोटो रियलिज्म नाम से एक सशक्त शैली आकार लेने लगी. यद्यपि यह दौर ऐसा था जिसमें कला आंदोलन के बनने बिगड़ने में समय नहीं लगता था. इस दौर में कला शैलियों की लगभग ऐसी बाढ़…

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पूरब अपनी सम्पदा बर्तानिया को अर्पित कर रहा है

 (साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने स्वार्थ में चित्रकला का किस तरह से उपयोग कर सकती हैं , इसका सबसे सार्थक उदाहरण है  ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बनवाया गया चित्र ‘ पूरब अपनी सम्पदा बर्तानिया को अर्पित कर रहा है ‘. यह चित्र इतालवी चित्रकार स्पिरिडीओन रोमा (1737-1781) ने बनाया था. तस्वीरनामा की तीसरी कड़ी में इस चित्र के बारे में जानकारी दे रहे हैं प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक )   चित्रकला इतिहास में कई चित्र अपने कलात्मक गुणों के कारण ही नहीं बल्कि अपनी ऐतिहासिकता के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा सकते…

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तमाम सीमाओं को तोड़ती वरुण मौर्य की कलाकृति

राकेश कुमार दिवाकर 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में नयी- नयी तकनीकी अनुसंधान और विकास ने कला के क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन किया। 21 वीं सदी में चित्र कला, छापा कला और मूर्ति कला के भेद मिट से गए और लगभग हर पारंपरिक सीमाएं टूट गईं । कलाकारों ने साहसिक तरीके से कला को परिभाषित किया जिसे न्यू मीडिया के नाम से जाना जाता है। इस मीडिया में कई कला छात्रों का काम भी रेखांकित करने योग्य है। वरुण मौर्य (जो फिलहाल हैदराबाद विश्वविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर की…

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