शतवर्ष स्मरण : देबब्रत मुखोपाध्याय (1918-1991)

समकालीन जनमत के ‘ तस्वीरनामा ’ में इस बार चित्रकार देबब्रत मुखोपाद्ध्याय पर एक विशेष लेख और उनके चित्रों का एलबम प्रकाशित कर रहें हैं. यह वर्ष देबब्रत मुखोपाद्ध्याय का जन्म शताब्दी वर्ष है और इस लेख के माध्यम से हम समकालीन जनमत की ओर से ‘देबू दा ‘ को क्रांतिकारी सलाम पेश करते हैं. आज देबब्रत मुखोपाध्याय के जन्मशती वर्ष पर उन्हें याद करना, हमारे देश के उन क्रांतिकारी चित्रकला को याद करना है , जिसे सरकारी कला अकादमियाँ और गैरसरकारी गैलरियाँ जनता तक कभी नहीं पहुँचने देना चाहेंगी

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एक प्रतीक चिन्ह का जन्म

आज जब इप्टा के 75 वर्ष के पूरे होने पर पर प्लेटिनम जुबली मनायी जा रही है तब हमें चित्तप्रसाद की एक बार जरूर याद आती है, जिन्होंने इप्टा का ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह बनाया था जो भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना और परिवर्तनकामी कलाकारों के सपनों का प्रतिनिधित्त्व करता है.

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घाट पर प्रतीक्षा : ज़ैनुल आबेदिन का एक महान चित्र

सदियों से चित्रकला में ऐसे सहज-सरल लोगों की जिन्दगियों से जुड़े साधारण विषयों पर कभी किसी ने चित्र बनाने की जरूरत नहीं समझी. ज़ैनुल आबेदिन उन चित्रकारों में प्रमुख थे जिन्होंने अपने चित्रों में ऐसे साधारण से लगने वाले विषयों पर असाधारण चित्र बना कर , दर्शकों को चित्रकला की नयी संभावनाओं के साथ परिचित कराया.

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चित्तप्रसाद का 1940 में बनाया गया ‘ जलियांवाला बाग ’ हत्याकांड पर एक दुर्लभ चित्र

इस चित्र को क्रूर औपनिवेशिक शासन के विरोध में एक मुक्तिकामी चित्रकार के साहसिक कला कर्म के रूप देखा जाना चाहिए. साथ ही यह सुदूर पंजाब की इस घटना पर पूर्वी बंगाल के चटगाँव के एक युवा चित्रकार के सही अर्थों में प्रादेशिकता की संकीर्णता से परे जाकर शोषितों के ‘चित्रकार’ की बनने की प्रक्रिया का एक अहम् चित्र भी है. अपनी कला यात्रा में , बाद के दौर में चित्तप्रसाद ने महाराष्ट् , तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , कश्मीर और बंगाल आदि प्रांतों की जनता और उनके सुख-दुःख को अपने…

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