समय के जटिल मुहावरे को बाँचती घनश्याम कुमार देवांश की कविताएँ

आज के युवा बेहद जटिल समय में साँस ले रहा है. पूर्ववर्ती पीढ़ी में मौजूद कई नायाब और सौंधे सुख उसकी पीढ़ी तक पहुँचने से पहले ही नदारद हो चुके हैं. इसलिए वह उन अनुभूतियों के बीच से गुज़र कर जीवन का आनंद नहीं उठा सकता जिसमें उनके पूर्ववर्तियों ने सांस ली है वह बस अपने बुजुर्गों के ज़रिये उन नदारद हो चुकी अनुभूतियों को पढ़-सुन सकता है. यही युवा शिक्षा अर्जित करने के बाद जब नौकरी की तलाश करता है तब उसे जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना करना पड़ता…

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