एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल : अर्थशास्त्र की आलोचना

मार्क्स ने पाया कि सभी युगों के चिंतक अपने समय की विशेषता को शाश्वत ही कहते आए हैं. अपने समय के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के बनाए इस व्यक्ति की धारणा के विपरीत मार्क्स ने कहा कि समाज से बाहर व्यक्ति द्वारा उत्पादन उसी तरह बेवकूफाना बात है जैसे लोगों के एक साथ रहने और आपसी संवाद के बिना भाषा के विकास की कल्पना करना. वे वैयक्तिकता को सामाजिक परिघटना मानते थे. जिस तरह नागरिक समाज का उदय आधुनिक दुनिया में हुआ उसी तरह पूंजीवादी युग का मजदूरी पर आश्रित स्वतंत्र कामगार भी दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज है. उसका उदय सामंती समाज के विघटन और सोलहवीं सदी से विकासमान उत्पादन की नई ताकतों के चलते हुआ है. आधुनिक पूंजीवादी व्यक्ति के उदय की समस्या को सुलझाने के बाद मार्क्स कहते हैं कि वर्तमान उत्पादन सामाजिक विकास के एक निश्चित चरण के अनुरूप है. इस धारणा के सहारे वे उत्पादन की अमूर्त कोटि को किसी खास ऐतिहासिक क्षण में उसके साकार रूप से जोड़ देते हैं .

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जलवायु परिवर्तन और अमिताभ घोष

गोपाल प्रधान 2016 में पेंग्विन से अमिताभ घोष की किताब ‘ द ग्रेट डीरेंजमेन्ट: क्लाइमेट चेन्ज ऐंड द अनथिंकेबल ’ का प्रकाशन हुआ । मुख्य रूप से उपन्यास लेखक होने के बावजूद अमिताभ घोष लगातार अपने समय के महत्वपूर्ण सवालों पर वैचारिक लेखन करते रहते हैं। एक और उपन्यासकार अरुंधती राय इससे भी आगे जाकर आंदोलनों में शामिल होती हैं । इन दोनों ने ही पोकरण विस्फोट पर बेहतरीन किताबें लिखीं । किताब को अमिताभ ने तीन हिस्सों में बांटा है । पहले हिस्से में कहानियां सुनाने के बाद दूसरे…

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