किसान के क्रमिक दरिद्रीकरण की शोक गाथा है ‘ गोदान ‘

प्रेमचंद ने गोदान में उपनिवेशवादी नीतियों से बरबाद होते भारतीय किसानी जीवन और इसके लिए जिम्मेदार ताकतों की जो पहचान आज के 75 साल पहले की थी वह आज भी हमें इसीलिए आकर्षित करती है कि हालत में फ़र्क नहीं आया है बल्कि किसान का दरिद्रीकरण तेज ही हुआ है और मिलों की जगह आज उसे लूटने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आ गई हैं. यहाँ तक कि जातिगत भेदभाव भी घटने की बजाय बढ़ा ही है. उसे बरकरार रखने में असर रसूख वाले लोगों ने नए नए तरीके ईजाद कर लिए हैं.

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प्रेमचंद और अक्तूबर क्रांति

साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी रवैये का एक निरंतरता में अनुपालन जितना प्रेमचंद के यहाँ दीखता है, वैसा हिंदी के किसी और लेखक में नहीं. असंख्य मजदूर, किसान, स्त्रियाँ पहले-पहल जबकि समाज में उनके नायकत्व की संभावना क्षीण थी प्रेमचंद की रचनाओं में यह नायकत्व हासिल कर रहे थे. उनके उपन्यास ‘ रंगभूमि ’ के केंद्र में नायक सूरदास हैं.

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