साक्षी मिताक्षरा की कविताएं : गाँव के माध्यम से देश की राजनीतिक समीक्षा

आर. चेतन क्रांति गाँव हिंदी कविता का सामान्यतः एक सुरम्य स्मृति लोक रहा है, एक स्थायी नोस्टेल्जिया, जहाँ उसने अक्सर शहर में रहते-खाते-पीते, पलते-बढ़ते लेकिन किसी एक बिंदु पर शहर के सामने निरस्त्र होते समय शरण ली है. वह गाँव जो छूट गया, वह गाँव जिसे छोड़ना पड़ा, वह गाँव जहाँ सब कुछ बचपन की तरह इतना सुंदर था, अक्सर कविता में आता रहा है. गद्य विधाओं में गाँव जिस तरह देश की राजनीतिक समीक्षा का आधार बना, वैसा कविता में संभवतः नहीं हुआ. इधर के नए कवियों में शहर…

Read More

स्मृति का गांव बनाम रियल पिक्चर

ओंकार सिंह गांव की बात जेहन में आते ही एक पुर सुकून सा मंजर दिमाग में तैरने लगता है. खेत-खलिहान और इनके बीच दूर तक दौड़ती पगडंडियां. पोखर और बाग की अलमस्ती या फिर आंगन से सीवान तक सुबह-शाम की चकल्लस . ये सब मिलकर भागदौड़ की जिंदगी में मानो एक ख्वाबों की झुरझुरी भर देते हैं. ओह, गांव तो यही है पर हकीकत में यही नहीं. सच में, घर के सहन से लेकर सीवान तक ठीक उसी तरह सिमट चुके हैं जैसे टोला पड़ोसी के व्यवहार. आगंतुक की पहले…

Read More