किसानों के साथ ये बर्बरता क्यूँ ?

आँसू गैस के गोले दागता आई.पी.एस. अफसर, किसान पर बंदूक ताने बिना वर्दी का पुलिस कर्मी और डंडा उठाए अकेले किसान पर डंडा ताने आधा दर्जन पुलिस वाले- ये इस प्रदर्शन की वो तस्वीरें हैं, जो मानों संकेत कर रही हों कि सरकार ने किसानों के खिलाफ एक तरह से युद्ध का ऐलान कर दिया है. मेहनतकशों के खिलाफ युद्ध का आगाज, हुकूमत ने किया है, अंजाम तक उसे मेहनतकशों का एकताबद्ध संघर्ष पहुंचाएगा.

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कार्पोरेट के लिए गांवों तक लाल कारपेट बिछाने की नीति से हो रही है खेती-किसानी की तबाही

खेती-किसानी की नीतियों का वर्तमान स्वरूप किसान हितों के प्रतिकूल है। यह नीति खेती-किसानी की कब्र निर्माण के दूषित नीति के साथ पूरा होने को अभिशप्त जान पड़ता है। इसकी बुनियाद रातों-रात नहीं रखी गई है और न यह राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित है। इसके पीछे कार्पोरेट से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीति और सत्ता का वर्ग चरित्र कार्य कर रहा है ।

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गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(हाल ही में ‘पल-प्रतिपल’ में प्रकाशित हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’ को हमने समकालीन जनमत पोर्टल पर प्रकाशित किया , जिस पर पिछले दिनों पोर्टल पर काफी चर्चा हुई और बहसें भी आयीं। बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है कहानी पर युवा आलोचक और ‘कथा’ के संपादक दुर्गा सिंह की टिप्पणी: सं) कहानी गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है।यह संकट विभाजनकारी साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा पैदा किया गया है। यह संकट पहले भी मौजूद था, लेकिन वह गांवों के सामूहिक ताने-बाने…

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