आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर देखनी है, तो कैफ़ी आज़मी की शायरी से बेहतर कुछ नहीं

आज कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि है. यह महज़ संयोग ही है कि आज ही के दिन ‘1857’ में बगावत का बिगुल बजा था. लेकिन अगर आपको बीसवीं सदी में में 1857 की क्रांति के व्यापक अर्थों को समझना है, आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर देखनी है, तो कैफ़ी आज़मी की शायरी से बेहतर कुछ नहीं.

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ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता के तार आपस में काफ़ी जुड़े हैं

( अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बनारस में ऐपवा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में संपृक्ता चटर्जी ने कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘उठ मेरी जान!…’ का पाठ किया । यहाँ प्रस्तुत है कैफ़ी की इस  बेहद मकबूल नज़्म का एक हिस्सा, संपृक्ता की टिप्पणी के साथ) मजाज़ लिखतें हैं, ‘तेरे माथे पर ये आँचल तो बहुत खूब है लेकिन ; तू इस आँचल का इक परचम बना लेती तो अच्छा था।’ आज हम सब यहां परचम ही लहराने आए हैं। ये परचम है जश्न का। 8 मार्च सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं…

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