यहीं कही रहेंगे केदारनाथ सिंह

मंगलेश डबराल, वरिष्ठ कवि हिन्दी कविता की एक महत्वपूर्ण पीढी तेज़ी से विदा हो रही है. यह दृश्य  दुखद और  डरावना  है जहां ऐसे बहुत कम कवि बचे हैं जिनसे कविता का विवेक और प्रकाश  पाया जा सके. पिछले वर्ष कुंवर नारायण, चंद्रकांत देवताले, दूधनाथ सिंह, और अब केदारनाथ सिंह. केदार जी रक्तचाप, मधुमेह या हृदयाघात जैसी व्याधियों  से मुक्त थे जो अस्सी वर्ष पार करने वाले व्यक्ति को प्रायः अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं और सब को उम्मीद थी कि वे निमोनिया पर काबू पाकर फिर से लेखन…

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गंवई संवेदना और वैश्विक दृष्टि के कवि

अरुण आदित्य केदारनाथ सिंह करीब चार दशक से दिल्ली में रहते हुए भी ग्रामीण संवेदना के कवि बने रहे। छल-बल की इस राजधानी में भी उन्होंने अपने आस-पास गंगा-सरयू के दोआबे का एक गांव बसा लिया था। यह गांव अपनी भौतिक उपस्थिति में नहीं, बल्कि केदार जी की चेतना में बसता था। इस गांव से संबंध बनाए रखने क लिए वे बार-बार स्मृतियों में जाते हैं। सहज ग्रामीण संवेदना उन्हें एक विशिष्ट काव्य-दृष्टि देती है। इस काव्य-दृष्टि का ही कमाल है कि बरामदे में रखी हुई कुदाल तक पर वे…

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‘ कविता भविष्य में गहन से गहनतर होती जाएगी ’

  ( प्रख्यात कवि प्रो. केदारनाथ सिंह ने 26 फरवरी 2016 को गोरखपुर के प्रेमचंद पार्क में प्रो परमानंद श्रीवास्तव की स्मृति में ‘ कविता का भविष्य ’ पर व्याख्यान दिया था. यह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने किया था. इस व्याख्यान में भविष्य की कविता पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें की थी. प्रस्तुत है व्याख्यान का प्रमुख अंश )   आज का समय अपने सारे गड्डमड्ड स्वरूप के भीतर से अपनी सच्ची कविता खोज रहा है. इस कविता की तलाश बड़े पैमाने पर जारी है. यह कार्य नई पीढ़ी…

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मै गांव-जवार और उसके सुख-दुख से जुड़ा हुआ हूं

(ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद डॉ केदारनाथ सिंह से यह संक्षिप्त बातचीत टेलीफ़ोन पर हुई थी. यह साक्षात्कार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था. )   प्रश्न: ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद आपको कैसा लग रहा है. डा. केदारनाथ सिंह: अच्छा लग रहा है. अच्छा लगने का कारण यह है कि यह केवल हिन्दी नहीं बल्कि देश की सभी भाषाओं के बड़े साहित्यकारों को मिल चुका है. इन सभी साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. भारतीय साहित्य के मनीषियों की परम्परा से जुड़ कर अच्छा लग रहा…

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अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

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उठो कि बुनने का समय हो रहा है

केदारनाथ सिंह की कुछ कवितायेँ   मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला मैं लिखने बैठ गया हूँ मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’ यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’ ‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ एक बच्चे का हाथ एक स्त्री का चेहरा मैं पूरी ताकत के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से…

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वह चला गया, जिसने कहा था कि जाना सबसे खौफनाक क्रिया है

आशीष मिश्रा, युवा आलोचक   हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हमारे बीच नहीं रहे . कवि केदारनाथ सिंह के जाने के साथ ही न सिर्फ़ ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में से अब कोई हमारे बीच नहीं रहा बल्कि उनके साथ हिन्दी कविता के एक युग का अवसान हो गया . केदारनाथ सिंह ने नई कविता आन्दोलन के साथ अपनी पहचान बनाई. अज्ञेय द्वारा संपादित और 1959 में प्रकाशित, हिन्दी के महत्त्वपूर्ण काव्य संकलन ‘तीसरा सप्तक’ के सात कवियों में केदारनाथ सिंह भी एक थे. इस संकलन के कई गीत…

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