‘आदमी के उठे हुए हाथों की तरह’ हिन्दुस्तानी अवाम के संघर्षों को थामे रहेगी केदारनाथ सिंह की कविता : जसम

कवि केदारनाथ सिंह को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि जनतांत्रिक मूल्यों की अकाल-वेला में केदारनाथ सिंह की कविता जनप्रतिरोध के सारसों की अप्रत्याशित आवाज़ थी. उनका संग्रह ‘अकाल में सारस’ 1988 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें इसी शीर्षक की एक कविता है. कविता इस तरह शुरू होती है- “तीन बजे दिन में आ गए वे जब वे आए किसी ने सोचा तक नहीं था कि ऐसे भी आ सकते हैं सारस एक के बाद एक वे झुंड के झुंड धीरे-धीरे आए धीरे-धीरे वे छा गए सारे आसमान में धीरे-धीरे उनके…

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