न्याय के सवाल को छोड़कर सामाजिक सौहार्द की बात ही नहीं हो सकती : प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. ‘‘ जिस समाज में किसी एक समूह या समुदाय का वर्चस्व हो, जहां हिंसा, दमन-उत्पीड़न और शोषण हो, जहां असहिष्णुता हर नुक्कड़ पर दिख जाती हो, जहां एक दूसरे के खिलाफ गाली-गलौज होती हो, उसे सौहार्दतापूर्ण समाज नहीं कहा जा जा सकता।’’ राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर और सीएसडीएस से संबंधित इंस्टिट्यूट आॅफ इंडियन थाॅट के निदेशक राजीव भार्गव ने ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियां’ विषय पर जन संस्कृति मंच द्वारा 17 नवंबर 2018 को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित सातवें कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ये विचार…

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विभाजन को समझे बिना हल नहीं होगा सौहार्द का प्रश्न

सामाजिक सौहार्द का मतलब केवल शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं होता. शांति तो ताकत और दमन से भी कायम की जा सकती है. शांति तो युद्धविराम की भी हो सकती है. शांति तो मजबूरी की भी हो सकती है. पर ऐसी शांतियों के भीतर भीषण अशांतियाँ खौलती रहती हैं. कभी भी फुट पड़ने को आतुर. सौहार्द्र का मतलब है एक दूसरे की जरूरत महसूस करना। अपने अधूरेपन को समझना और महसूस करना कि दूसरे के बिना वो पूरा नहीं हो सकता.

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सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ ‘ पर बोलेंगे प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 17 नवम्बर को शाम 5 से नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान ( दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आई टी ओ ) में आयोजित किया गया है. प्रति वर्ष जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में  इस बार का व्याख्यान सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ विषय पर राजनीतिक दार्शनिक प्रो. राजीव भार्गव देंगे. इस अवसर पर आलेख प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कुबेर दत्त के लेखों के संग्रह ‘जनवाद का तीसरा नेत्र – रामविलास शर्मा ’ का लोकार्पण भी होगा. यह जानकारी जन संस्कृति…

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