सुन्दर कल्पनाएँ सुन्दर यथार्थों की भूमि पर ही लहलहाती हैं

डॉ. स्कंद शुक्ला शरद की रातें आसमान के हीरों को निहारने के लिए हैं। बरसात अब उतनी नहीं हो रही कि पूरी कालिमा पर मेघाच्छादन रहे। लेकिन इतनी फिर भी चल रही है कि धूल के कणों को बुहार कर पृथ्वी पर वापस कर दिया जाए ताकि अन्तरिक्षीय मणियाँ जगमगा उठें। सो खगोलविदों और प्रेमियों को अगर रात की भाषा पढ़नी है , तो समय यही है। जाने दो वह कविकल्पित था , मैंने तो भीषण जाड़ों में नभचुम्बी कैलासशीर्ष पर महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है !…

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महावीर प्रसाद द्विवेदी का स्मरण आज भी क्यों ज़रूरी है

द्विवेदी जी उस ईश्वर को ‘भ्रष्ट ईश्वर’ कहते हैं, जिसकी दुहाई छुआ-छूत मानने वाले देते हैं. द्विवेदी जी का निर्भीक आह्वाहन है- ‘ऐसे भ्रष्ट ईश्वर का संसार छोड़ देना चाहिए.’ द्विवेदी जी ने ही सरस्वती में हीरा डोम की कविता छापी. इसी तरह स्त्री-अस्मिता के सवाल को द्विवेदी जी ने उठाया, ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ शीर्षक लेख लिखकर.

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