उनसे झुकने को कहा गया वो रेंगने लग गए

मार्च 1971 में हुए चौथी लोकसभा के चुनाव अपने आप में खासे महत्वपूर्ण थे। कांग्रेस इंदिरामयी हो चुकी थी। तब मार्गदर्शक-मण्डल शब्द तो गढ़ा नहीं गया था लेकिन इंदिरा गांधी को चुनौती दे सकने वाले सभी वरिष्ठ धुरंधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओ) में सिमट गए थे। अपने तूफानी चुनावी दौरों में इंदिरा गांधी जनता को ये बताना नहीं भूलती थीं कि वे जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और देश सेवा, त्याग, बलिदान उनके परिवार की परंपरा है। माहौल ऐसा बन गया था कि अमेरिका की पत्रिका ‘न्यूज़वीक’ ने लिखा रैलियों…

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उन्नीस की बलिवेदी पर कश्मीर

कश्मीर को एक बार फिर चुनावी राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया है. कश्मीर की निरन्तर जारी त्रासदी का सबसे बड़ा कारण यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में यह चुनावी वैतरणी का सबसे बड़ा सहारा बना रहा है.

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अमन की शहादत

हम मीडिया के लोग आराम कुर्सियों पर बैठकर भी संघर्षविराम के पक्ष में नहीं खड़े हो पाते हैं, लेकिन जिस शख्स ने अपने कश्मीर को जलते देखा था, जिसने युवाओं को गुस्से में पत्थर मारते देखा था, जिसने अलगाववादियों और आतंकियों की गोली से कश्मीरियों को मरते देखा था और आतंकियों और सेना के संघर्ष में आम नागरिको को मरते देखा था, वह शख्स संघर्ष विराम के पक्ष में पुरजोर तरीके से खड़ा था.

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राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है। इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

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