मुक्तिबोध आस्था देते हैं मुक्ति नहीं

प्रियदर्शन मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है,…

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अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

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पहाड़ और नदियों ने खो दिया अपने कवि को

आज जब पहाड़, जंगल और जमीन सहित पूरी मानवता खतरे में है और उन्हें बचाने के लिए संघर्ष जारी है, ऐसे में एक कवि का अचानक चले जाना एक घहरा आघात है. पहाड़ और नदियों ने अपने कवि सुरेश सेन निशांत को खो दिया. बस रह है उनकी कविताएं. किन्तु यह सर्वमान्य है कि कवि मर कर भी नहीं मरता, वह सदा मौजूद रहता है हमारे बीच अपनी रचनायों के साथ.

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शंभु बादल का कवि कर्म

हरेक कवि की अपनी जमीन होती है जिस पर वह सृजन करता है और उसी से उसकी पहचान बनती है। निराला, पंत, प्रसाद, महादेवी समकालीन होने के बाद भी इसी विशिष्टता के कारण अपनी अलग पहचान बनाते हैं। यही खासियत नागार्जुन, शमशेर, केदार व त्रिलोचन जैसे प्रगतिशील दौर के कवियों तथा समकालीनों में भी मिलती है। शंभु बादल की काव्य भूमि भी अपने परिवेश से निर्मित होती है। 70 के दशक में हिन्दी कविता के क्षेत्र में जो नई पीढ़ी आई, शंभु बादल उस दौर के कवि हैं। अपनी लम्बी…

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जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी विष्णु खरे की याद

अशोक पाण्डे अलविदा विष्णु खरे – 1 जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी उस आदमी की महाप्रतिभा का हर कोई कायल रहा. असाधारण उपलब्धियों और आत्मगौरव से उपजे उनके नैसर्गिक दंभ का भी मैं दीवाना था. उनका दंभ उन पर फबता था. ऐसा कोई दूसरा आदमी अभी मिलना बाकी है जिसके बारे में ऐसा कह सकूं. उनके अद्वितीय जीवन का विस्तार इतना विराट था कि भले-भलों की कल्पना तक वहां नहीं पहुँच सकती. बौनों से भरे साहित्य-संसार दुनिया में वे…

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‘पूछूंगी अम्मी से/या फिर अल्ला से/कैसे होता है बचके रहना….!’

आसिफा पर केन्द्रित दो कविता संग्रह का लोकार्पण लखनऊ. निर्भया हो या आसिफा, कठुआ हो या उन्नाव, मुजफ्फरपुर हो या देवरिया – ये स्त्रियों पर होने वाली हिंसा, यौन उत्पीड़न और बर्बरता के प्रतीक हैं। इन घटनाओं ने समाज को उद्विग्न किया है, उद्वेलित किया है। प्रतिरोध के स्वर फूटे हैं। रचनाकारों ने इसे अपने सृजन का विषय बनाया है। कवियों ने कविताएं लिखी हैं। ऐसी ही कविताओं का संग्रह है ‘आसिफाओं के नाम’ और ‘मुझे कविता पर भरोसा है’ जिसका लोकार्पण यहां लखनऊ के राष्ट्रीय पुस्तक मेले के मंच…

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‘ वह आग मार्क्स के सीने में जो हुई रौशन, वह आग सीन-ए-इन्साँ में आफ़ताब है आज ’

जटिल दार्शनिक-आर्थिक तर्क-वितर्क के संसार में रहने के बावजूद मार्क्स ने कई कविताएँ लिखीं और उन पर भी बहुत सी कविताएँ लिखी गयीं, जिनमें से कुछ यहाँ दी गयी हैं. हिंदी में मार्क्स पर बहुत कम कविताएँ मिलती हैं और बकौल सुरेश सलिल, हिंदी कविता लेनिन से पीछे नहीं गयी। ‘उर्दू में अल्लामा इकबाल शायद पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने नज्मों में मार्क्स का ज़िक्र किया, लेकिन उनका अंदाज़ कहीं तारीफ़ और कहीं सख्त आलोचना का है। यहाँ प्रस्तुत रचनाओं में ज़्यादातर मार्क्स के ऐतिहासिक अवदान का रेखांकन हैं, हालांकि कुछ में विडम्बना और आलोचना का स्वर भी है।

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सुभाष राय की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है वाग्मिता- राजेश जोशी

डॉ संदीप कुमार सिंह लखनऊ. कविता पर एक संजीदा बहस. सुभाष राय के कविता संग्रह ‘ सलीब पर सच ’ के बहाने. आज के समय में हिंदी कविता के दो शिखर व्यक्तित्व नरेश सक्सेना और राजेश जोशी, आलोचना की दुनिया का एक प्रखर नाम प्रो राजकुमार, अपने समय के दो बड़े कथाकार अखिलेश और देवेंद्र. साथ में हिंदी कविता और आलोचना के भविष्य रचने को तैयार दो युवा स्वर अनिल त्रिपाठी और नलिन रंजन सिंह. 26 अगस्त 2018 को ये सब साथ बैठे एक विमर्श में. लखनऊ की कैफ़ी आज़मी अकेडेमी में. हाल भरा हुआ. सुनने वालों का बड़ा जमावड़ा. वे भी सामान्य लोग नहीं. शहर के…

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‘कुछ भी नहीं किया गया’: वीरेन डंगवाल की एक कविता का पाठ

नवारुण प्रकाशन ने अभी हाल में ‘कविता वीरेन’ (वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कविताएँ) को प्रकाशित कर जारी किया है । वीरेन को याद करते हुए और इस अमूल्य किताब की सुंदर प्रस्तुति से प्रेरित होकर इसमें शामिल पहली ही कविता का एक संवेदनशील और बेहतरीन पाठ कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने किया है । प्रस्तुत है: बड़ा कवि वह है, जो अपने बड़े होने को बार-बार सत्यापित करता है। अच्छा कवि उसे कह सकते हैं, जिसकी रचना की सिर्फ़ कुछ पंक्तियों में नहीं, बल्कि समूची संरचना में कविता विन्यस्त हो। बड़ा…

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समय को संबोधित सुभाष राय की कविताएँ

वरिष्ठ पत्रकार एवं जनसंदेश टाइम्स के प्रधान सम्पादक सुभाष राय का कविता संग्रह भले ही देर से आया हो पर अपने समय को सम्बोधित महत्वपूर्ण कविता संग्रह है. वे लम्बे समय से लिख रहे हैं. वे एक मंजे हुए सशक्त और परिपक्व कवि हैं. उनके कविता संग्रह का शीर्षक सलीब पर सच सटीक और अपने समय को निरुपित करता है. कौन कह सकता है कि आज सच सलीब पर नहीं है. उनकी पैनी नजर अपने समय को देखती-परखती है और हर कड़वी सच्चाई को बेख़ौफ़ और बेबाकी से बयां करती है.

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कौशल किशोर का कविता संग्रह ‘ नयी शुरुआत ‘ : ‘ स्वप्न अभी अधूरा है ‘ को पूरा करने के संकल्प के साथ

    शैलेन्द्र शांत  “नयी शुरुआत’ साठ पार कवि कौशल किशोर की कविता की दूसरी किताब है  । सांस्कृतिक , सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहे कौशल किशोर के इस संग्रह में 1969 से 1976 तक की कवितायें शामिल हैं. यानी कांग्रेसी शासन से मोहभंग की शुरुआत के बाद नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन से लेकर आपातकाल तक की. कवि अपने वक्तव्य में खुद कहते हैं कि -‘बहुत कच्चापन मिलेगा इनमें ‘.  साथ ही यह भी कि – ‘पर यह कवि के बनने का दौर है ‘ .  आगे यह…

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वीरेन डंगवाल की याद और सृजन, कल्पना, रंगों, शब्दों और चित्रों की दुनिया

डॉ. कामिनी त्रिपाठी शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुंठपुर में आयोजित त्रिदिवसीय ‘वीरेन डंगवाल जन्म दिन समारोह’ का समापन 8 अगस्त को छात्राओं द्वारा वीरेन दा की कविताओं का पोस्टर बनाते हुए सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम के पहले दिन लगभग 30 छात्राओं ने ‘नवारुण’ द्वारा प्रकाशित वीरेन दा की संपूर्ण कविताओं के संग्रह ‘कविता वीरेन’ से अपनी पसंद की कविताओं का चयन कर अपने अंदाज़ में उनका पाठ किया | छात्राओं द्वारा चयनित कविताओं को देखने से एक बात बहुत आसानी से समझी जा सकती है कि वीरेन दा की कविताएं…

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आधुनिक जीवन की विसंगतियों के मध्य मानवीय संवेदना की पहचान की कवितायें

विनय दुबे की कविताओं में सहजता और दृश्य की जटिलताओं का जो सहभाव नज़र आता है, वह उन्हें अपनी पीढ़ी का अप्रतिम कवि बनाता है. अर्थ की लयात्मकता और भाषा के आरोह-अवरोह से कविता का एक नया सौंदर्य-पक्ष उभरकर सामने आता है.

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भुलाए नहीं भूलेगा यह दिन

कमरे में चौकी पर बैठे थे नागार्जुन. पीठ के पीछे खुली खिड़की से जाड़े की गुनगुनी धूप आ रही थी. बाहर गौरैया चहचहा रही थी. तभी पहुंचे कॉ. विनोद मिश्र, कवि से मिलने कवि के पास. समय ठिठका-सा रहा, शब्द चूक-से गए. नागार्जुन ने वीएम के चेहरे को कांपती उंगलियों से टटोला. देर तक नाक, कान, ठुड्डी को छूते रहे। उनकी भाव विह्वल आंखें चमक से भर गईं.

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खैनी खिलाओ न यार! /उर्फ / मौत से चुहल (सखा, सहचर, सहकर्मी, कामरेड महेश्वर की एक याद)

अपने प्रियतर लोगों- कृष्णप्रताप (के.पी.), गोरख, कामरेड विनोद मिश्र, महेश्वर पर चाहते हुए भी आज तक कुछ नहीं लिख सका। पता नहीं क्यों? इसकी वज़ह शायद उनसे एक जरूरी दूरी नहीं बन पाई आज तक, ताकि उसे देख सकूँ। शायद वे सब लोग स्मृतियों में आज भी वैसे ही साथ रहते-चलते चल रहे हों जैसे तब। शायद यह भी कि ये चारों लोग मिल कर स्मृति का एक वृत्त बन जाते हैं, इस तरह कि अलगा कर इनमें से किसी एक पर नहीं लिखा जा सकता। आज महेश्वर की पुण्य-तिथि…

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पराजय को उत्सव में बदलती अनुपम सिंह की कविताएं

(अनुपम सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे वे अपने साथ हमें पितृसत्ता की एक बृहद प्रयोगशाला में लिए जा रहीं हैं जहाँ मुखौटे बनाए जा रहें हैं और उन सबको एक जैसा बनाए जाने की जद्दोजहद चल रही है | इससे भिन्न मान्यता रखने वालों की जीभ में कील ठोंक देने को तत्पर यह व्यवस्था निश्चित रूप से अपने लोकतान्त्रिक एवं अलोकतांत्रिक मुखौटे के बीच कार्यव्यपार चलाती रहती है | अपनी पराजय की ऐतिहासिक चेतना से सम्पन्न स्त्री इन कविताओं में फिर भी एक उत्सव की…

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कुमार मुकुल की कविताएँ : लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा

30 वर्षों से रचनारत कुमार मुकुल के कविता परिदृश्य का रेंज विशाल और वैविध्य से भरा है , प्रस्तुत कविताओं में आज के समय को कुमार मुकुल ने मूलतः लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा के बतौर सामने रखा है.

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जनकवि सुरेंद्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई

बी. आर. बी. कालेज , समस्तीपुर के सभागार में 17 मई, 2018 को जन संस्कृति मंच और आइसा के संयुक्त तत्वावधान में मिथिलांचल के दुर्धर्ष राजनीतिक-संस्कृतिक योद्धा एवं जनकवि सुरेन्द्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई.

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त्रासदी बनते इतिहास का आख्यानः मदन कश्यप का काव्य

प्रणय कृष्ण (कवि मदन कश्यप को जनमत टीम की ओर से जन्मदिन की हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पढ़िए ‘नीम रोशनी में’ संग्रह पर लिखा गया प्रणय कृष्ण का आलेख और साथ में ही संग्रह की कुछ कविताएं भी) कवि मदन कश्यप द्वारा 1990 के दशक में लिखी कवितायें आज़ाद भारत के सबसे विलक्षण कालखंड के बीच खड़े ‘कालयात्री’ की संत्रस्त सभ्यता-परिक्रमा की द्योतक हैं. नब्बे के दशक , खास कर सन ‘93 से लेकर सन ‘97 के बीच लिखी उनकी कविताओं का प्रतिनिधि संकलन है ‘नीम रोशनी में’ (2000).…

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एक कविता: दोष नहीं कुछ इसमें [अद्दहमाण]

विद्वानों के मुताबिक़ अद्दहमाण [अब्दुल रहमान] का काल 12वीं सदी के कुछ पहले ही ठहरता है। यहाँ कुछ छंद उनके ग्रंथ ‘संदेस–रासक‘ से चुने गए हैं। हर छंद के नीचे उनके काव्यानुवाद की कोशिश की है। ये काव्यानुवाद आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और विश्वनाथ त्रिपाठी उत्कृष्ट सम्पादित ‘रासक‘ के अर्थों पर आधारित हैं। इसलिए अनुवाद में जो भला वह आचार्यों का, बुराई मेरी। शास्त्रीय भाषा में कहें तो इन छंदों में हमारा यह पुरखा कवि अपनी कविता का ‘औचित्य‘ बताता है। औचित्य बताते हुए वह एक मूलभूत सवाल की ओर…

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