सुन्दर कल्पनाएँ सुन्दर यथार्थों की भूमि पर ही लहलहाती हैं

डॉ. स्कंद शुक्ला शरद की रातें आसमान के हीरों को निहारने के लिए हैं। बरसात अब उतनी नहीं हो रही कि पूरी कालिमा पर मेघाच्छादन रहे। लेकिन इतनी फिर भी चल रही है कि धूल के कणों को बुहार कर पृथ्वी पर वापस कर दिया जाए ताकि अन्तरिक्षीय मणियाँ जगमगा उठें। सो खगोलविदों और प्रेमियों को अगर रात की भाषा पढ़नी है , तो समय यही है। जाने दो वह कविकल्पित था , मैंने तो भीषण जाड़ों में नभचुम्बी कैलासशीर्ष पर महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है !…

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