आसिफ़ाओं के लिए

पिछले पाँच सालों से देश में जो धर्म-ध्वजा फहर रही है, और सांप्रदायिकता का जो उन्माद लोगों की नसों में घुल रहा है, उसी का प्रारम्भिक नतीजा है कठुआ का मामला. उससे भी चिंताजनक बात यह है कि जिस तरह से संवैधानिक-प्रशासनिक संस्थाओं एवं सेना का सांप्रदायीकरण किया जा रहा, उसका दुष्परिणाम भी कठुआ मामले में देखा जा सकता है.

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