अपने-अपने रामविलास: प्रणय कृष्ण

आज रामविलास जी का जन्मदिन पड़ता है.  इस अवसर पर प्रणय कृष्ण का लिखा आलेख ‘अपने अपने रामविलास’ समकालीन जनमत के पाठकों के लिए यहाँ दिया जा रहा है. यह लेख डेढ़ दशक पहले तब लिखा गया था जब रामविलास जी की मृत्यु के बाद उनपर हमले किए जा रहे थे और उनकी विरासत को लेकर तमाम तरह के भ्रम फैलाए जा रहे थे. यह लेख उन हमलों और फैलाए गए भ्रमों  का जवाब है, जो आज भी प्रासंगिक है. (आलोचना के रामविलास अंक पर अविनाश कुमार, आशुतोष कुमार, रमेश कुमार,…

Read More

जनकवि सुरेंद्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई

बी. आर. बी. कालेज , समस्तीपुर के सभागार में 17 मई, 2018 को जन संस्कृति मंच और आइसा के संयुक्त तत्वावधान में मिथिलांचल के दुर्धर्ष राजनीतिक-संस्कृतिक योद्धा एवं जनकवि सुरेन्द्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई.

Read More

चंद्रबली सिंह ने जनवाद को परिभाषित करने का काम किया

 ‘हमारा समय और चंद्रबली सिंह की आलोचना दृष्टि’ विषय पर लखनऊ में संगोष्ठी  प्रसिद्ध आलोचक चंद्रबली सिंह की पुण्य तिथि पर कैफ़ी आज़मी एकेडमी में ‘हमारा समय और चंद्रबली सिंह की आलोचना दृष्टि’ विषय पर चंद्रबली सिंह स्मृति न्यास, जलेस, जसम और प्रलेस की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सबसे पहले चंद्रबली सिंह के पुत्र प्रवाल कुमार सिंह ने आये हुए अतिथियों का स्वागत किया। उसके बाद विषय प्रवर्तन करते हुए कथाकार देवेन्द्र ने अपने विद्यार्थी जीवन की तमाम यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि आपातकाल के समय एक…

Read More

लोक और जन की आवाज़ : त्रिलोचन और मुक्तिबोध

मिथिला विश्वविद्यालय  में मुक्तिबोध-त्रिलोचन जन्म शताब्दी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने मुक्तिबोध त्रिलोचन जन्मशताब्दी के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। यू जी सी द्वारा वित्त संपोषित इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने उक्त दोनों कवियों को हिंदी का अत्यंत प्रसिद्ध कवि कहते हुए कहा कि एक की कविता में जन की आवाज़ है तो दूसरे में लोक की। भले ही ये किसी भी विचारधारा के हों, किन्तु इनकी कविता में भारत का…

Read More

उदारमना संस्कृति का सामर्थ्य

  पंकज चतुर्वेदी: मशहूर कथन है कि ”Interpretation depends on intention.” यानी व्याख्या इरादे पर निर्भर है। अगर आपकी नीयत नफ़रत और हिंसा फैलानेे की है, तो आप इतिहास से वे ही तथ्य चुनकर लायेंगे, जिनसे ऐसा किया जा सकता हो। ऐसा नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं, लेकिन समग्र सत्य की सापेक्षता में देखे जाने पर तथ्य सत्य नहीं रह जाते। इसलिए किसी ख़ास मक़सद या निहित स्वार्थ की नज़र से इतिहास का चयनधर्मी इस्तेमाल इतिहास नहीं है। सत्य से न्याय तभी हो सकता है, जब तथ्यों के…

Read More