स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नहीं, यह स्टैच्यू ऑफ डिस्प्लेसमेंट है

शशांक मुकुट शेखर सरकार हजारों आदिवासियों की मृत्यु का जश्न मनाने की तैयारियों में तल्लीन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का अनावरण करने वाले हैं. प्रतिमा के भव्य अनावरण के लिए जोरशोर से तैयारियां चल रही है. हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश की जानी है. और भी तमाम तरह के तामझाम होने वाले हैं. देशभर से कलाकारों को बुलाया जा रहा है. सरकार अनावरण समारोह को एक जश्न की तरह मनाने के सारे जुगत करने में लगी है. मगर इसी दिन…

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बुलेट ट्रेन के लिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों, आदिवासियों के साथ आये कई दल

दिल्ली के कंसिट्यूशन क्लब हाल में 15 अक्टूबर 2018 को ” भारत में बुलेट ट्रेन – किसकी कीमत पर ” विषय को केंद्र कर एक जन कन्वेंशन आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम का आयोजन “भूमि अधिकार मंच” के बैनर तले किया गया था. कार्यक्रम में महाराष्ट्र और गुजरात से इस योजना से विस्थापित होने वाले किसान और आदिवासी बड़ी संख्या में पहुंचे थे. जमीनी स्तर पर इस आंदोलन को नेतृत्व दे रहे कार्यकर्ताओं ने अपने सारगर्भित अनुभव लोगों से साझा किए.

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उसका भाषण था कि मक्कारी का जादू…

सौरभ यादव, शोध छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय 15 अगस्त, नई दिल्ली ।आज देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रचलित परम्परा के अनुसार प्रधानमंत्री ने डालमिया के गोद लिए लाल किले से देश को पहली बार संबोधित किया। यहां पहली बार शब्द का प्रयोग दो वजहों से किया जा रहा है । पहला तो ये कि मोदी जी को इस ‘पहली बार’ शब्द से विशेष प्रेम है, दूसरा इसलिए क्योंकि इससे पहले के प्रधानमन्त्रियों ने भारत सरकार के अधीन आने वाले लाल किले से देश को सम्बोधित किया था लेकिन हाल…

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सामाजिक कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह के केस के खिलाफ रांची में प्रदर्शन

झारखंड के 20 सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाए गए देशद्रोह के केस के खिलाफ वरिष्ठ लेखकों, बुद्धिजीवियों व सांस्कृतिक -सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने 10 अगस्त को शहीद स्मारक पर नागरिक प्रतिवाद ( बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे) कार्यक्रम आयोजित किया.

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पत्थलगड़ी के बहाने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर चोट ?

झारखंड के आदिवासी बहुल गांवों में किया गया पत्थलगड़ी राज्य सरकार के लिए सिर दर्द बन चुका है. इन गांवों के लोग सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रहे हैं. वे अपने को सरकारी व्यवस्था से अलग-थलग रखना चाहते हैं. बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजने पर मनाही है. कई गांवों के आदिवासी बच्चों ने सरकारी विद्यालय जाना बंद कर दिया है. आदिवासी महासभा इन बच्चों के लिए अलग से विद्यालय चला रहा है.

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क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक है ?

[author] [author_image timthumb=’on’]http://samkaleenjanmat.in/wp-content/uploads/2018/05/gladson-dungdung.jpg[/author_image] [author_info]ग्लैडसन डुंगडुंग [/author_info] [/author] झारखंड के आदिवासी इलाकों में हो रही पत्थलगड़ी से सरकार की नींद हराम हो गई है. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने रांची में बड़ा-बड़ा होर्डिंग लगवाकर और अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से आदिवासियों को कड़ा संदेश देने की कोशिश की कि पत्थलगड़ी असंवैधानिक है और जो भी इसमें शामिल है उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी. मैं इन दिनों झारखंड के खूंटी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले के ‘मुंडा’ एवं ‘हो’ आदिवासियों के इलाका में घुम रहा हूँ. यहां प्रत्येक गांव के…

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पत्थलगड़ी और प्रवेश निषेध

जब संविधान, कानून एवं सरकार के होते हुए आदिवासी लूटे जा रहे हैं तब क्या वे चुपचाप अन्याय सहते रहेंगे ? इसीलिए वे अपने पारंपरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी रक्षा कर रहे हैं.

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पत्थलगड़ी से क्यों भयभीत है राज्य सत्ता

आदिवासियों ने जिस झारखंड राज्य के गठन के लिए सात दशकों तक संघर्ष किया उसी राज्य में अब उन्हें अपनी आजीविका के संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा रहा है. आदिवासियों को यह बात मालूम हैं कि उनका अस्तित्व बरकरार रखने के लिए उनके पास संघर्ष करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. यही रास्ता राज्यसत्ता को भयभीत करती है क्योंकि जनांदोलन तथाकथित विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के लूट पर अड़ंगा लगाता है.

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पत्थलगड़ी आंदोलन की जड़ें

आदिवासियों के साथ प्रगति, विकास, जनहित, राष्ट्रहित एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर धोखा किया गया है। इसलिए अब वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन, इलाके और प्राकृतिक संसाधनों को काॅरपोरेट को देने के लिए तैयार नहीं हैं। पत्थलगड़ी आंदोलन की जड़ें यहीं हैं।

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मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

“जंगल केवल जंगल नहीं है नहीं है वह केवल दृश्य वह तो एक दर्शन है पक्षधर है वह सहजीविता का दुनिया भर की सत्ताओं का प्रतिपक्ष है वह ” अनुज लुगुन की लम्बी कविता ” बाघ और सुगना मुंडा की बेटी ” का एक अंश। यह चर्चित कविता हमारे समय के आदिवासी संघर्ष और सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। बाघ के साथ आदिवासी का प्रेम और भय का एक जटिल रिश्ता रहा है। लेकिन मानव रूपी बाघों की बात अलग है।वे बाघ के संरक्षण की योजनाएं बनाते…

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