जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !

इस ख़त की कोई भूमिका नहीं हो सकती। इरफ़ान, जिनके सिरहाने की एक तरफ़ ज़िंदगी है और दूसरी तरफ़ अंधेरा, ने आत्मा की स्याही से यह ख़त लिखा है। उम्मीद की ओस। एक काव्यमय दर्शन। जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है! यह ख़त इरफ़ान भाई ने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को भेजा है। -(अविनाश दास, लेखक-निर्देशक .) कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि…

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