कामगार महिलाओं के संघर्ष का दिवस है महिला दिवस, मिथक और बाजार का नहीं

( राधिका मेनन के रेखा चित्रों से जानिए अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास ) महिला दिवस की शुभकामनाएं एक दिन पहले से आने लगीं। इन शुभकामना संदेशों में कुछ औरतों के सौन्दर्य पर थे, कुछ अच्छी बेटी, पत्नी, बहू, मां होने पर था। कछ ऐसे मैसेज भी थे जिसमें बधाई देने के साथ ही महिला दिवस पर चेहरे की मालिश कराने पर 30 फीसदी का डिस्काउंट देने की बात कही गई थी। आठ मार्च की सुबह से तो महाभारत की महिला किरदारों की ताकत पर कहानी गढते हुए संदेश आए…

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सभ्य होने की असलियत

सदानन्द शाही किसी समाज के सभ्य होने का सबसे बड़ा पैमाना यह  है कि वह समाज स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करता है. अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें अपने आप को इस कसौटी पर कसने का अवसर देता है. अवसर देता है कि हम अपने सभ्य होने की असलियत जाने. सच बात यह है कि स्त्री के लिए हम सहज नहीं हैं,यह जानने के लिए किसी गंभीर शोध की आवश्यकता नहीं अपितु अपने परिवेश पर एक निगाह डाल लेना ही काफी होगा. दिल्ली मेँ सोलह दिसंबर सन दो हजार बारह की रात एक लड़की अपने मित्र के साथ फिल्म देख कर लौट रही थी. वह वापस हॉस्टल जाने के लिए बस मेँ सवार हुई । बस मेँ अकेली लड़की को देख कर चालक मण्डल के भीतर का पशु जाग गया और उन्होंने एक नृशंस घटना को अंजाम दिया जिसे निर्भया कांड नाम दिया गया। इस  घटना ने  पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया. पूरे देश मेँ अचानक स्त्री के लिए संवेदना जाग उठी, मौन जुलूस से लेकर धरना-प्रदर्शन सब हुआ. अनेक सख्त कानून बने . महिला हेल्प लाइन का अखिल भारतीय नेटवर्क बना . उम्मीद की गयी कि अब स्त्री के साथ ऐसी  हरकत करने की कौन कहे सोचने मात्र से  लोगों की रूह काँप उठेगी. लेकिन  यह एक  खुशफहमी साबित हुई . बाद में  निर्भया कांड से भी अधिक नृशंस घटनाएँ घटी हैं, भले ही उन्हें मीडिया मेँ वैसी जगह न मिली हो. हमने पाया कि जैसे जैसे स्त्री सुरक्षा के उपाय किए या बढ़ाए गए, कानून सख्त हुए वैसे वैसे स्त्री के प्रति दुर्भाव और क्रूरता की घटनाएँ बढ़ती चली गयी हैं. विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या वजहें हैं कि छह महीने की लडकी से लेकर अस्सी साल की औरत तक हमारे समाज में सुरक्षित नहीं है। औरत कब और कहां किस तरह की सामूहिक या निजी पशुता का शिकार बन जाय कहना मुश्किल है.  एक बात तो साफ है कि यह महज कानूनी मसला नहीं है.  इस मामले में पहले भी कानून कुछ कम सख्त नहीं थे. इसलिए यह मसला कहीं न कहीं हमारे सामाजिक मनोविज्ञान से जुड़ा है. इस मनोविज्ञान को समझना जरूरी है. दरअसल एक खास तरह की मर्दवादी सोच हमारे समाज मेँ पसरी हुई है,जो किसी भी तरह स्त्री को उपभोग की सामग्री से अधिक मानने को तैयार नहीं है. यह सोच स्त्री से इसी के अनुरूप व्यवहार करती है. ध्यान से देखें कि हम इसी पैमाने पर अपनी स्त्रियों को तैयार करते हैं. इसी उपभोगवादी पैमाने पर स्त्री (तुलसीदास से भाषा उधार लेकर कहें तो) त्यागन, गहन, उपेक्षणीय करार दी जाती है. अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से वह छोड दी जाती है, ग्रहण की जाती है…

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