कुछ रंग इश्क के, कुछ इंकलाब के

  • 25
    Shares

लोकेश मालती प्रकाश

 

(साहिर पर कुछ भी लिखने से पहले – या शायद यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि लिखने की जुर्रत करने से पहले एक कंफ़ेशन करना ज़रूरी है। मैंने साहिर को ज़्यादा नहीं पढ़ा है। इसलिए यह बयान जितना साहिर के बारे में है, उससे कहीं ज़्यादा साहिर को जैसा मैंने देखा और जाना उसके बारे में है )

साहिर की शायरी में कई रंग है। इन रंगों में से किस रंग से मैं पहले रंगा, यह तो आज उतना याद नहीं, मगर इतना याद है कि साहिर का हर रंग अपने ऊपर चटख ही चढ़ा।

तो, उन रंगों में से एक रंग है इश्क का,

देखा तो था युँही किसी ग़फ़लत-शआर ने

दीवाना कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने

अब अगर इश्क होगा तो और भी कई रंग अपने आप भर जाते हैं। इश्क की हसरत और इश्क के बीच अगर फ़ासला न हो तो इश्क का रंग अधूरा ही रहता है। फिर शायर यह कैसे कहता-

जब भी राहों में नज़र आए हरीरी मलबूस

सर्द आहों से तुझे याद किया है मैने।

इश्क हो, नाकाम हसरतें हों, तो त्रासदी का होना लाज़िम हो जाता है। तो साहिर की शायरी का एक रंग यह भी है। त्रासदी का रंग। इश्क का शायर इस त्रासदी की अलग-अलग छटाओं को उकेरता है,

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब

अभी हयात का माहौल खुशगवार नहीं।

या फिर

मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिक्खे

आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ।

या फिर

यह किस मुक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने

कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं

यह त्रासदी नियति ने नहीं रची है। अगर ज़िन्दगी का मौसम बिगड़ा हुआ है तो इसके तार इसी ज़िन्दगी के कुछ दृश्यों में उलझे हुए हैं। बेशक उनको सुलझाना आसान नहीं। साहिर इस बात को बखूबी समझते हैं। और यही चेतना साहिर की शायरी में सरोकारों का और एक मायने में इंकलाब का रंग भरती है। आखिर वह कौन सी शै है जो हमारी ज़िन्दगी से हमारा ही इख़्तियार छीन रही है? शायर चाहता है हम उसे पहचाने।

देश के अदबार की बातें करें

अजनबी सरकार की बातें करें।

अगली दुनिया के फ़साने छोड़कर

इस जहन्नुमज़ार की बातें करें।

जो बात साहिर में खास लगती है वो यह है कि साहिर इंकलाब के नारे नहीं लगाते, शायद कुछेक अपवादों को छोड़कर। साहिर के इंकलाबी सुर नारों की शक्ल में उतने नहीं निकलते जितने त्रासदी के ज़बरदस्त अहसास से। यह बात बहुत मायने रखती है। अपने हालात की त्रासदी का तीखा अहसास ही इंसान को प्रेरित करता है ज़िंदगी की कुछ अलग सूरतें तलाशने को। यह तलाश, यह जद्दोजहद – इंकलाब का ख़्वाब इसी से तो गढ़ा जाता है।

और भी बहुत से रंग हैं साहिर की शायरी में। उन सबको यहाँ समेट पाना संभव नहीं। और शायद ज़रूरी भी नहीं। और रंगों का मजा तो रंग जाने में ही है। इसके लिए खुद ही जाना होगा शायर तक। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके गीतों की मारफ़त उन्हें याद करना उन तक पहुँचने का शायद सबसे मानीखेज़ तरीका होगा।

( लोकेश मालती प्रकाश युवा कवि, लेखक और अनुवादक हैं )

Related posts

Leave a Comment