सई नदी गोली कांड: अवध के किसान आंदोलन का आख्यान

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एका : बाबा रामचंद्र एवं मदारी पासी के नेतृत्व में अवध के किसान-आंदोलन की गाथा (1920 से 1928)

राजीव कुमार पाल

(अवध के चर्चित किसान आंदोलन पर ‘एका ‘ नाम से राजीव कुमार पाल द्वारा लिखित और शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही पुस्तक का एक अंश लेखक के प्रति आभार सहित यहां दिया जा रहा है। अभी मंदसौर बीते बहुत दिन नहीं हुए हैं। किसानों की कोई जाति नहीं होती और उनके खिलाफ सामन्ती,पूँजीवादी शक्तियों में हमेशा से सत्ता समर्थित एका रही है। इस एका को खत्म करने का सबसे कारगर तरीका है वंचितों की एका से पैदा हुआ बड़ा आंदोलन। आश्चयर्जनक है कि आजादी के आंदोलन के दौर में बन रही इस एका को आजादी की मुख्य धारा का नेतृत्त्व स्वीकार न कर सका था )

आज सवेरे से ही ‘कंधई का पुरवा’ गाँव में रामदीन किसान के घर बच्चों की धमा-चौकड़ी मची हुई थी। घर की सारी बिटियाँ-बहिनी, रामदीन के यहाँ आ चुकी थीं। क्योंकि, छूटकी बिटियाँ की पहपुंजी तय हुई थी। रामदीन ने किसान सभा के मुखियाँ रामगुलाम पासी से कह रखा था कि आज ‘डीह बाज़ार’ चलकर बजाजा से कपड़ा लाना है। आजकल किसान बाज़ार भी गाँव के साहूकार या बनिया के साथ न जाकर किसान भाइयों के साथ झुंड में जाते थे। अविश्वास की खाई अब गहरी हो चुकी थी । इसलिए रामदीन ने किसान सभा के मुखिया होने के नाते रामगुलाम से साथ चलने की प्रार्थना की और सहूलियत देखकर दूसरे दिन सवेरे ही राम गुलाम और दो तीन किसान , रामदीन के साथ चल दियेँ ।

बद्री बनिया, डीह के जाने माने साहूकार और व्यापारी थे। उनके यहाँ, बजाजा (कपड़े) से लेकर किसानों की जरूरत के सारे सामान मौजूद रहते थे। साथ ही गिरोह-गाँठ का काम भी चलता था। उन्होंने दूकान खोली ही थी; और ग्राहक का इंतज़ार कर रहे थे। राम ग़ुलाम को दो-तीन किसानों के साथ दूकान के एकदम अंदर आता देख कर पहले तो चौंक गए, क्योंकि इन दिनों किसान सभा की सक्रियता की वजह से वे ‘राम ग़ुलाम’ को पहचानने लगे थे। पहले तो इस जाति का कोई भी व्यक्ति, दुकान की ड्योड़ी से कदम ऊपर नहीं बढ़ाता था, लेकिन रामग़ुलाम, बद्री बनिया की दुकान के अंदर जाकर बैठ गया।

आज यह नया रंगरूप देखने को मिल रहा था, वो भी बोहनी के टेम। ऐसे में वो क्या, कोई भी दुकानदार कोई अनर्गल या अपशगुन पसंद नहीं करता । इसलिए रामदीन को देखकर बद्री चुपाई मार गए। पुराना ग्राहक है। राम ग़ुलाम ने ठसक से कपड़ा दिखाने को कहा तो बद्री ने कपड़ा दिखाया।

प्रथम विश्व युद्ध की वजह से कपड़े पर राशनिंग थी और सरकारी दाम तय थे। लेकिन, वे सब तो सक्षम लोगों के लिए थे। किसान को तो बनियों द्वारा तय दर से ही लेना पड़ता था। बद्री ने रूखे स्वभाव से कपड़े का दाम बताया – “छह आने गज”।

राम ग़ुलाम ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “मूलो सरकारी रेट तो चार आने गज है”।
“ऊ तो लड़ाई के बखत रहा। अब तो पाछे से महँगा आ रहा है। पहिलन घाटा मां बेचा राहे ” , बद्री ने फिर बेरुखी से कहा ।

राम गुलाम ने मुलामियत से कहा, “बनिया दादा, न तो हमरे पास इत्ता पइसवाँ है ना ही कऊनों दरकार। काहे के न तो लगान कम भवा है, ना ही नज़राना कम भ है। यही से हम कही रहेन है, के सरकारी रेट से कपड़ा ब्याचों , नहीं तो हियेँ किसान जुट जहिए और दूकान न चले दिन जाई” ।

इतना सुनना था कि बद्री अपने दबे हुए गुस्से पर काबू न रख सका। उसने सोंचा आज दब गए तो किसान फिर बार-बार यही तर्क देंगे, फिर यह भरोसा भी था कि पास में तो पुलिस चौकी है, इनसे निबट लिया जाएगा। उसने तमक कर अपने नौकरों को आवाज देते हुए कहा, “कौनों है अंदर, सबै निकरों, और इन सबका नीचे निकार कर खदेरों; चले हैं बज़ाज़ा खरीदे । टेंट नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने” ।
आड़ी-तिरछी बात सुनकर राम ग़ुलाम का भी धीरज जवाब दे गया। वह भी ज़ोर से बोला – ऐ बनिया ! जबान संभारकर कर बात करो।

“का संभारी कौओनों डिराइत हैं का , ई बाबा जाने कहा से आगयेन जाने का का बोले लाग। देखो तो पासी पस्स्टा नेता बने लाग” । तैश में आकर बद्री ने ऊँचे स्वर से बोला।

“हे बनिया बक्काल !, हम कहित है जुबान संभाल लियो नहीं तो तुम का ठीक कर द्वाब और हम भूल जाब के तुंहरे हिय बैठन हैं” । राम गुलाम ने रामकिसन के रोकने के बावजूद भी गुस्से से आग बबूला होते हुए उतनी ही ज़ोर से जवाब दिया।
इस वाद विवाद में दोनों ने ही देखा की आस पास के किसानों का झुंड तब तक दूकान के सामने जमा हो चुका था।

अब किसानों को यह बरदाश्त नहीं था कि कोई, उनके किसान भाई से, अबे-तुबे करे। एक जोशीले नौजवान ने, जो यह वार्तालाप सुन रहा था। लठ्ट चमकाते हुए कहा, “सुनत हो बदरिया, ई लठ्ट अइसेन नहीं तेल पियत है, चले लगी तो तुंहरी दूकान, तुंहरे खनदान दुनों का पता न लागि”।

बाज़ार का शोर सुनकर अगल-बगल के दुकानदार और किसान दोनों इकठ्ठा हो गए। इतने में किसी ने अफवाह फैला दी की किसान सभा की मुठभेड़ हो गयी है। फिर क्या था बदहवास से किसान डीह बाज़ार की तरफ दौड़ लिए। प्रतिकार का सुप्त लावा एक झटके में बह निकला, आखिर कब तक सहैंगे – अब तो लड़ेंगे और मरेंगे ।

देखते-देखते किसानों की भीड़ ने, दुकानदारों की भीड़ को बौना कर दिया । किसी ने आवाज़ दी अगर सरकारी रेट पर न दे तो दूकान लूट लो, देखते ही देखते बद्री बनिया की दूकान खाली हो गयी। आनन-फानन में पुलिस आई तब तक बहुत पानी बह चुका था, दुकान लूटी जा चुकी थी। मामला दर्ज किया गया और तफ़तिश शुरू हो गयी।

रायबरेली के जिला कलेक्टर, मि॰शेरिफ़ अपने कार्यालय में डीह की घटना पर विचार कर ही रहे थे कि हरकारा एक जरूरी खबर लेकर आया। खबर थी कि किसानों ने आज ‘चंदनीहा इस्टेट’ की घेराबंदी का एलान कर दिया है। इसी के बाद एक और खबर उनके कार्यालय में आई, जो कम गंभीर नहीं थी, वह यह थी कि फुर्सतगंज में भी हालत अच्छे नहीं हैं। वहाँ पर किसानों द्वारा बाज़ार लूटने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन, शेरिफ़ साहब के दिमाग में चंदनीहा के घेरे की खबर ज्यादा चिंतित करने वाली थी। क्योंकि यह ताल्लुकेदार को हटाने के लिए उसके विरुद्ध घेरा था।

चंदनीहा रियासत के ताल्लुकेदार बड़े रसूख वाले आदमी थे। उनमें रईसों के वो सारे दुर्गुण मौजूद थे, जिन्हें रईसजादे शौक कहते थे। सुबह से शाम तक रंग महल में कार्यक्रम चलते रहते थे। रियासत, कारिंदों के रहमो-करम पर थी। इन कारिंदो पर हुकुम चलता था, उनकी एक रखैल अच्छिजान का। अच्छिजान के लिए पैसे से बढ़ कर कोई चीज नहीं थी। पैसा वसूलने और अत्याचार के नए – नए तरीके इस रियासत में गढ़े जाते थे।

लगान हो या बकाया हो, या बेगार की इनकारी, हर जुर्म की सजा तय थी। ऐसी ही एक सजा थी, ऐसे महुआ के पेड़ से बांधना जिसमें ऊपर से नीचे तक चींटी का बसेरा था। उस पर किसान को बांध कर उस पेड़ पर शीरा या राब छिड़क दी जाती थी। शायद ही कोई किसान उस दंड के बाद जीवित रह पाता होगा। कहीं गले में बेल के फलों की माला डालकर, हाथ बांधकर पेड़ से लटका दिया जाता था। किसान तिल-तिल कर दम तोड़ रहा होता था और अच्छिजान विद्रुप हँसी हँसती रहती थी। इन सबसे बेखबर राजा त्रिभुवनबहादुर सिंह अपनी रासलीला में मग्न रहते थे। हालांकि अंग्रेज़ भी ऐसे ही ताल्लुकेदार चाहते थे जो किसानों पर पूरा जुल्म करें लेकिन उनके तलवे जरूर चाटें ।

चंदनीहा इस्टेट का गाँव, ‘पूरे खुशहाल’ , कोई बहुत बड़ा पुरवा नहीं था। लेकिन इस गाँव में आजकल किसानों का बहुत आना-जाना था। रायबरेली के किसानों के आंदोलन का यह एक केंद्र बन गया था। बने भी क्यों ना ? पाँच सौ लढ़ियन (बैलगाड़ी) का दस्ता, जब सुल्तानपुर होकर फ़ैज़ाबाद और अयोध्या पहुँचा था, तो रुरे के किसानों से ज्यादा, लोगों को बैलों के सींगों और बैलगाड़ी की छतरी के किनारों पर लगी तख्ती याद थी- जिन पर लिखा था – “हारी बेगारी बंद हो”, “नज़राना बंद हो”, “गांधी बाबा का सुराज कायम हो” , रायबरेली का यह दस्ता जिधर से गुजरा उधर से लोग मंत्र-मुग्ध होकर देखते रह गए।

गाड़ियों पर बैठी महिलायेँ और बच्चे,और इनके मनमोहक लोकगीत जैसे उनके वर्षों के संचित दुख-दर्द को एक पल में ही मिटा देना चाहते हो। इस पूरे महाभियान के नायक, अमोल शर्मा, छह फुट से कुछ नीचे कद का लंबा, गठीला सुंदर नौजवान। असली नाम अमोल दुबे, लेकिन बाबा रामचंद्र की संगत और बाबा द्वारा न जाने क्यों हर बार उन्हें ‘अमोल शर्मा’ कह कर पुकारने से, कांग्रेस के आन्दोलन से जुडने और शहर-शहर घूमने के बाद उसने अपना नाम परिवर्तित कर, अमोल शर्मा ही कर लिया था।

बाबा रामचन्द्र के नाम की ऐसी ललक थी कि वह होशोहवास छोड़कर, गाँव-गाँव घूमकर रायबरेली के किसानों को इकठ्ठा करने लगा। इसी सघर्ष में अपनी पच्चीस बीघा खेती का भी ध्यान नहीं रहता था। पत्नी थी, लेकिन घर गृहस्थी उनके लिए बनी नहीं थी। कोई संतान नहीं थी, ज्यादा चाहत भी नहीं थी। ताल्लुकेदार त्रिभुवन बहादुर सिंह के कान में भी इनकी इन गतिविधियों की खबर थी। लेकिन, अमोल को रानी कुँवर का स्नेह प्राप्त था। इसलिए कुछ नहीं कर पाते थे। रानी जब भी कतकी (कार्तिक पुर्णिमा) के मेले में नहाने के लिए सरदार गंज के लिए निकलती तो उनका डोला, अमोल शर्मा के घर के पास जरूर रुकता था। क्योंकि उस चौहद्दी में सम्मानित ब्राह्मण का केवल यही एक परिवार था। अमोल शर्मा के निष्कपट व्यवहाँर एवं खरी बात से रानी, बहुत प्रभावित भी थीं । कई मौकों पर अमोल शर्मा ने, त्रिभुवनबहादुर सिंह के द्वारा अपनी रखैल, अच्छिजान के द्वारा प्रशासन में अत्यधिक दखल का भी विरोध जिलेदारों और राजा के कारिंदों से किया था। जिसकी खबर राजा को मिल चुकी थी। लेकिन उनके ऐशो-आराम की तलब ने और रईसों के उन दुर्गुणों ने, जिसे वे अपनी शान कहते थे उन्हें इस कदर घेर रखा था कि उन्हें इन सभी बातों का ध्यान ही नहीं रहता था।

हाँ, उन्होनें इतना जरूर किया कि जब रानी ने अमोल शर्मा का पक्ष लिया तो उन्होनें उनके खेतों की बेदखली के आदेश जारी करवा दिये ।

तभी एक अप्रत्याशित घटना घट गयी। पास के पुरवे का गरीब किसुन अपने बेटे का गौना लेकर आया था। रिवाज के मुताबिक किले की ढ्योड़ी पर पैर छूने और आशीर्वाद लेने जाना था। किसान को इसका भी नजराना, राजा को देना पड़ता था। अमोल शर्मा की ड्योढ़ी पर पहले पहुँच कर किसुन ने उसे बताया कि वह चंदनीहा गढ़ी जा रहा है। अमोल शर्मा समझ तो गए पर कहा कुछ नहीं और बुदबुदायेँ , “कुछ दिन और रुक जाओ ई सब बंद हो जायी”।

संयोग से वहीं पर गढ़ी का कारिंदा भी मौजूद था, जिसे किसुन नही देख पाया
चंदनीहा पहुँच कर बेटा-बहू के साथ किसुन सबसे पहले शीतला माता के मंदिर गया। वहाँ मत्था टेक कर गढ़ी पहुंचा। दिन चढ रहा था, गढ़ी में उस समय राजा कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे, अच्छिजान अचानक धीरे –धीरे कदमों से चलते हुए पीछे से आ गयीं। किसुन और उसके बेटे-बहू ने दूर से ही राजा त्रिभुवन बहादुर सिंह के चरण के लिए पहलगी की। राजा ने कुछ नहीं बोला, कारिंदे की ओर इशारा किया और निकल गए। कारिंदा उन्हें लेकर अच्छिजान के पास चला गया ।

अच्छिजान का रूप सौन्दर्य देखकर राजा तो क्या कोई भी साधारण व्यक्ति मोहित हो सकता था। अच्छिजान की माँ पास के ही गाँव छिच्छेमऊ की थीं। और , अपने समय की इलाके की मशहूर तवायफ थी। उन्हें रईसों को खेलने, खिलाने, और कैसे उन्हें फंसाना है, उसके सारे गुर मालूम थे । अच्छिजान सोलह वर्ष पार करते-करते हर विधा में पारंगत हो चुकी थी। ऐसे समय में ही एक दिन गढ़ी से मुजरे का बुलावा आ गया। दरअसल लखनऊ से गवर्नर साहब के कुछ खास दोस्त दौरे पर आए हुए थे। उनके सम्मान में लाजिमी था कि खास इंतज़ाम किए जाएँ , और नक्कासा का नाच से बढ़ कर मनोरंजन का क्या साधन हो सकता था ! इस दिन का, अच्छिजान की माँ को भी इंतज़ार था। समय अनुकूल जानकर, अच्छिजान की माँ ने,अच्छिजान को अपने जीवन के सारे अनुभवों के साथ स्वयं को प्रतिबिम्बित करते हुए मुजरे पर उतार दिया। अच्छिजान के नाक-नक्श और अदाएं सभी के दिल में उतर गयीं।

सभी मेहमान तो चले गए, लेकिन अच्छिजान राजा के दिल से ना गयीं । उस समय के इलाकेदारों में भी सम्मान पाने के लिए -यह जरूरी होता हैं, आखिर ताल्लुकेदार हों और एक भी रखैल न हो तो बिरादरी में वो शान नहीं रहती। यह कोई मुरारमऊ के ताल्लुकेदार तो हैं नहीं, जो न बेदखली करे, न नजराना ले और साधू की तरह रहे। आखिर उन्होनें अच्छिजान की नथ उतरवाने और उसे अपने पास रखने का पैगाम, अच्छिजान की माँ को भिजवा दिया। न नुकुर की कोई गुंजाइश नहीं थी । यह बात तो अच्छिजान की माँ भी समझती थी, लेकिन वो, पूरे मौल-भाव करके ही अपनी बेटी को भेजना चाहती थी। आखिर कीमत तय हुई और अच्छिजान का डोला, चंदनीहा गढ़ी में आ गया। तब से त्रिभुवनबहादुर सिंह उसके जाल में ऐसे फँसे कि अपनी ब्याहता धर्मपरायण पत्नी को ही भूल गए। रानी में भी आन-बान का खून था। उन्होनें भी राजा की परवाह नहीं की और अपने धरम-करम में लीन हो गयीं। इससे अच्छिजान को और बल मिल गया और धीरे-धीरे पूरी रियासत की सर्वेसर्वा बन गयी। आखिर कारिंदो को जब लूट-पाट का साथ मिल रहा हैं तो वे कब चुकने वाले थे।

कारिंदे ने शायद किसुन के अमोल शर्मा से मिलने की घटना का विवरण दे दिया होगा। अच्छिजान ने विद्रुप हंसी हँसते हुए नजराने के सवा रुपये और पान का बीड़ा बहू के हाथ से ले लिए और उसका मुंह का घूँघट उठा कर देखा और किसुन को देखकर बोली -“जाओ महतो तुंहरी बहू की बिदाइ बिहाने होई”।

“दुहाई हो सरकार की ! अबय तो गाँव घर की देवी गुसैयाँ नहीं पूजी गयी । रात गौनहा आए हैं और हम ड्योडी छूयाए हिय ले आएन” किसुन गिड़गिड़ााया ।

“तो का भा याह तो रीते हैं कि बिदाई बिहाने होत है”, कुटिल मुस्कान के साथ अच्छिजान ने कहा।

“नहीं सरकार! रानी साहिबा, याह रीत बंद कर दीन है”, किसुन फिर गिड्गिड़ाया ।

“आउर या रीत कब ते चली हय के पंडित के हिया पहले ड्योड़ी छुआई जाय” । अच्छिजान ने आक्रोश के स्वर में बोला।

“सरकार वुई तो विप्र हैं, और व्यवहारी हैं । रास्ता मा रहे यही से चले गए रहन”।

किशुन समझ गया था, कारिंदे ने लगा दिया है, काश पहले उसे कुछ दे देता। इस से पहले वह और कुछ सोंचता,

“सरकार से मुँह लगते हो किसुन” –कारिंदे ने ज़ोर से झिड़का।

“सरकार आप से बाहर कहाँ हैं गाँव दुई कोस हैं काज-फसल का हर्जा होई, दुई-दुई बार आवे का पड़ी”, स्थिति को समझते हुए किसुन ने गुजारिश की।

-“आऊर जबे लढियाँ से अमोल शर्मा के साथे अजोध्याजी गे रहाओ तबे हर्जा न भ रहा”, अच्छिजान ने कहा। फिर थोड़ा डांट कर बोली
बेटे ने स्थिति की गंभीरता को समझा और फिर गुहार लगाई,

“सरकार हमहू हिएन बने रहब जाऊन काम बतहियों करि द्याब “।
अच्छिजान ने कुछ सोंचा और बोली, ठीक हैं इसे भी यहीं छोड़ दो और नवब्याहता से बोली, चल अंदर चलकर मेरे पैर दबा ।

इतने में रनिवास से कुछ हलचल हुई। खबर आई कि रानी साहिबा आँगन में आ रही हैं। अच्छिजान उनके सामने नहीं पड़ती थी। तुरंत ही अंदर अपने रनिवास में चली गयी।

रानी साहिबा ने देखा तो मजमा लगा हुआ था और लड़के को लेकर काम करवाने कारिंदा जा चुका था। लेकिन, किसुन ठगा सा निहार रहा था। जैसे ही उसने रानी को देखा तो उसके सब्र का बाँध टूट गया और अपनी पूरी चीत्कार के साथ रानी के चरणों में लोट गया। रानी ने इशारा किया तो साथ की परिचारिका ने पुचकारा और ढांढस बँधाया। किसुन ने मुलाक़ात का पूरा विवरण सुनाया और बताया कि, किस तरह से अच्छिजान उसकी बहू को लेकर अंदर चली गयी हैं।

रानी की मुखमुद्रा विषाद से भर गई। अपनी बेचारगी का उन्हें अहसास हुआ, लेकिन कर भी क्या सकती हैं ? राजा से बोलचाल बंद है, अच्छीजान से बात नहीं कर सकती। उन्होनें जिलेदार को बुलाकर पूछा, “जब मैंने सख्त शब्दो में ताकीद की है कि यह प्रथा मैं बंद कर चुकी हूँ, तो आज इस गरीब किसान के साथ यह अन्याय क्यों हुआ ”

जिलेदार मन ही मन रानी का समर्थन करते थे, लेकिन अच्छिजान के सामने बोलने कि हिम्मत नहीं थी । रानी ने निश्चय किया और अंदर अच्छिजान को सुनाते हुए जिलेदार से बोला, “राजा साहब से और उनकी पतुरिया से भी कहना कि आज अभी इसी क्षण से हमनें अन्न-जल त्याग दिया है। अभी इस किसान कि बहू को लौटाया जाये और जब तक राजा हामी नहीं भरेंगे कि आगे से ऐसा नहीं होगा, तब तक मैं अन्न-जल नहीं ग्रहण करूँगी “।

रानी की प्रतिज्ञा सुनकर किसुन, हतप्रभ रह गया। उसे लगा कि रानी डांट-फटकार कर उसे उसकी बेटा-बहू दिलवा देंगी। लेकिन, उसे जब रानी का हठ दिखा तो वो रानी के लिए चिन्तित हो गया । ले देकर अभी भी रानी ही सहारा हैं। अब उसे अपनी बहू-बेटे से ज्यादा चिंता, रानी की हो गयी, क्या करे, कहाँ जाये? देखा रानी धीरे-धीरे रनिवास की ओर चली गयी ।

किसुन, गढ़ी से बाहर निकलकर सीधे अमोल शर्मा के पास गया। संयोग से उस समय पट्टी के बाबा जानकी दास भी बैठे हुए थे।बाबा जानकी दास आजकल प्रताप गढ़ न रह कर रायबरेली के किसानों को एकजुट कर रहे थे। ऊँचाहार के किसान सम्मेलन की चर्चा चल रही थी। निखरी हुई धूप में पचास-साठ किसान कुछ खटिया पर,तो कुछ नीचे मैदान में बैठे थे। इनमें बहुत से किसान ऐसे थे जिनकी जमीनें बेदखल हो गईं थीं , करने को कुछ नहीं था। अमोल शर्मा के पास आकर बैठ जाते थे। कम से कम दो जून की रोटी तो लंगर में मिल ही जाती थी। अमोल शर्मा ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी, कोई भी उनके घर से भूखा नहीं जाता था।

किसुन अपने होशो-हवास गुम किये एक कोने में जा कर चुप चाप बैठ गया। बात करते-करते अमोल शर्मा की नजर किसुन पर पड़ी। चेहरे के भाव देखकर कुछ आशंकित हुए और उससे पूछा ,

“का हो किसुन हुई आय गढ़ी, बेटा-बहू कहा हैं। गांवे गे का”।

किसुन ने धीरे से सिर उठाया, सोंचा क्या कहूँ , गाँव मा पुरखिन को का मुंह दिखायेंगे, के बहुरिया का गढ़ी छोड़ आय। गाँव के पट्टिदार दबी आँखों से कुटिल मुस्कान भरेंगे। बाबा की ओर देखा और आँख से आँसू छलक आए। अमोल शर्मा के अंदर सिहरन भर गयी। जिस आशंका से उन्होनें पूछा था, वही सच हो गयी।

किसुन को इशारा किया। किसुन धीरे कदमों से पास आ गया। अमोल शर्मा ने कुछ न कहा , केवल इतना पूछा – “रानी न रही का” ?

किसुन ने पूरी कहानी बताई, और बताया कि रानी ने अन्न-जल त्याग दिया है।

अमोल शर्मा ने गुस्से से अपने होंठो को दबा लिया और इतना किटकिटा कर दबाया कि होंठो से खून निकल आया। उनका हाथ जबरन झोले में रखे गंडासे पर चला गया। बाबा जानकी दास हतप्रभ थे। अभी तो कैसी-कैसी बातें चल रही थीं, और तैयारी हो रही थीं कि उत्तरपारा, और सुरसना मा किसान सभा की जाये। लेकिन, अभी- अभी अमोल शर्मा को इतना क्रोध आखिर किस बात पर आ गया । जानकी दास ने पूछा-“का पंडितजी, का भईल !”

“कुछो नहीं बाबाजी। एक अत्याचारी के अतिचार का खामियाजा एक पतिव्रता स्त्री को भुगतना पड़ रहा हैं। यह हमें बर्दाश्त नहीं है। आज धरम और अधर्म के बीच युद्ध होकर रहेगा” ।

“बात का है, कुछ बतइबो,” जानकीदास नें कौतुहल से पूछा ?

बाबा ने तफसील से पूरा घटना क्रम को बतलाया। डीह की पिछली घटना के बाद किसानों का अगला निशाना अच्छिजान बन गयीं। किसानों ने चंदनीहा में किसान-सभा की घोषणा की। उनकी मांग थी कि अच्छिजान को हटा कर पुरानी रानी साहिबा को रानी का दर्जा दिया जाये। क्योंकि, सभी किसान रानी के उदार व्यवहार को जानते थे और चाहते थे कि यदि रानी के हाथ में शासन आ गया तो अच्छे जमींदारों की तादात में वृद्धि हो जाएगी। साथ ही किसानों को आगे की लड़ाई का संबल मिल जाएगा।

किसुन की व्यथा सुनकर, हर किसान का रोवाँ फड़क उठा। सबने कहा गढ़ी पर चढाई किन जाये। कुछ तो इसी दम घेरने का मन बना चुके थे। लेकिन पचास-साठ किसान मिलकर गढ़ी को नहीं घेर सकते थे। क्योंकि, राजा के पास ही सौ-दो सौ सिपाही हमेशा रहते थे। अमोल ने कुछ निश्चय किया और घर के अंदर की दहलीज से गायब हो गए। अभी किसानों का यह वार्तालाप जारी ही था कि घंटे की आवाज सुनाई दी।

सभी ने चौंक कर देखा कि अमोल के घर की छत के तिमंज़िले पर घंटा बंधा हैं। अमोल शर्मा, दे-दना-दन, पसीने से लथपथ उस पर प्रहार कर रहे हैं। घंटे की आवाज वैसी न थी जैसी की सत्यनारायन की कथा की आरती के समय सुनायी देती थी। यह देवी शक्ति के दरबार में लगायी हुंकार, के समान घंटे की दीर्ध टन….टन…..टन…..टन से अपना रोष प्रकट करने की आवाज थी। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि यह पुकार, आदि-शक्ति के दरबार में युद्ध की ललकार के लिए कोई लगा रहा है, और उस महायुद्ध की अनुमति माँग रहा है। अमोल उस सर्दी में भी पसीने से लथपथ घंटे पर प्रहार करते जा रहे थे। और उन्होनें वही से हुंकार कर आवाज लगाई , “चंदनीहा का राजा त्रिभुवन बहादुर सिंह सुन ले ! आज से किसान भाई और अमोल शर्मा उन्हें राजा मानने से इंकार करत हैं। हम पंचे उनके अत्याचार खातिर, रानी माँ का न मरे द्याब, या तो वुई अपनी गद्दी छोड़े और अपनी सल्तनत् आलमपुर मा चले जाये। इहाँ रानी माँ का अधिकार दे दे। नहीं तो काल्हें, किसान उनकी गढ़ी का घेराव करीहे और तब तक जारी रखा जायी, जब तलुक राजा और अच्छिजान और छोटी जान का रियासत से बाहर न कर दिन जायी”।

अमोल शर्मा के मुंह से एक नारा फूट पड़ा-

चलो किसान!
जब हौइहे राजा हलकान
तब ही हुईहे
जीवन आसान
राजा का हटाइके,
रानी का बिठाइयके
बेगैरत का, भगाइयके
आइहे सुराज
चलो आज फिर घेरा है, चंदनीहा का, चंदनीहा का,

इधर किसान आपस में बतिया रहे थे, उधर घंटों  की आवाज, घई जलालपुर, गदागंज होते, दिनशाह गौरा और उससे भी आगे के गाँवों  तक ध्वनि की भी तेज रफ्तार से फैल गयी। हर किसान ज़ोर-ज़ोर से एक ही स्वर दे रहा था – चलो चंदनीहा का घेरा है, – रानी माँ संकट मा हैं।  यह आवाज एकता तो दे रही थी,  लेकिन  एक रोष सा भी प्रकट कर रही थी। मानो कोई माँ-काली के दरबार से आवाज आई हो – निकर पड़ो जहाँ जो किसान मिले चाहे हरहान, खलिहानन मा , खेतन मा, घरन मा, रहट मा, कुआं पर सब का कहो सब अपना कामकाज छोड़ कर गढ़ी पर पहुंचे। याद रहे लड़ाई बहुत जोरदार हैं दस हजार से कम किसान हुआ तो हारी है।

घटना क्रम इतना उत्तेजना पूर्ण था कि सारे किसान अयोध्या में बाबा कि बातों  को याद कर दौड़ लिये। किसुन भी अपने गाँव अपने पट्टीदारों को और हेत व्यवहारीयों  को लेने दौड़ पड़ा । अब उसकी दीनता आक्रोश में तब्दील हो चुकी थी । किसान जाग रहा था – जग रहा था, अपने स्वत्व के संघर्ष के लिए।

एक घंटे बाद से ही अमोल शर्मा ने देखा कि किसानों के हुजूम के हुजूम, ‘पूरे खुशहाल’ गाँव , की और बढ़े चले आ रहे हैं।

आज किसान जाग गया था।

इस घटना-क्रम की जानकारी और चेतावनी कारिंदो के माध्यम से त्रिभुवन सिंह तक भी पहुँच गयी थी। अभी कुछ दिन पहले ही किसानों  के ऊपर इल्जाम गढ़ा  गया था की  उन्होंने  ‘गौरा बाज़ार’ का डाकखाना लूट लिया था । त्रिभुवन सिंह ने इस घटना को  दूसरा रूप दे दिया। उन्होंने जिला कलेक्टर को सूचना दी कि  किसान उनकी गढ़ी  और  कचहरी का घेराव करने आ रहे हैं, और दंगों का अंदेशा है। डीह बाज़ार की घटना से सरकार सतर्क  थी, तुरंत एक गारद सेना चंदनीहा रवाना कर दी गयी। लेकिन, इससे पहले शाम से ही किसानों का जमावड़ा वहाँ  अच्छी ख़ासी तादाद में हो चुका था। सेना को देखकर उन्होनें कचहरी का घेराव कर दिया। पुरानी रानी को गद्दी नशीन करने तथा नज़राना और बेदखली बंद करने की मांग करने लगे।

पुलिस ने उन्हें हटाने या खदेड़ने का कोई प्रयास नहीं किया।  क्योंकि तब तक अमोल शर्मा और बाबा जानकी दास, घटना स्थल पर नहीं पहुंचे थे।  लेकिन, जैसे ही किसानों  ने अपने नेता अमोल शर्मा, बाबा जानकी दास और बद्रीनारायण को देखा तो जोश में आ गये ।  अमोल शर्मा ने ज़ोर की गुहार लगायी,

“बाबा रामचंद्र की जय”,

“गांधी बाबा की जय”,

“किसान सभा की जय,”

गगन भेदी आवाजों से वातावरण गूँज  उठा और अमोल शर्मा की जय, बाबा जानकीदास की जय, “चंदनीहा की रानी की जय” के नारे वातावरण में गूँजने लगे।

राजा के सिपाही दाँत  पीसते हुए किसानों की तरफ बढ़ने लगे। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं था की किसान उनके आगे सीना ताने चले । आखिर वे भी तो उस शोषण- चक्र के पहिये हैं। किसान भी अब रुकने वाले नही थे। वर्षों  से संचित गुस्सा फुट पड़ने को आतुर था। देखते ही देखते पुलिस और किसानों  की भिड़ंत हो गयी। इतने में त्रिभुवन सिंह ने आग में घी का काम किया, उन्होंने अपनी बंदूक निकाली और किसानों को गालियाँ देते हुए लोड करते हुए सामने आ गए। किसुन का लड़का वही पर कारिंदों की भीड़ के साथ असहाय सा खड़ा हुआ था। कल के संचित घटनाक्रम का अपमान और गुस्सा लावा बन कर फूट गया।  राजा ने सोंचा कोई कारिंदा हैं। लेकिन देखा, किसुन के लड़के ने, आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और तपाक से दो चांटे त्रिभुवन बहादुर सिंह के गाल पर जड़ दिये। राजा तो स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे की इतनी सुरक्षा के बीच भी कोई ऐसा कर सकता है।

कारिंदों  की भीड़ ने किसान नवयुवक को घेर लिया और अंदर ले जाने लगे। तब भीड़ ने दौड़ कर कुछ कारिंदों और युवक को बाहर खींच लिया।  इनकी अगुवाई “हंसा का पूरवा”, गाँव का बदलू बेड़िया कर रहा था। देखते ही देखते पुलिस के  द्वारा किसानों पर लाठी बरसने लगी। भीड़ टस से मस न हुई। इतने में रायबरेली से अतिरिक्त गारद आ धमकी और हवा में गोलियाँ चलने लगी।  पुलिस के कप्तान के साथ आए, खुफिया पुलिस के सिपाही ने उस तरफ इशारा किया जिस तरफ किसानों  के नेता, अमोल शर्मा, बाबा जानकीदास, और बद्रीनारायण खड़े हुए थे।

इस अफरा-तफरी में किसानों को ध्यान ही नहीं रहा की अपने नेताओं को घेर कर रखना है। लेकिन, अब बहुत देर हो चुकी थी। उसी तरफ फोर्स को घेरने का हुक्म हुआ  और तीनों को जबर्दस्ती गाड़ी में बैठा लिया गया। जब तक किसान कुछ देख पाते, तीनों नेताओं  को पुलिस जेल ले जा चुकी थी। बाद में पता चला की उन पर ताल्लुकेदार को जान से मारने, बलवा फैलाने, और डकैती की धारायेँ  लगाई गयी हैं।

किसानों ने इस घटना की खबर बाबा को पहुँचाने की कोशिश की और सहदेव सिंह  तक बात पहुँच गयी। वे बाबा के लिए चिंतित थे । अयोध्या के बाद से  बाबा का कुछ अता-पता नहीं चल रहा था। ऊँचाहार की सभा की तैयारी अभी बाकी थी। बाबा होते तो राह-सलाह कर कोई रास्ता निकाला जाता, उधर अमोल शर्मा और बाबा जानकी दास की गिरफ़्तारी के बाद यह अफवाह भी फैलने लगी की बाबा भी गिरफ्तार हो गए हैं, और रायबरेली जेल में ही रखे गये हैं।  अब तो जैसे किसानों  का लहू उबलने लगा ।

4 जनवरी 1921, फुर्सतगंज बाज़ार में बेमकसद किसान इकठ्ठा हो गए। क्या करे किसान सभा की स्थापना के बाद से बाद आस-पास के जमींदारों  ने बहुत से किसानों  पर बेदखली  जारी कर दी थी। वैसे भी अवध में छब्बीस फीसदी किसान तो भूमिहीन थे और सैंतीस फीसदी ऐसे थे, जिनकी जोत पाँच बीघे से कम थी। इस आंदोलन के बाद भूखों की फौज तो बढ़ ही चुकी थी और बेरोजगार किसानों  की यह  फौज बेमकसद इधर-उधर घूमती रहती थी। किसानों  का झुंड अपना रोष प्रकट करने का कोई साधन ढूँढने लगा।  दूकानों की लूट-खसोट के अंदेशे के नाम पर पुलिस को बुला लिया गया। परगना हाकिम जनाब नसरुल्लाह खान ने स्थिति का आकलन कर  सभी दुकानों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया। किसानों का पारा चढ़ गया वे सरकार के किसी आदेश को मानने को तैयार नहीं दिखे।

किसानों ने सरकारी रेट पर कपड़ा और अनाज देने की मांग की और बाजार खुलवाने पर ज़ोर दिया। नसरुल्लाह स्वयं को ऐसा सख्त अफसर समझता था, जिसके आगे कोई भी नहीं टिक सकता।

अभी तक किसी किसान ने हाकिम से नज़र मिला कर बात नहीं की थी, चेहरा ऊँचा कर के बात करना तो बड़ी बात थी। किसान सत्ता का ऐसा चेहरा था जिसने केवल एक बात सीखी थी कि जब तक सिर पाँव के नीचे रहेगा तलवे सहलाये जाते रहेंगे। सिर उठ गए तो सीने तक आ जाएंगे और जब सिर उठ कर बोलने लगे तो उन तर्को का साम्राज्य के पास कोई जवाब नहीं होता। ऐसे समय या तो उनको रीति-रिवाजों और धर्म के ढकोसलों  के नाम पर शोषण के उन तरीकों को लागू कर दिया जाता है, और यह तब तक किया जाता हैं जब तक कि  सिर तलवों के नीचे न आ जाए, नहीं तो उन सिरों को कुचल दिया जाता है । अन्यथा  उनका साम्राज्य नेस्तनाबूद हो जाएगा ।

आज वह स्थिति थी जब सरों ने झुकने से मना कर दिया। अत: नसरुल्लाह की निगाह में सरों को कुचलने के अलावा कोई चारा नहीं था। उसने गोली चलाने का आदेश जारी कर दिया, न कोई चेतावनी न कोई लाठी चार्ज। वह अपना आतंक और क्रूरता दोनों ही सिद्ध करना चाहता था।  गोली चली और तब तक, जब तक या तो किसान जमीन पर न पड़ा मिला या आँखों से ओंझल न हो गया। सरकारी रिपोर्ट आयी  छह लोग मारे गए और बीस घायल मिले । सभी पर डकैती और बलवा फैलाने का मुकदमा चलाया गया । घायल और मारे गए लोगों  में कोई अंतर नहीं किया गया । लिस्ट आई चार मुराई, तीन  कोरी, दो चमार, आठ पासी, एक ब्राहमन, कुर्मी, गड़रिया, अहीर, गुड़िया, भुरजी,  ठाकुर , सतियों  जात शामिल थीं।  सभी किसान थे जातपांत  के बंधन घायलों  और मारे गए लोगों  के नहीं थे। सभी किसान थे । सिद्ध हुआ किसान की सिर्फ एक जात होती है – किसान – और कोई नहीं । जाति-धर्म की बाधा टूट रही थी। दूसरी और रिपोर्ट ने बताया की पुलिस ने केवल आत्मरक्षा में गोली चलायी।  बेचारी पुलिस, किसानों  के तर्कों  और एकजुटता को नहीं तोड़ पायी तो अपनी आत्मरक्षा के लिए गोली चलायी। यह बात और थी की किसी भी पुलिस वाले को खरोंच तक नहीं आई,

“समरथ को नहीं दोष गुसाइ”

ताल्लुकेदारों ने खबर पा कर चैन की सांस ली, और सोंचा अब तो किसानों  की अक्ल ठिकाने लग जाएगी ।

लेकिन, अगले ही दिन की घटना ने फिर सारे अनुमानों  को तहस-नहस कर दिया ।

यह घटना मुंशीगंज बाज़ार में हुई। मुंशीगंज रायबरेली से सटा हुआ कस्बा है। जहाँ पर जगतपुर, भाँव, सेमरा, टिकरा, नवाबगंज,कप्तानगंज, बेला, नन्दन का पूरवा, उत्तरपारा, चंदौली, वाइनी का पूर्वा, शंकरपुर, इत्यादि आस-पास के गाँवों के किसान अपने शादी-ब्याह और जरूरत की चीजों के लिए खरीददारी करने आते हैं। किसी समय यह शंकरपुर रियासत का भाग था।  मगर राणा बेनी माधव के पराभव के साथ अंग्रेजों ने इस रियासत के टुकड़े-टुकड़े कर के कई भागों में बाँट दिया। इसका एक टुकड़ा सरदार दिलीप सिंह के वंशज वीरपाल सिंह के पास था। वो  उतना ही क्रूर था जितने की अंग्रेज़। वीरपाल सिंह अंग्रेजों को प्रसन्न  करने के लिए कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहता था।

उधर चंदनीहा कांड के बाद इकठ्टा  हुए किसानों  ने भी कसम खा ली थी कि वे अब जब तक  अपने नेताओं  को नहीं छुड़ा लेते, घर नहीं जाएंगे और चंदनीहा से इनकी अगुवाई  ‘हंसा का पुरवा’ का बदलू बेड़िया कर रहा था। वो दरअसल अमोल शर्मा की छाया था। उन्हीं  के द्वारे पर पड़े रहना और उनका, अंगरक्षक, किसान, हरकारा सभी वह था। उस दिन भी अगर वो किसुन के लड़के को छुड़ाने के लिए अंदर न घुसा होता, तो पुलिस को अपने जिंदा रहते अमोल शर्मा को न ले जाने देता। उनके जेल  जाने पर  उसने ही नहीं, सारे किसानों  ने गंगाजली उठा कर कसम भी खा ली थी की अपने नेताओं  को छुड़ाएंगे – इधर एक अफवाह और ज़ोर से फैल गयी की ऊंचाहार की सभा के लिए बाबा रामचन्द्र,  रायबरेली आ रहे थे तो उन्हें  गिरफ्तार कर रायबरेली जेल में ले जाया गया है।

फिर क्या था, किसानों  ने कसम खा ली की अपने नेताओं  को छुड़ाएंगे और जेल का घेराव किया जाएगा।  जो किसान घेराव से भागेगा वो अगर हिन्दू है तो  नौ गायों के कत्ल का दोषी होगा और यदि मुसलमान  है तो नौ सूअर की हत्या का दोषी  होगा। इस कसम ने बिजली का काम किया, दूर-दूर से किसानों  के जत्थे के जत्थे  निकल पड़े, अपने नेताओं को आज़ाद करवाने के लिए। बीच-बीच में जहाँ मौका मिला जमींदारों  के गोदाम भी लूट लिए गए। आखिर बरसात गर्मी में हमें  ही तो ड्योढ़ा-सवाई  बेचा जाएगाँ।  क्यों  न अभी लूट ले, घेरे के काम ही आयेगा। खुरेती, आगतपुर, गौरा, चंदनीहा ,चिंचेंदी ,टिकरा गाछीपुर, सुरसना, भरसना , बेला भेला, कप्तान का पुरवा, बेला गुसीसी, चक बल्लिहर, सराय टिकटह ,टेकई इत्यादि जहाँ देखों  किसानों  के जत्थे के जत्थे निकल पड़े।  ऐसा लगता था कि  मानव-समूह ने अभी तक की  बनाई शोषण की सारी वर्जनाए तोड़ दी हैं ।

मुंशीगंज में  सई नदी  के पुल  पर रेलवे  लाइन काफी ऊपर से गुजरती है और पुल पार करते ही रायबरेली में प्रवेश करने के साथ ही जेल की ऊँची चाहरदीवारी  शुरू हो जाती है ।किसानों  ने इस स्थान को चुना और रेल लाइन के नीचे  के दोनों और जम गए । उन्हें आशा थी कि इधर वे जेल का घेराव कर लेंगे और फुर्सतगंज का जत्था भी दूसरी उस तरफ शहर कि और से पुल पर आ जाएगा,  तो घेराव जबरदस्त  हो जाएगाँ।  इसके साथ ही सलोन  से ‘पीर रहमत अली’ अपने दौ हजार  के जत्थे के साथ आ  पहुंचे थे। उन्होनें तो खुद को ‘सलोन  का बादशाह’ घोषित कर दिया था और  बाबा राम चन्द्र की सल्तनत में अपने आप को नायब मान लिया था। वे  इक्के पर बैठ कर किसान सभा का प्रचार करते रहते  थे।

आनंद भवन के अपने शयन कक्ष में जवाहर लाल नेहरू कुछ चिंतित मुद्रा में बैठे थे। रायबरेली से पार्टी के नेता मार्तण्ड दत्त वैधजी ने पंडित मोतीलाल नेहरू के नाम तार भिजवाया है ‘रायबरेली के हालत कुछ ठीक नहीं हैं; साथ ही  चंदनीहा  की घटना का जिक्र  किया  और  फुर्सतगंज की गोली-बारी के बारे में भी बताया था। प्रतापगढ़ में वे किसानों  की दुर्दशा देख चुके थे। उन्हें लग रहा था की असली भारत तो गाँवों में बसता है और गाँवों की ही बेकदरी है इस मुद्दे पर उन्होनें डायरी में भी लिखा-

“ये बड़े ताल्लुकेदार और जमींदार, अंग्रेजों  के बगल बच्चे हैं, जिन्हें  अंग्रेजों  ने अपनी विशेष संगत और शिक्षा से उन्हें एक ऐसे वर्ग के रूप में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त  कर ली  है जो कि  बौद्धिक रूप से पूर्णतया नपुंसक- सा सिद्ध  होता है।  उन्हें केवल अपने सुख-साधनों, अपने आमोद-प्रमोद से ही मतलब होता है और अपने मतलब के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं । उनका पूर्ण समय केवल स्थानीय हकीमों  की जी  हजूरी और किसान रिआया पर तरह-तरह के कर लगाना और उनसे किस प्रकार  अधिक से अधिक धन वसूला जा सके, इसकी रणनीति बनाना हैं। उन्होनें कभी किसानों  की दशा को समझने का प्रयास नहीं किया लेकिन हमेशा अपने विशेषाधिकारों के लिए अंग्रेजों  से जी  हजूरी जरूर करते रहते हैं” ।

जवाहरलाल नेहरु कभी किसानों के समर्थन में कुछ करना भी चाहते  तो समस्या आती है पिताश्री (मोती लाल नेहरू) के कारण, क्योंकि लगभग सभी बड़े ताल्लुकेदार उनके मित्र थे और मोतीलाल नेहरू, किसानों के हित चिन्तन   से अधिक देश के लिए  व्यापक अधिकार और देश की स्वायत्ता की मांग कि ओर अधिक  सोंचते  थे।  इसमें वे इस किसान आंदोलन को बुरा  मानते थे। और इन बातों  को महत्व  नहीं देते थे।

जवाहरलाल नेहरु ने कुछ विचार किया और दूसरे दिन पंजाब मेल से  रायबरेली के लिए रवाना होने  का निश्चय किया। वे चाहते थे कि , वहाँ के किसान भाइयों  को समझाये ताकि खून-खराबे से बचा जा सके और किसान नेताओं  की रिहाई का कानूनी तरीके से प्रयास किया जा सके।

इधर प्रशासन कुछ ज्यादा ही चुस्त था, मजिस्ट्रेट के यहाँ पेशी कर के अमोल शर्मा तथा बाबा जानकी दास को रायबरेली से लखनऊ जेल रवाना कर दिया गया ।

अपने आने की सूचना नेहरूजी नें पहले ही भिजवा दी थी। स्टेशन पर उतरते ही उन्होनें देखा की किसानों  के जत्थे के जत्थे चले जा रहे है इतनी भीड़ उन्होनें पहले इस शहर में कभी नहीं देखी  थी। हालांकि  उन्होनें अपने आने की सूचना जिला कलेक्टर शेरिफ़्फ़ साहब को भिजवा दी थी। लेकिन इतनी भीड़ के कारण   उन्हें स्टेशन से निकलने में कुछ परेशानी का अनुभव हो रहा था। मार्तंड वैध जी और डा॰ अवंतिका प्रसाद उन्हें प्लेटफार्म पर मिल गये, उनके साथ लगभग दो दर्जन कांग्रेसी एवं स्थानीय गणमान्य नागरिक भी थे।  यहाँ से वे लोग सीधे अवंतिका प्रसाद के घर गये।   इतने में एक अहलकार, कागज पर पेंसिल से लिखी एक पर्ची लेकर कालिका प्रसाद के साथ आया,उसने बताया की  शेरिफ़साहब ने नेहरुजी के लिए यह पर्ची भिजवाई हैं।   नेहरूजी ने असमंजस में जब पर्ची को खोला तो लिखा था, “सिचुएशन इज वेरी सिरियस प्लीज रिटर्न बैक” (स्थिति बहुत गंभीर है कृपया लौट जाएँ)।  नेहरुजी असमंजस में पड़  गए और प्रश्नवाचक निगाह से कालिका प्रसाद की ओर देखा तो उन्होनें बताया कि  जब वे स्टेशन की तरफ आ रहे थे तो, सरदार वीरपाल सिंह की मोटर में बैठ कर डिप्टी साहब मुंशीगंज के पुल की तरफ जा रहे थे। वो चिंतित नज़र आ रहे थे पूंछनें पर बताया की किसानों  ने रेल लाइन को घेर लिया है और वे जेल का घेराव करने जा रहे है।  खुफिया विभाग  के अनुसार बलवे का भी अंदेशा है, क्योंकि  किसान मरने-मारने पर आमादा हैं। इसलिए उन्होनें आपको यहाँ आने के लिए मना किया हैं। पंडित जी ने पर्ची जेब में चुपचाप रख ली। सामने कालिका प्रसाद खड़े हुए थे। नहरुजी ने उनसे पूछा,   बाबू किस्मत राय कहाँ पर हैं ।  कालिका प्रसाद जी ने तनाव ग्रस्त अंदाज में बताया , बाबू किस्मत राय किसानों कि  भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वही पर खड़े हैं, और भीड़ को दंगे से बचाने के लिए किसी तरह से संबोधित कर रहे हैं। कालिका प्रसाद ने आगे बाते कि  प्रशासन ने पुल  पर भीड़  को  नियंत्रित करने के लिए सैकड़ो  बैलगाड़ियाँ  आड़ी-तिरछी खड़ी कर दी हैं। स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है ।

इतने में वहाँ  का एक अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता, कैपर गंज का ‘बब्बन इक्केवाला’ आ गया। वैध जी ने नेहरुजी को  पुल तक ले जाने के लिये वाहन व्यवस्था  के लिए साथ खड़े  सैयद शमशाद अली को पूछा क्योंकि उनकी लारियाँ रायबरेली भर में चलती हैं –  सैयद साहब कोई लारी हो तो मंगवाईयें ताकि सब लोग उसमें बैठ कर जा सके।  शमशाद  साहब ने जवाब दिया , लारियाँ  तो बाहर गयी हुई हैं एक फोर्ड गाड़ी है, जिसके स्टार्ट होने में कुछ परेशानी हैं अगर स्टार्ट हो गयी तो अभी लेकर हाजिर हो जाता हूँ ।

तब तक अन्य कांग्रेसी भी वहाँ आ पहुँचे । स्थिति को समझते हुए  नेहरु ने सई नदी की तरफ ही जाने का निश्चय किया और चुपचाप पैदल ही नदी की ओर चल दिये।  अभी वे ‘पंजाब मोटर कंपनी’ के सामने पहुंचे ही थे कि शमशाद जी की गाड़ी आ गयी। शमशाद ने नेहरु से बैठने का अनुरोध किया तब तक एक बड़ी भीड़ नेहरुजी के आसपास जमा हो चुकी थी। अपने साथ भीड़ देखकर नेहरुजी ने पैदल ही चलने का फैसला किया। अभी ये लोग कचहरी के पास पहुंचे ही थे कि  ‘बाबा जानकी दास’ ,’जय सीताराम’ , ‘अमोल शर्मा को रिहा करो’, ‘हरी बेगारी बंद’ करो’, ‘बेदखली बंद करो’, ‘बाबा रामचंद की जय’ इत्यादि नारों  की ध्वनि कम होती गयी।  और, यह ध्वनि एक कोलाहल में बदल गयी नेहरु को कुछ अनहोनी का अंदेशा हुआ उनके कदम और तेज हो गये।  साँसे कुछ तेज हो  गयी उत्तेजना पूरे शरीर पर प्रकट होने लगी मार्तंड वैध  स्थिति को समझ रहे थे । उन्होनें कहा,

“कोई बात नहीं पंडितजी वहाँ  पर किस्मत राय  और भगवती प्रसाद  टाउन एरिया सभापति हैं, घबराने की कोई बात नहीं है”। लेकिन, किसी को भी खबर नहीं थी कि  किस्मत राय और भगवती प्रसादजी को प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया था।

दूसरी ओर पुल के पास का नजारा ही कुछ और था। नदी के पुल के उस  पार, आधे पुल तक भीड़ ही भीड़ थी। इसी भीड़ को चीरते हुए वीरपाल सिंह की मोटर आगे बढ़ रही थी। वीरपाल, मिस्टर शेरिफ को दिलासा भी देते जा रहे थे, की इन किसानों को; इनको ठीक करना उन्हें आता है, इसलिए वो बिलकुल भी चिंतित न हों। सामने निकलते ही उन्हें अपनी रैयत दिखी सबसे पहले दिखा खूरेटी गाँव का शिवबालक बेड़िया, जो पहले भी गाँव में किसान सभा बना चुका था। वीरपाल नें दांत पीसते हुए उसे गालियाँ  देना शुरू कर दिया जिसका प्रतिउत्तर शिवबालक ने भी गालियों से ही दिया।  फिर, वीरपाल ने नजर घुमाई तो भीड़ में दो लोग और  दिखे जिन को वो पहचानते थे। इसमें ‘नन्दन के पुरवा’ का पंचम पासी और बसंता चमार था। दरअसल जब वो, सर्दियों में झील में चिड़ियों का शिकार करने आते थे, तब ये दोनों वहाँ  दौढ़-भाग के लिए मौजूद रहते थे। तब तो हमेशा आँख नीची रहती थी और आँख के इशारे से ही लपक लपक कर दौड़ लेते थे। लेकिन आज इनके रंग-ढंग भी कुछ ठीक नहीं नज़र आ रहे थे। इतने में मोटर देख कर भीड़ ने हुंकार भरी

“गांधी बाबा की जय”,

“बाबा रामचंद की जय,” “बाबा जानकी दास की जय”

“हमरे नेता रिहा करो “

इतना सुनना था कि  वीरपाल, मोटर से निकल कर रिवाल्वर, के साथ बाहर आ गया  और दाँत  पिसते  हुए गालियां देने लगा । यह सुनकर लोग, वीरपाल के पास बढ़े और कुछ कदम दूर पर रुक कर , ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाने लगे। वीरपाल और शेरिफ़्फ़ ने पहली बार ऐसी भीड़ का सामना किया था। जिसमें किसान गगन भेदी स्वर में अपनी माँग  कर रहे थे। लेकिन, आततायी का सीना बहुत चौड़ा नहीं होता जल्द ही उसमें भय समा जाता हैं, यही हाल उस समय हुआ। वीरपाल ने देखा की पंचम और बसंता ठीक उसके सामने खड़े होकर लाठी पीटते हुए नारे लगा रहे हैं तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ।  आखिर वो इन दो कौड़ी  के मुलाजिमों से अगली बार  काम कैसे ले पाएगा, अगर  अभी जुबान बंद  नहीं हुई।  ये  सब सिर पर चढ़ जाएँगे। उसने आनन-फानन में अपनी पिस्टल को हवा में लहराया और एक गोली हवा में चला दी।  इसका भीड़ पर तो कोई असर नहीं हुआ बल्कि भीड़ को लगा की गोली से कोई किसान घायल हो गया है। फिर क्या था, भीड़ बदहवास हो गयी और झपटने लगी तब वीरपाल ने सीधे भीड़ को निशाना बना कर गोली चलायी। इसके बाद तड़ातड़ …….तड़ातड़………. गोलीयाँ, और रेल के किनारे पड़े पत्थर, रेल लाइन के साथ आपस में मिल गए और आसमान से  पत्थर ही पत्थर, वर्षा की शक्ल में तब्दील हो गये। रेल लाइन के ऊपर ‘पुलिस फोर्स’, ‘लेबर कार्प की फोर्स’ और ‘नेटिव रेजीमेंट के सिपाही’ तैनात थे। नीचे दूसरी तरफ नदी थी। आधा घंटा बीता होगा की चीख-पुकार मच गयी आस-पास के गाँव वाले भी अपने अपने घरों  में छुप गए, सभी ने देखा सई नदी का पानी लाल हो गया। सिपाहियों ने पूरे इलाके में कर्फ़्यू लगा दिया किसी को भी वहाँ जाने की इजाजत नहीं थी। यह कर्फ़्यू  पूरे डलमऊ रोड तक लगा रहा । अँधेरे  में घुरवारा, कटघर आदि पास के गाँवों  के लोगों  ने देखा मोटर लारी और तांगे भरे हुए पुलिस के साथ अनेकों गाड़ियाँ गंगाजी की ओर डलमऊ जा रही हैं। किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।

घंटाघर के पास ही नेहरु को गोलियों  की तड़तड़ाहट सुनाई देने लगी। जिसकी आशंका थी वही हुआ,उनका ह्रदय बैठ गया।  काश! थोड़ा और पहले यहाँ पहुँच जाते शायद यह हादसा रोका जा सकता था। लेकिन, दिमाग में एक प्रश्न  अभी भी घूम रहा था की आखिर शेरिफ़्फ़ ने, क्यों मेरे पास पर्ची भिजवाई, कहीं  यह पूर्वनिश्चित तो नहीं था।

जवाहर लाल नेहरू  ने फौरन मोतीलाल नेहरू  को संदेशवाहक द्वारा इस घटना की इत्तला दी।  शाम  तक पंडित मार्तंड वैध को भी गिरफ्तार कर लिया गया।  उन पर आपराधिक दंड कि धारा भी, हास्यस्पद लगायी गयी बलवा फैलाने की और साग-सब्जीयाँ  लूटने की तथा कुर्सी-मेजे तोड़ने की ।

दूसरे दिन मोतीलाल नेहरू  मोटर पर ही रायबरेली आए और जवाहर लाल  के साथ घटना स्थल का मुआयना किया, वहाँ पर अभी भी पुआल में ढकी एक दो लाशे पड़ी हुई थीं । ‘सई’ किनारे पर काफी दूर तक जमीन  खून के निशानों से लाल थी ।

जैसा हर बार होता हैं ‘यह अंग्रेजी शासन का प्रतिरोध रोकने और स्वयं को मिथ्या  नैतिक सत्ता का हिमायती होने का हथियार- अंग्रेजों  ने फ़ैज़ाबाद के कमिश्नर ले॰ कर्नल फिनथौरपे की एक जाँच कमेटी बना दी थी, और उनसे अपनी विस्तृत रिपोर्ट देने के लिए कहा गया।

किसानों को बाबा की कोई खबर नहीं थी सारे पढ़े-लिखे शहरी नेता शहरों, में चुप हो गए और गांधीजी के असहयोग आंदोलन की ज़ोर-शोर से तैयारियों में जुट गए।  असहयोग बड़ा आंदोलन था। आखिर मुट्ठी भर अवध के किसानों  की कीमत पर देशव्यापी आंदोलन को तो नहीं छोड़ा जा सकता। पूरा का पूरा किसान आंदोलन नेता विहीन हो गया। देश को जैसे कुछ पता ही नहीं, ऐसा लगता था कि  किसानों  का कोई अस्तित्व ही हिंदुस्तान में नहीं है ।

सरकारी रिपोर्ट आयी, दोष किसानों  के मत्थे मढ़ा गया।  चार लोगों  को मृत दिखाया गया और चौदह  को घायल! किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था।  लेकिन, अस्पताल में भर्ती लोगों  की संख्या कुछ और कहानी कह रही थी। अस्पताल में 28 लोगों को भर्ती दिखाया गया, जिसमें सभी को तीन-तीन, चार-चार गोली लगी थी। उसमें भी ज़्यादातर घायलों  और मृतकों  को अज्ञात दिखाया गया। बड़े ताज्जुब की बात थी कि जब घायलों  के और मृतकों के नाम और वल्दियत लिखी गयी तो गाँव का नाम लिखने में क्या बाधा थी। और इससे ज्यादा गंभीर बात  यह थी की गंभीर रूप से घायल लोग दो-चार दिन बाद स्वेच्छा से अपने घर चले गये। सिविल सर्जन ने उनके टिकट पर लिख दिया –“लेफ्ट हॉस्पिटल ऑन हिज ओन आकार्ड “(अपनी इच्छा से छोड़ कर गये)। सबल और निर्बल का यही अंतर सदैव बना रहेगा उसे अमानुषिकता में धकेल कर  इच्छा का रूप आराम से दिया जा सकता है।  सई नदी का पानी क्यों  लाल हुआ ?  मोटर और ताँगो में गठरियों के साथ बैठे सिपाही, डलमऊ तक मुंह अंधेरे क्या ले जाते रहे, यह  अंतहीन प्रश्न थे, जिसका जवाब हर सदी के आंदोलन ने मांगा था और शायद कभी नहीं मिला ।

15 त॰ को मदनमोहन मालवीय और वेंकटेश तिवारी घटनास्थल पर आए, तब भी लोगों ने गढ़ढ़े खोदकर पुआल में लिपटी लाशें  उन्हें दिखाई। लेकिन अंग्रेजों  ने भरसक प्रयत्न किया कि  यह खबर आगे न निकल सके। और वे इसमे कुछ हद तक सफल भी रहते। यह किसी को पता भी नहीं चलता अगर ‘प्रताप’ और ‘इंडिपेंडेंट’ ने इस खबर को अपने पत्र में न छापा होता। प्रताप के संपादक,    विधार्थी जी ने प: बालकृष्ण शर्मा “नवीन” को इस कांड की जाँच के लिए रायबरेली भेजा और जब उनकी रिपोर्ट आई तो शासन  में हड़कंप मच गया।

वीरपाल सिंह का नाम विशेषकर उजागर हुआ। वीरपाल सिंह ने विधार्थीजी पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया। विधार्थीजी ने कानपुर से इकतीस स्वयंसेवकों  का जत्था रायबरेली रवाना  कर दिया। यही नहीं गणेशजी की “प्रभा”, पत्रिका ने तो पूरी घटना के साथ-साथ मृतकों  के चित्र भी प्रकाशित किए और सरदार वीरपाल सिंह को इस घटना का जिम्मेदार माना।

13 जनवरी 1921 के “प्रताप” में गणेशजी ने अग्र लेख लिखा –

“इस प्रांत में इस समय, 1921 के शासन सुधारों  के सूत्रपात के प्रारंभ में और ‘ड्यूक ऑफ कनाट’ के आगमन के साथ ही पंजाब में हो चुकने वाली घटनाओं  की पुनरावत्ति हो चुकी है। नि:संदेह यह आवृत्ति उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी की पहली आवृत्ति थी। परंतु, रंग और रूप में उससे-इससे  कोई अंतर नहीं है। जिस प्रकार उसमें जनता कुछ भी नहीं समझी गयी और शासकों ने लोगों के अधिकारों  और आत्मा को अत्यंत निरंकुशता के साथ पैरो तले रौंदा, उसी प्रकार इसी समय भी शासकों ने लोगों की मान-मर्यादा का विध्वंस किया है। कहा जाता है कि  रायबरेली में कुछ उत्पात हुए थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी स्वीकार किया है, कि कही-कही कुछ अशांति मची थी। परंतु, यदि इन गिने-चुने लोगों  ने उत्पात किया था तो इन उत्पातों के कारण , हजारों  निर्दोष लोगों  के मुँह बंद करने ,उन्हें भयातुर कर डालने ,उन्हें सताने और उन पर गोली चलाने कि आवश्यकता  थी? ड़ायर ने जो कुछ किया उससे रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने क्या कम किया ? निहत्थों और निर्दोषों पर उसने गोलियाँ  चलवाईं और यही काम यहाँ रायबरेली में किया गया। अंतर था तो केवल यह कि वहाँ  मशीनगन थी ,यहाँ बंदूके थी : वहाँ  घिरा हुआ एक बाग था और यहाँ नदी का किनारा। परंतु निर्दयता और पशुता कि मात्रा  में कोई कमी नहीं थी। मरने वालों  के लिए मुंशीगंज कि गोली वैसे ही कातिल थी जैसे कि, जलियाँवाला बाग कि गोलियाँ ; क्रूरता कि क्रिया भी उतना ही जघन्य रूप धारण किए थी। सरकार नें इस लेख पर जबरदस्त आपत्ति दर्ज की और पत्रिका  को जब्त करने के आदेश दिया और इस जघन्य कांड में अंग्रेजों  का सहायक सरदार वीरपाल सिंह था क्योंकि सबसे पहली गोली उसी ने चलायी थी। इसका गवाह था, बेला गुसीसी का बसंता कहार, जिसने बताया कि “एक पंजाबी ने एक बीतता कि छोट-सी बंदूक से हमरे ऊपर गोली चलायी।  हम कीचड़ मा झुप गयें और जब अंधेर भा तब निकरके गाँव चले आयें।  मूलो कौनों अस्पताल मा नहीं गायें कहे के पुलिस पकड़त रही”।

लेकिन यह सत्य था कि बसंता कहार वहाँ से निकलकर बदहवास-सा उत्तरपारे  की ओर बढ़ गया। वहाँ अंधेरे में ही चकबल्लीहार के एक  ठाकुर साहब से भेंट हो गयी। उसकी हालत देखकर उन्होने उसे वही पास में एक डाक्टर को दिखाया और उसको चकबल्लिहार ले आए।  बसंता को डर था कि  यदि वो बेला गुसीसी जाएगा तो पुलिस पकड़ लेगी। ठाकुर साहब कुछ अलग मिजाज के थे, “मनसा वाचा कर्मणा वैष्णव”। इतने दयालु कि  पट्टीदारों से भी नहीं पटती थी। लेकिन, रैयत के सम्मान के पात्र थे। लोग जान छिड़कते थे। उन्होने बसंता से पूरी कहानी सुनी, अश्रु धारा बह निकली। निश्चय किया कि चाहे कुछ हो जाये, जमीन परती  रहे लेकिन न तो अपने किसी बच्चे को ताल्लुकेदार के यहाँ  जिलेदारी में भेंजेंगे और न ही पुलिस में भर्ती करवाएँगे ।

इंडिपेंडेंट अखबार की प्रतिक्रिया और भी तीखी थी।

“छह लाशें, पुलिस के पास पड़ी थी। उनका कोई ख़बरगीर नहीं था। पता नहीं डायर ने जलियाँवाला बाग में अपने हाथ से गोलियां चलायी  भी थीं  या नहीं । परंतु यहाँ डायर का एक भाई मौजूद था। रंग और रूप में नहीं धर्म और जाति  में नहीं ,परंतु हृदय कि क्रूरता में ठीक ड़ायर-सा ही। देश के दुर्भाग्य से यह आदमी एक भारतीय है और उसका नाम है,  वीरपाल सिंह! वह ताल्लुकेदार है।  किसानों का कहना हैं कि उसने गोलियाँ चलायीं, वह इंकार करता है। किन्तु, उसका यह इंकार हजारों लोगों  कि आँख में धूल नहीं झोंक सकता। डायर की  पीठ ठोकी थी ‘ओ डायर’ ने । आज ठीक वही बातें इस घटना के संबंध में हमारे प्रांत में हो रही हैं । ‘सर हरकोर्ट बटलर‘, ‘सर माइकेल ओ डायर’ का काम कर रहे हैं । डायर जब बेगुनाहों के खून से अपने हाथ रंग चुका था तो उसके खूंखवार काम पर माइकेल ओ डायर ने अपनी अनुमति का तार भेजा था। हमारा विशेष संवाददाता कहता है कि रायबरेली के अधिकारियों को किसानों के हत्यारों को विशेषकर, वीरपाल सिंह की पीठ ठोकतें हुए इस प्रांत के गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर  ने रायबरेली, तार  भेजा है। गवर्नर महोदय प्रसन्न हैं और क्यों  ना प्रसन्न हों ? ‘सर हरकोर्ट बटलर’ शासन के काम में कैसे  भी पटु क्यों ना हों , उनका हृदय गरीबों के साथ  कदापि नहीं हैं। वे सदा अमीरों और ताल्लुकेदारों के प्रेमी रहे हैं। उन्हीं से  मिलेजुले रहते हैं,और आज से नहीं बहुत पहले से। लार्ड चेम्सफोर्ड जब लखनऊ गये थे तब उन्होनें गवर्नर को ताल्लुकेदार के नाम से ही संबोधित किया था। वे ताल्लुकेदारों     की सभा के मेम्बर हैं। उन्होनें ताल्लुकेदारों (राजा महमूदाबाद) को अपनी कार्यकारणी का मेम्बर बना कर अपना दाहिना हाथ बना लिया है। ताल्लुकेदार भी उन्हें खूब मानते हैं। उनका यशोगान करते नहीं अघाते, उनकी पूजा-अभ्यर्थना  करते नहीं अघाते, अभी एक सप्ताह पहले की बात है, राजा महमूदाबाद ने गवर्नर महोदय के आदर की भावना में तल्लीन होकर प्रांत के सामने गवर्नर का एक स्मारक बनवाने का प्रस्ताव पेश किया था। उनका प्रस्ताव था कि गवर्नर की  एक मूर्ति बने। पता नहीं  उसके पीछे क्या हो रहा हैं, परंतु यदि कुछ  हो रहा हो तो उपास्य देव कि  मूर्ति बनाने का इससे अच्छा अवसर अब ताल्लुकेदारों को दूसरा नहीं मिल सकता। और क्या हो सकता हैं। रायबरेली जिले में जहाँ पर निर्दोष और निहत्थे किसानों का खून बहाया गया है वहीं पर वे सर हरकोर्ट कि मूर्ति की  प्रतिष्ठा करें  और उस पर यह शब्द भी अंकित करवा  दे – “भले और बुरे समय में हमारा मुरब्बी(अभिभावक) सर हरकोर्ट बटलर”।

सरकार कहाँ पीछे रहने वाली थी। समय कि नजाकत को समझते हुए 2 फरवरी 1921 को सरकारी गज़ट संख्या 193/111 असाधारण शीर्षक से यूनाइटेड प्रोविंसेस ऑफ आगरा और अवध के नाम से फ्रीनथोरपे की विशेष रिपोर्ट चीफ़ सेक्रेटरी, सर रिपोर्ट ,जी॰ एच॰ लेम्बेर्ट के हस्ताक्षर से प्रकाशित कर दी गयी।

सारांश रूप में रिपोर्ट में कहा गया कि –

असहयोग आंदोलन के कर्ता-धर्ता जब छात्रों और शहरी नागरिकों में असफल रहे तो उन्होनें अवध के ग्रामीण किसानों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया । इसी कड़ी में उन्होनें किसानों को ताल्लुकेदारों के विरुद्ध भड़का दिया ।  उन्होंने  2 जनवरी॰1921  को चंदनीहा में ठाकुर त्रिभुवनबहादुर सिंह के यहाँ घेरा ड़ाल दिया। तीन हजार  की इस भीड़ ने जब घेरा डाला तो जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कप्तान के साथ  पुलिस कि मदद से भीड़ को हटा दिया गया और उनके तीन प्रमुख नेता अमोल  शर्मा, बाबा जानकी दास, और बद्री नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 6 जनवरी  को मुंशीगंज बाज़ार लूटने का प्रयास किया गया। जिसे सफल नहीं होने दिया गया। 6 जनवरी को ही फुर्सतगंज बाज़ार को चार हजार  किसानों  की  भीड़ ने घेर लिया।  जिसको वहाँ के सेक्टर-मजिस्ट्रेट, नसरुल्लाह खान द्वारा खत्म किया गया। इसके लिए उन्हें मजबूरन गोलीयाँ चलवानी पड़ी। जिसमें चौबीस  आदमी घायल हुए तथा चार मारे गये। जिसमें एक बाद में चोटों के कारण मर गया। 7 जनवरी  की सुबह लगभग साढ़े-छह सौ लोग जेल परिसर के पास इकट्ठा हो गये। वे  अपने तीन गिरफ्तार नेताओं को छुड़वाना चाहते थे। जिन्हें  सुरक्षा कि दृष्टि से राउंड-अप करने के बाद छोड़ दिया गया। फिर खबर आयी कि कैपरगंज बाज़ार को भी लूटने की साजिश की  जा रही है। जिसे समय रहते टाल दिया गया। बाद में मुंशीगंज पुल के पास भीड़ आश्चर्यजनक रूप से बढ्ने लगी। इस पर जिला प्रशासन द्वारा बाबू किस्मत राय को, जो कि विधान परिषद के उम्मीदवार भी थे, भीड़ को मनाने के लिए लगाया गया। परंतु भीड़ काबू में नहीं आ रही थी। दो बार भीड़ द्वारा पुल के इस पार आने का प्रयास किया गया।  जिसे पुल पर तैनात लेबर कार्प के इंचार्जे कैप्टेन अल्ड़ेर्सोन द्वारा असफल कर दिया गया। उनकी सहायता के लिए दूसरी-राजपूताना राइफल के जवान भी तैनात थे। तब तक भीड़ कि संख्या सात –आठ  हजार से दस हजार के पास पहुँच गयी थी, साथ ही यह भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। इस पर जिला मजिस्ट्रेट के साथ पुलिस कप्तान और सरदार विरपाल सिंह ने भीड़ को पीछे कि तरफ धकेलेने का प्रयास किया। उनके बयान के अनुसार, “अचानक पुल के पार से हम  पर कंकड़ और पत्थर कि बारिश होने लगी और भीड़ का फैलाव आधा मील दूर तक हो गया था। हमारे सवार सीधी सिंह,मुंशी सिंह,जफा हुसैन ,ज़ोर सिंह,मंगल सिंह,और शिवबरण सिंह इस भीड़ में घिर गये। यह पत्थर की  बारिश पुल के बाएँ छोर से हो रही थी। मेरे आस-पास पत्थर गिरने लगे, तभी मैंने  देखा कि फायरिंग कि आवाज शुरू हो चुकी थी। तभी एक पत्थर मेरी बायीं कुहनी पर आ कर लगा तब मैंने पत्थर फेकने वाले व्यक्ति पर फायर कर दिया जो उसको नहीं लगा। तभी कुछ सवार मेरे पास आए और फ़ायरिंग के लिए आदेश मांगने लगे। स्थिति को देखते हुए उन्हें कारबाईन लोड करने का आदेश दे दिया गया। गोली चलाने का आदेश नहीं दिया गया लेकिन निर्देशित किया गया कि  यदि फिर हमला होता है तो फायर किया जाये। लेकिन, इसके पहले ही गोली चलनी शुरू हो गयी। और तीन मिनट के बाद जब मैंने देखा कि भीड़ पूरी तरह तितरबितर हो चुकी है तो मैंने गोली बंद करने के आदेश दे दिये। तब तक मिस्टर डरहम के साथ रिजर्व पुलिस  के सिपाही भीड़ को दूर तक खदेड़ चुके थे। जब सभी लोग लौट आए तो मैंने पूंछा कि फ़ायरिंग के आदेश किसके द्वारा दिये गये थे। तो कोई भी यह बताने कि स्थिति में नहीं था। ऐसा लगता हैं कि आत्मरक्षा कि सूरत में गोली चलनी शुरू हो गयी होगी जैसे कि मेरे द्वारा भी हमला होने के बाद गोली चलायी गयी। इस घटना में तीन लोग मारे गये और चौदह लोग घायल हो गये, इसमें भी वर्तमान में दो या तीन लोग ही अस्पताल में भर्ती हैं। सारी चोटे बॅक शॉट के कारण ही हुई हैं। लांस दफेदार नियाज़ हुसैन ने दस राउंड, नवास खान ने दो शॉट, मंगल सिंह ने चार  शॉट, संथाल सिंह ने चार  शॉट,शिवबरण ने नौ शॉट, और गणेश सिंह ने तीन  शॉट फायरिंग की”।

रिपोर्ट के आगे के हिस्से में कहा गया की, वीरपाल सिंह जी का नाम फ़ायरिंग शुरू करने के लिए लिया जा रहा हैं तो, इन तथ्यों  की  मेरे द्वारा सावधानी पूर्वक जांच की  गयी। इसके मुख्य गवाह लेबर कार्प के सूबेदार हाकिम सिंह को गवाही के लिए बुलाया गया, क्योंकि उनका स्थानातरण पंजाब में हो गया था। इस शख्स की  गवाही बहुत अहम है। यह एक अच्छी छवि वाले कर्मठ व्यक्ति हैं। इसने बताया कि उसने गोली जानबूझ कर नहीं चलायी थी। बल्कि भीड़ को अपने ऊपर हमला करते देखकर अपनी रक्षार्थ भीड़ को ड़राने के लिए गोली चलायी थी। इस तथ्य से यह प्रतीत होता है कि यह गोली बिना आदेश कि प्रतीक्षा किए ही चला दी गयी थी, जो कि बाद में चलती रही। मैं  इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि गोली सरदार वीरपाल सिंह द्वारा नहीं चलायी गयी। जैसा कि कुछ लोग राजनीतिक विद्धेशवश उन पर दोषारोपण कर रहे हैं।  मदनमोहन मालवीय  के दौरे के समय लेबर कार्प के एक श्रमिक प्यारेलाल द्वारा वीरपाल सिंह का नाम लिए जाने को मैं झूठा और तथ्यहीन मानता हूँ।  यह जानबूझ कर एक साजिश के तहत किया गया हैं । इस पूरे प्रकरण में जिला प्रशासन कि भूमिका बहुत ही सराहनीय रही।

फिनथौरपे ने यह रिपोर्ट 18 जनवरी को पूर्ण कर दी थी। फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया, और उन्होनें 19 जनवरी  को उसमें दो पैरा और जोड़ दिये। जो कि चलाई गयी गोलियों के विवरण से संबन्धित थे। इसके अनुसार –

फुर्सत गंज में 47 बॅक शॉट गोली और 5 रिवॉल्वर कि गोली खर्च हुई,

मुंशीगंज में 56 बॅक शॉट गोली।खर्च हुईं ।

रिपोर्ट के बाद वीरपाल सिंह और शेर हो गया। उसने विधार्थीजी और उनके साथी संपादक प॰ शिव नारायण वैद्द  और ‘इंडिपेंडेंट’ के संपादक पर मानहानि का नोटिस देते हुए कानूनी कार्यवाही की धमकी दी। विधार्थीजी  ने नोटिस के उत्तर मे लिखा –

“आपकी नोटिस के उत्तर में हम आपको सूचित कर रहे हैं कि  हमने जो कुछ भी लिखा उस संबंध में हम पूरी तरह न्याय के पथ पर हैं। हमारे पास अपने विचारो की पुष्टि के लिए पूरे साक्ष्य हैं।  अभियोजन के संबंध में सच्चाई यह होगी की जनता हमारा अखबार लेकर आपके दरवाजे पर चिल्लायेगी” ।

इस उत्तर के बाद वीरपाल सिंह ने रायबरेली की सर्किट मजिस्ट्रेट की अदालत में गणेश शंकर विधार्थीजी  और शिवनारायन मिश्र वैध   के नाम ताजिराते हिन्द की दफा 499/500 के अंतर्गत अपने वकील, मु॰ अफजल खान के द्वारा मुकदमा दायर करवा दिया ।

इस मुकदमे की खबर आग की तरह फैल गयी। लोगों के हाथ, अपने-आप, मदद के लिए बढ़ने लगे। बाबू किस्मत राय ने, “प्रताप” की ओर से अपना वकालत नामा दाखिल कर दिया।  तब तक हरिमोहन, बार एट लॉ, प॰ लक्ष्मी शंकर मिश्रा (भू॰ पु॰ चीफ़ जस्टिस, हैदराबाद), विशंभर नाथ वाजपेयी, जगन्नाथ प्रसाद चौधरी, प. कीर्ति प्रसाद मिश्र इत्यादि ने अपने वकालत नामे दे दिये। तब तक गणेशजी के साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्धिवेदी को इस मुकदमे की खबर लगी उन्होनें आनन-फानन में, वृंदावनलाल वर्मा को झाँसी से बुला भेजा और इस मुकदमे की पैरवी करने के लिए कहा।

मुकदमा शुरू हुआ।  सरकारी तहरीर में फिन्थौरोपे साहब की रिपोर्ट का हवाला दिया गया । इसके विरुद्ध गणेश जी की ओर से विभिन्न गाँवों  के पैंसठ  किसानों ने गवाही दी और इस बात की पुष्टि कि  पहले गोली वीरपाल सिंह ने ही चलायी थी। यही नहीं इस मुकदमे में प्रताप के अग्रलेख के समर्थन में, प॰ जवाहर लाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय, विशंभरदयाल त्रिपाठी और “वर्तमान” के संपादक रमाशंकर अवस्थी ने भी गवाही दी। मुकदमे की हर पेशी में रायबरेली के वकील, नेता और व्यापारी उपस्थित रहते थे। जबकि सरकार की ओर से ताल्लुकेदारों का अमला और सरकारी नौकर खड़े रहते थे।

मुकदमा लगभग पाँच महीने तक चला और आखिर में 30 जुलाई 1921 को  सुबह 11 बजे मजिस्ट्रेट, मकसूद अली खान ने  इकहत्तर पृष्ठों का अपना फैसला दिया। जैसा की सभी को अंदेशा था कि  नाटक पूरा किया गया है। परिणाम आशंका अनुकूल ही था।  गणेशजी और शिवनारायन मिश्र को छह  माह की सजा और एक हजार रुपये का जुर्माना घोषित किया गया। शिवनारायण ने सेशन जज एफ ॰जी॰ शेरिंग के यहाँ अपील कर दी जिसे खारिज कर दिया गया और यह संशोधन किया गया की उन्हें कोई भी राजनैतिक गतिविधि अथवा देश विरोधी कार्य न करने की शर्त पर, पाँच-पाँच हजार के निजी मुचलके पर छोड़ा जा सकता हैं। सेठ कंधई लाल अग्रवाल ने जुर्माने की रकम चुकता कर दी। दो निजी मुचलकों  का भी प्रबंध हो गया, और गणेशजी सकुशल कानपुर आ गए।

इस घटना के बाद विधार्थीजी जब भी कुछ लिखने बैठते उन्हें मुचलके की शर्ते आँखों के सामने घूमने लगतीं और खुफिया पुलिस के आदमी अलग से पत्र में छपे  लेखों का छिद्रान्वेषण करने लगते। आखिर में थक हारकर एक दिन शासन को पत्र लिखा कि वे इस निजी मुचलके को निरस्त करने की और अपनी जमानत रद्द करने की माँग  करते हैं, ताकि अपने स्वाभिमान के साथ कोई समझौता  न कर अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें। वे जेल जाने को तैयार हैं, उन्हें सजा पूरी करने दी जाये । सरकार तो जैसे तैयार बैठी थी। दूसरे दिन चालान  काट कर उन्हें लखनऊ जेल भेज दिया गया।

गणेशजी सोच रहे थे की बहुत बड़ी विडम्बना है, स्वराजी और  कांग्रेसी दोनों में ही ताल्लुकेदार हैं, और अंग्रेजों के समर्थक भी भारी संख्या में घुसे हुए हैं।  इस तरह से  ताल्लुकेदारों का अँग्रेजी सरकार के साथ  एक ढीला-ढाला गठबंधन बना हुआ था, जिसको किसानों  ने तोड़ दिया था। मुसीबत यह थी कि अभी तक किसानों  की आवाज ताल्लुकेदारों की आवाज़ थी।  लेकिन अब प्रदेश के अस्सी फीसदी किसान उठ खड़े हुए, तो लगने लगा ताल्लुकेदार के भी इतर किसानों की आवाज़ है। और उनकी स्थिति बहुत ही भयावह है। अभी तक स्वराज के माने शहर और कस्बों  तक ही सीमित थे जिसमें किसानों  की कोई आवाज नहीं थी । लेकिन, अब उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता था। सभी आंदोलनकारियों को देश-सेवा के लिए ज्यादा सहयोग ताल्लुकेदारों और व्यापारियों से ही मिल रहा था उन्हें नंगे-भूखे किसानों  की कोई जरूरत नहीं थी। इसलिए उनके इस महा-आंदोलन में सिवा भीड़ इकट्ठी करने के किसानों  का कोई अहम किरदार नहीं था।

ऊँचाहार का किसान सम्मेलन नहीं हो पाया। अंग्रेज़ मुलाजिम खुश थे। अंग्रेजीराज की नाक बच गयी । ताल्लुकेदार खुश थे, अब कभी किसान सिर नहीं उठाएंगे।  लेकिन चिंगारिया बहुत मोटी राख की परतो में दब जरूर गयी थी, बुझी नहीं थी।

किसी भी तेज हवा में चिंगारियाँ, फूलों की  भाँति चमक कर बिखर जाती थी।  और, रक्त-बूंदों को समेट  कर फिर राख की परतों में दब जाती थी।

(लेखक राजीव पाल जन आंदोलनों और क्रन्तिकारी साहित्य के अध्येता हैं . उनकी एक पुस्तक ‘ कलम, क्रांति, भगत सिंह और कानपुर प्रकाशित है. सम्प्रति क्षेत्रीय आयुक्त, भविष्य निधि, आगरा )

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