संजीव कौशल की कवितायेँ : प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष

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जागृत राजनीतिक चेतना, समय और समाज की विडम्बनाओं की गहरी समझ और भाषा की कलात्मक पारदर्शिता के कारण संजीव कौशल की कवितायेँ नयी सदी की युवा पीढ़ी के बीच अपनी अलग पहचान बनाती हैं.

कविता और अन्य सभी सृजनात्मक लेखन के लिए यह समय इस मायने में संकटपूर्ण है कि एक तरफ, धीरे धीरे हमारा समाज नवजागरण के मूल्यों को खोते हुए, प्रतिगामी विचारों से आक्रांत होकर सत्ता के उन्माद का शिकार होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ हमारे कवि, लेखक, यानी मशालें लेकर चलनेवाले लोग ज्ञान मीमांसात्मक विभ्रम से ग्रस्त हो रहे हैं.

पिछली सदी के अंतिम दशक में जो राजनितिक उदासीनता फैली वह अब राजनितिक नासमझी में बदली जा रही है. बस केवल संकटग्रस्त समाजों/तबकों से आनेवाले कवि-दलित, पिछड़े,आदिवासी, स्त्री आदि हैं जो इस राजनितिक उदासीनता के बीच रहकर भी अपने गहरे सामाजिक सरोकारों के चलते प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष रचने में सफल हो रहे हैं.

शेष कवियों में कुछ ही हैं जिनके वैचारिक और रचनात्मक संघर्ष रेखांकित करने योग्य हैं. उन कुछ में एक संजीव कौशल भी हैं. उनका पहला कविता संग्रह कुछ दिनों पहले ही आया है और अभी चर्चा में है.

यहाँ प्रस्तुत कवितायेँ उनकी काव्य यात्रा के अगले पड़ाव का संकेत मात्र नहीं है, बल्कि इनमें उनकी रचनाशीलता के आश्वस्तकारी विकास को भी लक्षित किया जा सकता है.

वे बिम्बों का बखान नहीं करते बल्कि उन्हें अपनी स्मृति में बसाने का उपक्रम करते हैं. पहली कविता जो एक बहुत छोटी सी कविता है – ‘एक दिन सुनोगे’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है.

आज देश और देशभक्ति की बड़ी चर्चा है और कुछ लोग देश-देश चिल्लाते हुए देश को बेच रहें हैं, और हमें यानी साधारण जन को इसका एहसास ही नहीं है कि हम तो पहले ही इस देश से बाहर कर दिये गए हैं बल्कि हमें कभी शामिल ही नहीं किया गया था |

कवि बहुत कम शब्दों में इस एहसासहीनता का एहसास कराने में सफल होता है | ऐसी ही कविता ‘अशोक  के शेर’ में सत्ता की क्रूरता और आतंक को गहरे संकेतो के साथ उद्घाटित किया गया है :
‘सत्ता की सोहबत
विजूकों को भी
नरभक्षी बना देती है |’

जुनैद के लिए हिन्दी में कई कविताएं लिखी गईं और कुछ काफी चर्चित भी हुईं | लेकिन ज़्यादातर कवितायें जहां बेहद राजनीतिक थीं वहाँ संजीव ने मानवीय संवेदना को केंद्र में रखा है | यह हृदय को विदीर्ण करने वाली कविता है |

‘हंडेवाले’ और ‘साँप सीढ़ी’ जैसी कविता में वे विडम्बना को करुणा की ऊंचाई तक ले जाते हैं | ‘किसान मार्च’ में जरूर वे सूचनाओं को जीवन अनुभव में शामिल नहीं कर पाते , इसलिए यह कविता अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ती ,कवि की प्रतिबद्धता को जरूर दर्शाती है | शेष सभी कवितायें पाठक को गहरे उद्वेलित करने वाली कोई न कोई बात जरूर कहती हैं | उदाहरणार्थ ‘मृत्यु’ की अंतिम पंक्तियाँ देखें ;
‘वो जो निकले थे
खून से लथपथ
तुम्हारे दिल से राम
उन्हें खा गया
जय श्री राम ’

संजीव कौशल युवा कवि हैं , उनके अनुभव संसार को अभी और व्यापक होना है , अनुभवमूलक अन्वेषण को भी विकसित होना है ,अच्छी बात यह है अध्ययन की गहराई के बावजूद वे कविता को बुद्धि द्वारा निर्मित स्मृति के चमत्कार में फँसने नहीं देते | उन्होंने लंबा रास्ता चुना है | –मदन कश्यप 

 

संजीव कौशल की कवितायेँ –

एक दिन सुनोगे

-एक दिन सुनोगे
लेकर भाग गया कोई देश
तुम हंसोगे
ख़बर की मूर्खता पर
उस दिन भी एहसास नहीं होगा तुम्हें
तुम नहीं थे कभी शामिल
देश में

अशोक के शेर

चारों दिशाओं से झपटते हैं
दहाड़ते हुए
और एक ही बार में कर देते हैं
काम तमाम
अपने शिकार का वे

ये शेर
अशोक के धम्म के नहीं
सत्ता के दम्भ के रक्षक हैं

सत्ता की सोहबत
बिजूकों को भी
नरभक्षी बना देती है

अगर तुम देख पाते
( ज़ुनैद के लिए)

अगर तुम देख पाते तो देखते
कि कैसे उग रहीं थीं उसकी मूँछें
धान की पौध सी उमगती हुईं
कैसे उसकी बातों में
ढोल से बजते थे सपने
हर एक थाप पे थिरकते हुए
कैसे प्यार
पुरवाई सा इतराता था उसकी आँखों में
फूलों सा मुस्कुराता हुआ
कैसे उसका चेहरा
मिट्टी के रंगों का
चहकता था मौसमों सा
सारे इम्तिहानों में
कैसे उसके पैरों में
चमकती थीं बिजलियाँ लड़काती हुईं
कि माँ की आँखों के झूले में झूलता था वो
छुटपन की अंगड़ाइयों से लवरेज
बादलों को चखता हुआ

मगर ये नहीं देख सकते थे तुम
कि तुम्हारी आँखें बुझा दी थीं
नफरतों के तेज़ाबों ने
सैंकड़ों सैंकड़ों साल पहले
कि तुम्हारी आँखों के पत्थरों को
कभी छुआ ही नहीं
बच्चों की किलकारियों ने
कि धार्मिक उन्माद के तहखानों में कैद
तुम्हारे दिल से
बू आती है सड़न की

अफसोस!
तुम्हें आदमी होना मयस्सर न हुआ

हंडे वाले

अपने सरों पे लादे रहते हैं ये
हंडे रोशनी के
फिर भी
कितने ओझल हैं इनके चेहरे
कि ये दिखते ही नहीं
एक से लगते हैं सभी
चेहरे अँधेरे के

कहने को सर पे है
मगर नहीं छलकती
कोई बूँद रोशनी की इनके चेहरों पे
कि चलते रहते हैं ये गुमसुम
खुशी के गीतों में छूटे सुरों की तरह
बारातियों के साथ-साथ
दमकते चेहरों पे
रोशनी मलते हुए

जैसे धो कर निखारी हो रात
हंडों के शीशों की तरह
ऐसे पेरते हैं रोशनी रात भर
फिर भी कितने काले हैं इनके हाथ
जैसे आई हो हिस्से में इनके
काली सूखी रात

साँप सीढ़ी

बचपन में हम सांप सीढ़ी खेलते
सांपों के इतना करीब होने से डरे रहते
और उनसे बचने की जुगत में कहते
कन्नी खुजाए, मेरी तक लग जाए
कन्नी खुजाए, मेरी तक लग जाए
इस तरह कभी-कभी सांपों से बच जाते
और एकाध सीढ़ी चढ़ जाते
जो रंग-बिरंगे खाने कूँदती
जीवन में ऊपर चढ़ने का एहसास कराती
मगर अक्सर जो होता वो यह
कि जीत की हद में पहुँचते-पहुँचते
कोई सांप अचानक डस लेता
सारा सफर, सारा उत्साह, सब किया धरा
और पटक देता सियाह सुरंग में
जहाँ से दोबारा चढ़ना कई बार तोड़ डालता था

आज जब सोचता हूँ
तो सोचता हूँ कि दिखाई देते थे कागज पर बने हुए सांप
और कई बार लाँघ लेते थे गोटियों के पाँव
लपलपाती जीभों को
मगर यह किस तरह बड़े हुए हम
कि हमें अब सांप दिखाई नहीं देते
सिर्फ सुरंगे देती हैं दिखाई
और देता है सुनाई
हमारा धड़ाम धड़ाम गिरना
कराहना रोना
भाग्य को कोसना
ना ही देती है सुनाई हँसी सांपों की
कि उछाल रहे हैं वे हमारी खोपड़ियाँ, गोटियों की तरह
और चढ़ रहे हैं सीढ़ियाँ
और सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते ये सांप
सांपों से देवता हुए जाते हैं

किसान मार्च

पूरी पृथ्वी को बांधते हैं किसान के पांव
हरियाली से
पहाड़िया चढ़ते हैं उतरते हैं घाटियां
एक एक कोना भर देते हैं मिट्टी का
अन्न से
बीजों को जगाते हैं नींद से
सबका पेट भरने के लिए
मगर सोए रह जाते हैं बीज
उनकी आंखों के
कि उनके सपनों को पोसने वाला कोई नहीं
कोई नहीं जो चलाए हल बंजर होती आंखों में
फसल उगाने के लिए
कि सूखे चटकते खेतों में
भटक रहे हैं किसान
पानी की जगह
सरकारी आंकड़े पी रहे हैं किसान
अपना सब बेच
बीज-खाद खरीद रहे हैं किसान
फसलों को
अपने आंसुओं से सींच रहे हैं किसान
आंकड़ों की काली स्याही में
तड़प रहे हैं किसान
इज्जत की खातिर
कूए में कूद रहे हैं किसान
नीम की बाजुओं से लिपट
दम तोड़ रहे हैं किसान
अपने ही खेतों में दफ्न हो रहे हैं किसान
अपनी हड्डियों को खाद में बदल रहे हैं किसान

मगर अब संभल रहे हैं किसान
झूठे वादों की पोल खोल रहे हैं किसान
अब एकजुट हो रहे हैं किसान
आत्महत्याओं के बोझ को अपने सरों से उतार
अधिकारों के लिए बढ़ रहे हैं किसान
कि उनके कदमों को रोकना तुम्हारे बस का नहीं
खेत की मिट्टी में उगे हैं उनके पांव
कि सूरज ने अपने अलाव में पकाया है उन्हें
वे आ रहे हैं तुम्हारे शहर की तरफ
तारकोल से चिपकी सड़क पर चलते हुए
अपने बुझते चूल्हों का दर्द लिए
तुम्हारे कानों आंखों नाकों में भरे तारकोल को निकालने के लिए

गाँधी

बिकता रहता है
कागजों में
घिसता रहता है
उँगलियों में
और चलता रहता है
जेबों में
बस यही बचा है
गाँधी
आज हमारे पास

अब भी सबूत चाहिए तुम्हें

उसी की आँखों के आगे टूटती रही मासूम
शैतानों ने नोंच डाली उसकी आत्मा
चीखों से सुन्न पड़ गईं दीवारें
काँप उठे पेड़
परिंदे भाग गए छोड़कर ऐसी ज़मीं
मगर वहीं बैठा है तुम्हारा भगवान
स्थिर
उस पत्थर में कोई हलचल ही नहीं

अब भी सबूत चाहिए तुम्हें
अब भी भरोसा है तुम्हें
उसके होने में!

निकल आया है चाँद

निकल आया है चांद
टिम टिम तारों के साथ
काले आसमां को रोशन करने
और गा रहे हैं बच्चे
चंदा मामा दूर के
पूए पकाए बूर के
हजारों गलियों में घूमते हुए

अनगिनत आवाज़ों में
कम है आज एक आवाज़
मगर खुश है चंदा मामा

बच्चों के चेहरों पर
उतर रही है रात
मगर दमक रहा है चंदा मामा

कैद हो रहे हैं बच्चे
चीखों में
मगर गुनगुना रहा है चंदा मामा

गिर रहे हैं बच्चे
कब्रों में
मगर चढ़ रहा है चंदा मामा
ऊपर कब्रों के
पीले चेहरों की नुमाइश सजाने के लिए

मृत्यु

तुम ही नहीं मरे थे गाँधी
उस गोली से
कोई और भी मरा था तुम्हारे साथ
वो जो निकले थे
खून से लथपथ
तुम्हारे दिल से राम
उन्हें खा गया
जय श्री राम

बुनियाद

लगभग हर बात से असहमत
ज्यादातर नाराज़
झगड़ा तक होता है पिता से
वह मेरी तरह क्यों नहीं सोचते
सोचता हूं
हर बात दकियानूसी पुरानी घिसी हुई लगती है
हर बात से कटा रहता हूं
खाने के अंदाज से लेकर बात करने तक
पसंद बहुत कम मिलती है हम दोनों की
तोरई लौकी टिंडा
ये भी कोई सब्जियां है खाने की
कुर्ता पाजामा गमछा साथ रहते हैं उनके
मैं बचता हूं इन सबसे
उनका पेट खराब रहता है
मेरा होने लगा है अब
बात करते-करते कई बार
उनका अंदाज जकड़ लेता है मेरी जुबां
गर्मियों में पानी साथ रखता हूं
और सर्दियों में मफलर
गमछा शर्माता शर्माता
सिकुड़ आता है बैग के कोने में कभी-कभी
शीशे में झिझकती झुर्रियाँ
ढाल रही हैं मेरा चेहरा
ले जा रही हैं थोड़ा करीब पिता के मुझे
झुर्रियां जिनसे खाल थोड़ा खिंच आती है
जैसे ज्यादा हो गई हो जगह
कुछ और रखने के लिए
कितनी उम्र तय करनी पड़ी
हैरान हूं
अपनी बुनियाद समझने के लिए

आग

तारे हैं
तो कितनी सुंदर है रात
जैसे जुगनुओं भरी हो टोकरी
और उढ़ेल दे कोई
आसमां के चेहरे पर उसे

दूर से
कितनी सुंदर नज़र आती हैं
चमकती जलती हुई चीजें
जब तक हम तक नहीं पहुंचती
सुंदर लगती है आग

जिनपे टाँग दें हम अपने पते
(भाई शम्भू यादव के लिए)

आवारा ख्वाब उतरते हैं
उसकी आंखों में
और वो उनसे भी आवारा
बहता रहता है वक्त की रफ्तारों में
भूत भविष्य वर्तमान
सब जगह एक साथ
वक्त की आंखों में आंखें डाले
छोड़ता रहता है सिगरेट के छल्ले
मिट्टी की खुशबू की तरह
दुनिया भर की तमाम बातों में

वक्त से भी ज्यादा मनमौजी
वक्त सा दोस्त
उसी सा खरा
उससे भी ज्यादा गमगीन
आम लोगों की आम लड़ाइयों में लड़ता
पिटता
हाँफता
डटा हुआ
सबका अजीज
खिली धूप सा मुस्कराता
गले लगाता
आज के मुश्किल दौर में भी बड़ा मौलिक सवाल पूछता
“कैसा है भाई ”
और फिर ऐसे घुल जाता फिक्र में
जैसे घुल जाती हैं झुर्रियाँ चेहरे में
बारीक से बारीक हँसी की
थाह लेती हुईं

ऐसे कितने हैं लोग हमारे आसपास
नरेश सक्सेना की ईंटों की तरह
अव्वल और तपे हुए
“कि सात ईंटें चुन लें तो जलतरंग बजने लगे”
ऐसी ईंटें जो घर बनाती हैं
जिनके बाहर
टाँग दें हम अपने पते
लिखकर
“घरौंदा”
निश्छल मुस्कराहट पर

मैट्रो में प्रेम

जैसे जैसे बढती गयी भीड़
वैसे वैसे मिलती गयी जगह
उन्हें मिलने की
करीब आने में
अब नहीं थी कोई दिक्कत
साँसें मिल रही थी साँसों से
नजरें गुथी थीं नजरों से
बदन बदन नहीं थे
खुशबू थे
बागीचे में हंसते
फूलों से महकते हुए
लोग लोग नहीं थे
पेड़ थे
कुछ न देखते, कुछ न सुनते हुए

पिता होना

पिता होना
फूल पत्तियों फलों से भर जाना है
पिता होना
सपनों को नींद में सहलाना है
पिता होना
जिम्मेदारियों को दोस्त बनाना है
पिता होना
परेशानियों से नबते जाना है
पिता होना
उम्मीद से चलते जाना है
पिता होना
डर के भँवरों को पी जाना है
पिता होना
दिल में पत्थरों के चट्टे लगाना है
पिता होना
वक्त की नब्ज से लटक जाना है
पिता होना
पक्षी होना है
आसमान में उड़ उड़ कर देखना
क्षितिज की टोह लेना है

मिस्ड काल्स

दो मिस्ड कॉल्स फड़फड़ा रही हैं अब भी
नहीं मिली वजह इन्हें लौटने की
टाँक दो कोई जवाब इनके पंखों पर
नहीं,
तुम्हारी बालियों से लटक
बुन लेंगी ये घोंसले
बया की तर्ज पर
फिर सुनना
दिन-रात
इनकी चिट-चिट
इनकी शिकायतों की किट-पिट

हँसी

चाय की बंद पुड़िया
क्या खोली तुमने
हँसी की पोटली खोल दी
अब मुलैठी की तरह
घुल रही है हँसी
मेरे कंठ में
तुम्हारे नाम की ठुमरी गाती हुई

ढूँढता हूँ मैं तुम्हारा चेहरा

ढूँढता हूँ मैं तुम्हारा चेहरा
ढूढते हैं
अंधेरे में जैसे
पैर अपनी जमीं


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