खबर फील्ड रिपोर्टिंग

बाढ़ में डूबे पटना में तत्काल समाधान न निकाला गया तो बीमारियों का खतरा

विकाश यादव


पटना: बिहार में बारिश जोर पर थी, ठीक इस बारिश से पहले बिहार का एक बड़ा हिस्सा सुखाड़ की चपेट में था। कई जिला में लगी फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिला जिससे वो बर्बाद हो गईं और पटना के आसपास कई इलाकों को सूखा घोषित कर मुआवजा देने की कयावद शुरू हुई है । कई पंचायतों को सूखा घोषित किया गया, कई अभी इसी आस में है।

इसी बीच दो-तीन की लगातार बारिश ने बिहार की राजधानी पटना में कहर मचा दिया। पटना ठप रहा, बारिश के दो दिन बाद पटना में आवागमन कहीं-कहीं शुरू हुआ है। राजेन्द्र नगर, बोरिंग रोड, गांधी मैदान, गर्दनीबाग समेत हर क्षेत्र में शायद सिर्फ मुख्यमंत्री आवास को छोड़ जीवन पूरी तरह ठप, राजेन्द्र नगर में अभी भी कई वार्ड में गले भर पानी। इसी बीच उप मुख्यमंत्री का पैतृक आवास जलमग्न, साहेब फ़ोन घुमाए, दनादन NDRF की गाड़ियां दौड़ती आयी और साहेब को उड़ा ले गयीं । लेकिन साहेब के इर्द गिर्द जनता की सुध तक नहीं लिया जा रहा। बताते चलें कि पटना के ड्रेनेज सिस्टम की कमान 15 वर्षों से इन्हीं साहेब के पास है।

बाढ़ में डूबा शहर, तस्वीर: तौसीफ़ आफाक़

उधर मुख्यमंत्री बयान देते हैं कि हथिया बरसना तो अभी शुरू भी नहीं हुआ,जनता धैर्य रखे !

‌बिहार का एक बड़ा हिस्सा सुखाड़ और बाढ़ दोनों ही के चपेट में हर साल आते हैं । बिहार में नदियों का जाल है लेकिन नदियों से जो जुड़ी नहर खोदीं गईं वो पूरी तरह ठप हैं । अगर नदी के पानी का नहरों में बहाव सुचारू रूप से हो तो सबसे पहले तो बिहार की कृषि उत्पादन में जबरदस्त सकारात्मक उछाल आ सकता है, साथ ही बिहार को सुखाड़ का दंश नहीं झेलना पड़ेगा। आइये अब बिहार की राजधानी पटना की बात करते हैं । पटना में लगातार 3-4 दिनों से जलजमाव है और यह स्थिति आने वाले 7 दिनों तक रह सकती है। उसके मुख्यतः तीन कारण  हैं ।
‌एक नेताओं की इच्छाशक्ति
‌पटना के ड्रेनेज सिस्टम का चौपट हो जाना।
‌पटना के गंगा नदी केे किनारे होने के कारण इस समय गंगा नदी का जलस्तर ज्यादा रहता है, जिससे पटना के पानी का बाहर जाना असम्भव सा है।

बाढ़ पीड़ितों की सहायता करते आइसा के कार्यकर्ता,तस्वीर: तौसीफ़ आफाक़

थोड़ा गंगा के मौजूदा हालात को समझिए।
अभी नर्मदा नदी पर बांध बन गया, और जब बांध में पानी भर रहा था तो प्रधानमंत्री नर्मदा की आरती उतार रहे थे और मीडिया प्रधानमंत्री के लिए मंत्रोच्चारण कर रहा था । दूसरी तरफ 150 से अधिक भारतमाता ग्रामवासिनी की जनता अपना पशु, खेत, घर और खुद को बचाने की जद्दोजहद कर रहा था। इससे भारतीय जनमानस को फ़र्क़ पड़ना बन्द हो गया है। पटना के भी कई रिहाइसी इलाकों के AC वाले बन्द कमरे में जो आज डूबे हुए हैं, वहां गोदी मीडिया के मंत्रोच्चारण पर जयकारा लग रहा था। आज वो खुद फँसें हैं तो बुरा लग रहा है।
यह है वर्ग, भारतीय वर्ग चरित्र को समझिए!
खैर, आइये गंगा पर चलते हैंं, गंगा पर एक फरक्का बराज है, जिसका निर्माण 1961 में शुरू हुआ, एवं
कुल 156.49 करोड़ की लागत से 1975 में पूरा हुआ।

बराज जिस उद्देश्य से बनाया गया, जिस बात की प्राथमिकता दी गयी थी क्या उसका पालन किया गया?
विकीपीडिया पर कुछ यूँ ही लिखा है:-
बैराज का उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह से नियमित यांत्रिक ड्रेजिंग की आवश्यकता के बिना तलछट(Sediment पानी के साथ बहने वाला बालू या कण) के निस्तारण के लिए 1,100 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड (40,000 घन फीट / सेकंड) गंगा से हुगली नदी की ओर मोड़ना है। परियोजना शुरू करने के बाद, यह पाया गया कि फरक्का बैराज से निकला पानी का बहाव संतोषजनक ढंग से नदी से तलछट(Sedimnet) बहने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसके अलावा, फरक्का बैराज के उच्च स्तर बढ़ने के कारण गंगा नदी में नियमित रूप से भूमि कटाव बढ़ता हैं। पर्याप्त उच्च भूमि पहले से ही निम्न स्तर के नदी तल में परिवर्तित हो जाती है, जिससे भारी जनसंख्या का विस्थापन होता है। फरक्का बैराज से निकाला गया पानी, फरक्का में उपलब्ध गंगा नदी के पानी के 10% से कम है। भारत सरकार प्रवाह को बढ़ाने के लिए फरक्का फीडर नहर को सीमेंट लाइन / चौड़ा / गहरा करने पर विचार कर रही है।

Sediment को बहने के लिए पानी की गति तेज होने चाहिये, लेकिन बराज के बनने के बाद गंगा के पानी का प्रवाह घट गया जिसके कारण नदी अब साथ में sediment नहीं बहा सकती। इसके फलस्वरूप sediment नदी में जमने लगा और नदी की गहराई घटती चली गयी। नदी अब चौड़ी होने लगी और इस दरम्यान नदी के आसपास के इलाके में लगातार बाढ़ आना आम हो गया। साथ में इसके इर्द गिर्द के खेत कटकर नदी में चले गए।

बाढ़ पीड़ितों की सहायता करते आइसा के कार्यकर्ता,तस्वीर: तौसीफ़ आफाक़

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सिर्फ पटना से सटे ग्रामीण इलाकों में 10000 एकड़ की खेती वाली उर्वरक जमीन का नामोनिशान मिट गया। पटना से सटे मनेरशरीफ के ग्रामीण इलाकों में दर्जनों गाँव नदी में समा गये ।

जर्जर अर्थव्यवस्था, किसानों पर दोहरी, तिहरी जो कह लीजिए वो मार! सुखाड़, बाढ़, खेतों का कटाव, मँहगे और नकली बीज, महंगी जरूरत से बहुत कम खाद, ऊपर से बच्चों को नौकरी नहीं, और आप कह रहे कि हथिया अभी बरसा भी नही!
मदद के नाम पर 6000 रुपया हर परिवार को शुरू में परिवार के हर सदस्य को था। एक साल 6000 रुपया में कैसे चलेगा?
हमारी जमीन, हमारे जंगलों नदियों को बर्बाद कर दिये!

अब पटना पर वापस लौटते हुए कुछ सवाल हैं:-
पटना का ड्रेनेज सिस्टम खराब है, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
लागतार इसको दुरूस्त नहीं किया गया। क्यों?
इस पर बहस होनी चाहिए, कोर्ट इस पर संज्ञान ले और बिहार सरकार एवं पटना मेयर पर क्रिमिनल एक्ट के तहत केस चलाये।

पटना का ड्रेनेज सिस्टम इतना बेकार और कबाड़ा हो चुका है  कि हल्की सी बारिश में भी पटना के कई इलाकों में जलजमाव की स्थिति बन जाती है।
पटना के कई इलाकों में जैसे राजेन्द्रनगर के रोड नंबर 4,6,10 आदि में तीन दिन गुजरने के बाद भी जलस्तर बना हुआ है और वह गले तक है।
व्यवस्था के नाम पर रेस्क्यू टीम तो है लेकिन रेस्क्यू टीम के पास सीमित बोट है।
हेलीकॉप्टर से घर के ऊपर खाना गिराया जा रहा। उसमें खाने के नाम पर गीला, सड़ा हुआ चूड़ा एवं सड़ी आलू है।
आने वाले दिनों में यह जलस्तर एक इंच भी घट जाए तो भला ही हो। लेकिन मौजूदा स्थिति  और सरकारी गति से हो रहे प्रयास को देखकर सब कुछ असम्भव जैसा लगता है।

यह बारिश का पानी है और अगर इसकी निकासी का तत्काल समाधान नहीं किया गया तो पटना की बड़ी आबादी डेंगू और मलेरिया के चपेट में होगी । जिस हालात में पटना का सरकारी हॉस्पिटल है, उसको पहले इलाज की जरूरत है।

आज सिर्फ पटना डूबा है,कल पूरा बिहार डूबेगा तो कोई हैरत की बात नहीं, क्योंकि आपकी इच्छाशक्ति सिर्फ उच्चस्तरीय बैठक करने भर है।

(पटना विश्वविद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर विकाश यादव बिहार आइसा के राज्य सह-सचिव हैं ।)

About the author

समकालीन जनमत

Leave a Comment