साहित्य-संस्कृति

‘मुक्तिबोध की आत्मालोचना में समाज की आलोचना निहित है’

मुक्तिबोध जन्मशती आयोजनो के क्रम में 24 नवंबर को झांसी में प्रलेस, जसम, इप्टा और आगाज़ विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में ‘मुक्तिबोध:समय से संवाद’ विषय पर बहुत ही महत्वपूर्ण चर्चा हुई।

हिंदी के सर्वकालिक महान कवियों में से एक महत्वपूर्ण कवि- चिंतक गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) की जन्मशती का आयोजन विभिन्न जगहों पर हुआ है।

इन्हीं आयोजनों के सिलसिले में झांसी के खंडेराव गेट स्थित गांधी भवन सभागार में परिचर्चा व काव्यपाठ का आयोजन किया गया।

इसमें झांसी नगर के आस पास के साहित्यप्रेमी बुद्धिजीवियों,अध्यापकों,छात्रों की अच्छी संख्या में भागीदारी रही।

आयोजन के पहले सत्र में ‘मुक्तिबोध:समय से संवाद’ विषय पर परिचर्चा हुई।इसमें आधार वक्तव्य आगाज़ विचार मंच के साथी डॉ. अनिल अविश्रान्त  ने दिया।उन्होंने मुक्तिबोध की कविता के दुरूह होने के सवाल को उठाते हुए मुक्तिबोध के अध्य्यन और मूल्यांकन के सम्बंध में बने हुए पूर्वग्रहों की ओर इशारा किया।उन्होंने मुक्तिबोध की कविता के विभिन्न आयामों की चर्चा की।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध कवि व समीक्षक पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि जिसका अपने आप से संवाद नहीं होता उसका अपने समय से संवाद नहीं हो सकता।

 

अपनी कविताओं में मुक्तिबोध ने अपने आत्म से संवाद पर बहुत जोर दिया है।यह आत्मसंवाद ही अपनी आत्मालोचना के स्तर तक जाती है।

अपने आत्म के प्रति आलोचनात्मक और सजग व्यक्ति बुरे के खिलाफ हमेशा ही खड़ा होता है।उन्होंने मुक्तिबोध की कहानी ‘क्लॉड इथरली’ पर बात के जरिये अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि कहानी का नायक अमेरिकी सैनिक क्लॉड इथरली जिसने जापान के शहरों पर बम गिराया था, बम से होने वाले संहार को देख कर पश्चाताप से भर गया और इससे उबरने के लिए वह अपराध करता था जिसके कारण उसे जेल में डाला गया लेकिन जब अधिकारियों को पता चला कि वह क्लॉड इथरली है तो उसे ‘वार हीरो’ का तमगा देकर जेल से रिहा कर दिया गया लेकिन उसे पागल खाने में डाल दिया गया।

उन्होंने कहा कि मनुष्य ने अपनी चेतना को तलघर में डाल रखा है।अपने आप से ही उसका संवाद नहीं है,क्योंकि उसे पता है कि अगर वह अपने आत्म चेतना की बात सुनेगा तो उसे कष्ट झेलना पड़ेगा।इसलिए मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाने और आत्म संवाद की बात की थी।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता समकालीन जनमत पत्रिका के प्रधान संपादक रामजी राय  ने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं में जो आत्मालोचना है वह खुद उनकी अपनी आत्मालोचना मात्र नहीं है वह समाज की आलोचना भी है।

उनका आत्मसंघर्ष वस्तुतः जगत संघर्ष है।रामजी राय ने आगे कहा कि मुक्तिबोध मानते थे कि जीवन त्रिआयामी है।जीवन की एक भुजा इतिहास में है दूसरी वर्तमान में और तीसरी भुजा वह है जो इन दोनों भुजाओं के बिना आकार नहीं ले सकती जो भविष्य का नक्शा है।

इसी तरह मुक्तिबोध की कविता भी त्रिआयामी है।एक ओर वह इतिहास से संवाद करती है दूसरी अपने वर्तमान से संवाद करती है और तीसरे स्तर पर वह भविष्य के स्वप्न को आकार देती है।मुक्तिबोध की कविता सभ्यता समीक्षा करती है।

‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ में मुक्तिबोध ने जयशंकर प्रसाद की कामायनी को मुक्तिबोध ने सभ्यता समीक्षा कहा है जबकि खुद मुक्तिबोध सभ्यता समीक्षक हैं।भारत मे साम्राज्यवादी पूंजी की राजनीति को स्पष्ट करने वाली कविता पंक्तियों –

“हमारे समुद्र तट का
सुदूर उस पश्चिमी तट से जरूर कोई नाता है
इसीलिए सुख हमारे यहां नही आता है”
के जरिये उन्होंने नेहरू की नीतियों का मुक्तिबोध द्वारा की गई आलोचना को स्पष्ट किया।

अपनी बात को रामजी राय ने मुक्तिबोध की कविता ‘चंबल की घाटी’ का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया। रामजी राय ने मुक्तिबोध की कविता में गांधी के विभिन्न रूपों में अलग अलग जगह आने को व्यख्यायित करते हुए मुक्तिबोध के भिवष्य स्वप्न को रेखांकित किया।

परिचर्चा सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रलेस के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष प्रो .संतोष भदौरिया ने झांसी में हुए इस आयोजन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज देश मे प्रगतिशील साहित्य संस्कृति पर बातचीत करने की जगहें कम होती जा रही हैं।

विश्वविद्यालयों की हालत बेहद खराब है जिन्हें यथास्थितिवाद का अड्डा बनाया जा रहा है उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध का रचनात्मक संघर्ष इस अंधेरे से लड़ने की ताकत देता है।

उन्होंने उन परस्थितियों का जिक्र किया जब मुक्तिबोध की किताब ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था।।

उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविता बाजारवाद और मध्यवर्गीय ढुलमुलपन से गंभीर मुठभेड़ करती है और उनकी निर्मम आलोचना करती है।

उन्होंने कहा कि आजकल हिंदी समाज के कुछ लोग मुक्तिबोध के साहित्य को लेकर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं जिनके पीछे महज वे पूर्वाग्रह हैं जो उनके जीवनकाल और उसके बाद कुछ आलोचकों ने बना लिया था।

आज मुक्तिबोध को ठीक से पढ़ने और उनके महत्व को समझने की जरूरत है। परिचर्चा का संचालन जसम के उत्तर प्रदेश सचिव रामायन राम तथा आभार ज्ञापन इप्टा झाँसी के महासचिव मुहम्मद नईम ने किया।

झांसी में पहली बार मुक्तिबोध पर इस तरह का आयोजन हुआ लेकिन इस परिचर्चा को नगर के साहित्यप्रेमियों छात्रों-अध्यापकों ने पूरी तन्मयता से सुना उससे मुक्तिबोध की कविता की ताकत का एहसास होता है।

समय से संवाद सत्र के बाद भोजनावकाश के बाद दूसरे सत्र में झांसी नगर के कई कवियों व शायरों ने अपनी कविताओं का पाठ किया।इनके अतिरिक्त आमंत्रित कवि- श्री पंकज चतुर्वेदी, बीना, मध्यप्रदेश से पधारे महेश कटारे सुगम, आशुतोष यादव, रुचि वर्मा, अनिल अविश्रान्तशिव प्रकाश त्रिपाठी ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

काव्य गोष्ठी का संचालन मुहम्मद नईम  ने किया और सभी आथितियों एवम् श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन बुन्देलखण्ड महाविद्यालय झाँसी के हिंदी के सहायक प्रोफेसर युवा कवि शिव प्रकाश त्रिपाठी ने किया।

इस मौके पर पर दतिया से आये वयोवृद्ध साहित्यकार के .बी. एल. पांडेय, दिनेश बैस, अर्जुन सिंह चांद, कुंती हरिराम, पूर्व मेयर धन्नूलाल गौतम, कथाकार बृजमोहन, मदन मानव, एस पी सत्यर्थी, साकेत सुमन चतुर्वेदी, अशोक दूबे, विनोद साहू, कमलेश कुमार, ब्रजेन्द्र बौद्ध, विजय सिंह परमार, सुधीर कुमार  इत्यादि लोग उपस्थित रहे।

आयोजन के बाद सभी लोगो ने आगे भी झाँसी में ऐसे अयोजन करते रहने का संकल्प लिया।

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