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January 19, 2020
जनमत शख्सियत

सत्यजित रे का वैज्ञानिक स्वरुप

अभिषेक मिश्र


साहित्य और सिनेमा की अविस्मरणीय विभूति सत्यजित रे (2 मई 1921–23 अप्रैल 1992 ) का आज 98 वाँ जन्मदिन है. इस मौके पर उन्हें याद कर रहे हैं अभिषेक मिश्र।

आरंभ से ही सत्यजीत रे की रूचि चित्रकला में थी मगर 1950 में लन्दन प्रवास के दौरान उनकी रूचि फिल्मों में विशेष रूप से बढ़ी, और Ladri di biciclette की Bicycle Thieves ने उनपर इतना प्रभाव डाला कि उन्होंने फिल्म निर्माण को ही अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बना लिया.

उनके रूप में देश को एक अद्भुत लेखक, निर्देशक और चित्रकार मिला. मगर उनका एक और योगदान जो काफी अहम् है वो है विज्ञान लेखन के क्षेत्र में.

संभवतः इसके पीछे उनके पितामह स्व. उपेन्द्रकिशोर राय के संस्कारों की महती भूमिका रही होगी, जो ब्रह्मसमाज के नेता के साथ-साथ एक खगोलविद्द भी थे.

विज्ञान कथाएँ उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग रहीं. जिन्होंने भारतीय साहित्य को भी अतिशय समृद्ध किया.

‘फेलु दा’ सत्यजित रे का ऐसा ही एक चरित्र था, जो प्राइवेट जासूस के रूप में आपराधिक घटनाओं की तहकीकात करता था।

जाहिर है कि अपराधी की शिनाख्त में उसकी वैज्ञानिक सोच का भी उतना ही योगदान रहा करता था।

पूर्णतः विज्ञान जगत से जुड़ा एक काल्पनिक व्यक्तित्व ‘तिर्लोकेश्वर शंकु’ या ‘प्रो. शंकु’ का था, जो एक वैज्ञानिक की भूमिका में था। इसका काल्पनिक निवास स्थान ‘गिरीडीह ‘ (जो कि अब झाड़खंड में है) था।

इस श्रंखला में इसके नौकर प्रहलाद और बिल्ली न्यूटन की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस श्रृंखला में दिलचस्प वैज्ञानिक परिकल्पनाओं को प्रस्तुत कर उन्होंने अपनी तर्कशील और वैज्ञानिक बुद्धिमता का अद्भुत परिचय दिया है।
विज्ञान कथाओं में सत्यजित रे की ‘बांकूबाबुर बंधू’ (या बाँकु बाबु का मित्र) शीर्षक कहानी का एक उल्लेखनीय स्थान है। 1962 में लिखी इस कहानी की खासियत एक दूसरे ग्रह के प्राणी की उपस्थिति है जो स्वभाव से काफी दयालु और बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करने में काफी सक्षम भी है।

पूर्ववर्ती विज्ञान कथाओं के एलियंस की तरह यह खौफनाक या आक्रामक नहीं है। सत्यजित रे की इस रचना ने देश-विदेश के कई रचनात्मक व्यक्तित्वों को अपनी ओर आकर्षित किया।

स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘क्लोज इनकाउन्टर ऑफ द थर्ड काइंड’ (Close Encounters of the Third Kind), इ. टी. (E. T.) तथा राकेश रोशन की ‘कोई मिल गया’ जैसी फिल्में तथा कई टी. वी. धारावाहिक भी इसी रचना से प्रेरित माने जाते हैं।

विज्ञान कथा तथा विज्ञान लेखन को रोचक बनाने की दिशा में एक साहित्यकार तथा फिल्मकार के रूप में सत्यजित रे जैसी हस्तियों ने जो प्रारंभिक बुनियाद रखी,

आज उसे और भी मजबूत किये जाने की जरुरत है। आज उनके जन्मदिन के इस महत्त्वपूर्ण अवसर पर उनकी रचनाओं और कृतियों पर नए दृष्टिकोण से पुनर्विचार भी अपेक्षित है.

 

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