स्मृति

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय: भारतीय दर्शन में भौतिकवाद के अप्रतिम अध्येता

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने भारतीय परंपरा मे भौतिकवाद तथा वैज्ञानिक चिंतन प्रणाली पर बहुत ही गहन शोध और लेखन किया है। भारत मे कई पीढियां वैज्ञानिक और पदार्थवादी चिंतन के बारे में डीपी चट्टोपाध्याय के लेखन के जरिये ही परिचित होते रहे हैं।। नास्तिकता और वैज्ञानिकता के इतिहास की पड़ताल के क्रम में उन्होंने मुख्यधारा के वेदांत दर्शन की तार्किक आलोचना विकसित की। उन्होंने यह बताया कि प्रत्ययवाद भारतीय दर्शन की एक मात्र पहचान नहीं है, बल्कि शुरू से ही एक तार्किक विचार प्रणाली यथास्थितिवाद के विरोध में खड़ी रही है। इस प्रक्रिया में उन्होंने लोकायत दर्शन को एक तरह से पुनर्जीवित करने का कष्ट साध्य काम किया जो इनका सबसे महान कार्य है। लोकायत के अलावा चरक और सुश्रुत जैसे प्राचीन भारतीय चिकित्सकों के विषय मे भी इन्होंने महत्वपूर्ण अनुसंधान किया है।

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(प्रख्यात मार्क्सवादी दार्शनिक देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय (19 नवम्बर 1918 – 8 मई 1993) की आज 100वीं जयंती है। उनका जन्म शताब्दी वर्ष आज समाप्त हो रहा है।डीपी चट्टोपाध्याय की कृतियों ने भारतीय दर्शन की भौतिकवादी व वैज्ञानिक चिंतन परम्परा को आम पाठकों तक पहुंचाने का काम किया है।पिछले पांच दशक से भी ज्यादा समय से दर्शन में रुचि रखने वाली युवा पीढ़ी को इनकी कृतियाँ वैकल्पिक दार्शनिक प्रणाली से परिचित कराती रही हैं।उनकी स्मृति को सलाम करते हुए हम उनके महत्व को रेखांकित करते हुए यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं-संपादक )

 

डॉ रामायन राम

 

भारतीय दर्शन में भौतिकवादी दृष्टिकोण की सुदीर्घ परम्परा रही है जिसने धर्मशास्त्रों से नियंत्रित वेदांत दर्शन के बरक्स एक तर्कशील,जनपक्षधर और पदार्थवादी विचारधारा को विस्तार दिया। आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि दार्शनिक चिंतन का विकास समाज के विकास के साथ जुड़ा हुआ होता है। समाज के विकास,उत्पादन सम्बन्धों के बदलते स्वरूप, विज्ञान व तकनीक के विकास के साथ चिंतन का स्वरूप भी ऊंची अवस्था मे जाता है। यूरोपीय समाजों में दार्शनिक परम्परा के अध्ययन से यही साबित होता है।लेकिन भारत इस मामले में अपवाद की तरह है।यहां पर इतिहास के एक विशिष्ट कालखंड में चिंतन प्रणाली में मौजूद भौतिकवादी चेतना का दमन करने के बाद जिस प्रत्ययवादी दर्शन का उभार हुआ वह समय के साथ और अधिक रूढ़ और अवैज्ञानिक होता चला गया , जिसने भारतीय मानस को अज्ञानता के अंधेरे से बाहर निकलने ही नहीं दिया।

सत्रहवीं शताब्दी के मुहाने तक जबतक पश्चिमी हवाएं भारत मे दाखिल नहीं हुईं हर तार्किक व वैज्ञानिक सोच को जो सनातन परंपरा से टकरातीं थी, नास्तिकता का प्रचारक और धर्मद्रोही कहकर खारिज किया जाता रहा। लोकायत या चार्वाक दर्शन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकायत एक लोक में प्रचलित इहलौकिक और भौतिकवादी दर्शन था जिसके ग्रन्थों की नष्ट कर दिया गया और आज लोकायत के बारे में जो कुछ भी जानकारी है वह इसके विरोधियों के जरिए सामने आई है। सनातनधर्मी वर्चस्व की शक्तियों ने लोकायत का मजाक उड़ाते हुए इसे केवल धन अर्जित करने और भोग करने की जीवन पद्धति के रूप में चित्रित किया। यहां भौतिकवादी शब्द का अर्थ अधर्मी और विलासी के बराबर है।

हजारों साल तक चार्वाक और न्याय- वैशेषिक, सांख्य और बौद्ध जैसे अनुभववादी और प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने वाले दर्शनों पर धूल की परत छाई रही। इस समूचे कालखंड में किसी ने भी इस धूल को साफ करने और भौतिकवादी धारा का संधान करने की कोशिश नहीं की। विवेकानंद से लेकर गांधी और सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक कोई भी वेदांत की सीमा का उल्लंघन करने का साहस नहीं कर पाया।

20वीं शताब्दी में मार्क्सवाद के प्रभाव में कुछ भारतीय दार्शनिकों ने वेदांत की भाववादी धारा की चुनौती देने का काम किया। एम एन राय, भूपेंद्र नाथ दत्त, डीडी कोसंबी, दामोदरन, राहुल सांकृत्यायन, एस एन दासगुप्ता और देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ये कुछ नाम हैं जिन्होंने भारतीय चिंतन परम्परा में मजबूती से उपस्थित भौतिकवादी दृष्टि को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन दार्शनिकों में एक
महत्वपूर्ण नाम देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का है।

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का जन्म 19 नवम्बर 1918 को कलकत्ता में हुआ था। इनके पिता स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे।बचपन से ही इनका रुझान राजनीति की ओर हो गया था। कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का जुड़ाव वाम रुझान वाले राष्ट्रवादी आंदोलन से हो गया। यहाँ वे राधाकृष्णन और एस एन दासगुप्ता के छात्र रहे। मार्क्सवाद के गहरे प्रभाव के कारण वे मार्क्सवादी राजनीति और दर्शन के गहन अध्येता के रूप में उभरे। अपनी वैचारिक यात्रा की संगठित शुरुआत उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ से की। प्रो. एस एन दासगुप्ता के निर्देशन मे शोध के बाद उन्होंने कलकत्ता विवि में दर्शनशास्त्र के अध्यापक के बतौर काम करना शुरू किया जहां उन्होंने लगभग दो दशक तक अध्यापन किया। बाद में वे आंध्र विश्वविद्यालय और पूना विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया। वे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च(ICHR) और CSIR जैसी संस्थाओं से भी जुड़े रहे।

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने भारतीय परंपरा मे भौतिकवाद तथा वैज्ञानिक चिंतन प्रणाली पर बहुत ही गहन शोध और लेखन किया है। भारत मे कई पीढियां वैज्ञानिक और पदार्थवादी चिंतन के बारे में डीपी चट्टोपाध्याय के लेखन के जरिये ही परिचित होते रहे हैं।। नास्तिकता और वैज्ञानिकता के इतिहास की पड़ताल के क्रम में उन्होंने मुख्यधारा के वेदांत दर्शन की तार्किक आलोचना विकसित की। उन्होंने यह बताया कि प्रत्ययवाद भारतीय दर्शन की एक मात्र पहचान नहीं है, बल्कि शुरू से ही एक तार्किक विचार प्रणाली यथास्थितिवाद के विरोध में खड़ी रही है। इस प्रक्रिया में उन्होंने लोकायत दर्शन को एक तरह से पुनर्जीवित करने का कष्ट साध्य काम किया जो इनका सबसे महान कार्य है। लोकायत के अलावा चरक और सुश्रुत जैसे प्राचीन भारतीय चिकित्सकों के विषय मे भी इन्होंने महत्वपूर्ण अनुसंधान किया है।

लोकायत के अलावा इनकी मुख्य कृतियां निम्नलिखित है- भारतीय दर्शन: सरल परिचय (1964), Indian Atheism:A Marxist Analysis (1969), What is living and what is dead in Indian Philosophy (1976), lenin,The philosopher (1979), प्राचीन भारत मे विज्ञान और समाज(1977) , प्रकृति पदार्थ और परमाणु, जानने की बातें भाग-1 इत्यादि।

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने अन्य भारतीय मार्क्सवादी चिंतकों की तरह वेदांत दर्शन में सकारात्मकता की खोज नहीं की। उन्होंने भाववाद और भौतिकवादी दार्शनिक प्रणालियों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची। उन्होंने साफ कहा कि भारत मे प्राचीन काल से ही मनुष्यों के जीवन यापन की परिपाटी ‘वर्णाश्रम’ व्यवस्था द्वारा निर्धारित कर दी गई थी।’कर्म सिद्धान्त’ के जरिए यह तय कर दिया गया था कि वर्तमान के सारे कष्टों का कारण पूर्वजन्म के कर्म हैं,जिसका परिणाम यह हुआ कि यहाँ पर नए ज्ञान और वैकल्पिक विचार का मार्ग अवरुद्ध ही रहा।

अपनी किताब भारतीय दर्शन:सरल परिचय में उन्होंने लिखा है-” भारत वर्ष में कुछेक दार्शनिक मतवादों का जन्म बहुत पुराने समय मे ही हो गया था, और आगे के समय का दार्शनिक क्रिया कलाप- कम से कम इरादे में-इन मूलभूत दृष्टिभंगियों का पल्लवन भर था। यहां भी दार्शनिक के बाद दार्शनिक आये,लेकिन सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि किसी मौलिक रूप से नए दार्शनिक मतवाद का प्रतिपादन करने के लिए नहीं। इनमें से प्रत्येक किसी प्राचीन दार्शनिक सम्प्रदाय का हामी था जिसके समर्थन में वह नई-नई उद्भावनाएँ करता और इस प्रकार अपने साम्प्रदायिक पूर्ववर्तियों के तर्कों को बल पहुंचाने का प्रयत्न करता, उनमे किसी प्रकार की त्रुटि दिखाने का नहीं। संक्षेप में कह सकते हैं कि यहां कुछेक परस्पर पृथक दार्शनिक मतवादों का विकास साथ-साथ हुआ है,या,जैसी किसी ने ठीक टिप्पणी की है ‘यहां मूलभूत प्रकार वहीं के वहीं बने रहे।”1

डीपी चट्टोपाध्याय यह मानते हैं कि एक दूसरे से अलग दिखने वाले दार्शनिक सम्प्रदाय भी अंततः भूतकाल में ही अपना अंतिम सहारा ढूंढते हैं। अलग मतवाद का प्रवर्तन करने वाले लोगों ने भी वेदों को ही अंतिम प्रमाण माना है। इस कारण वे कहते हैं कि हमारे दार्शनिक चिंतन की धार्मिक अंधमान्यताओं और पौराणिक कपोल कल्पनाओं से ‘अधूरी मुक्ति’ मिली। शाश्त्रों को ‘ज्ञान वैभव का आगार’ समझने के कारण सूक्ष्म तार्किक विश्लेषणों, उच्च कोटि के सैद्धान्तिक वाद विवादों के साथ मिथकीय कपोल कल्पनाओं का ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ कायम हो गया जिसका परिणाम हुआ दर्शन का धार्मिक मान्यताओं से ‘अपूर्ण अलगाव’।

न्याय-वैशेषिक और सांख्य के बारे में वे कहते हैं कि ये भी मूलतः श्रुतियों पर आधारित हैं। प्राचीन बौद्ध दर्शन को वे मध्यममार्ग का अनुयायी बताते हैं और लोकायत को वे क्रांतिकारी और पूरी तरह स्वंतन्त्र चिंतन पर आधारित दार्शनिक मतवाद घोषित करते हैं। उन्होंने लिखा है-“वेदांत सम्प्रदाय का तो मूल दावा ही था कि वह श्रुति अर्थात वेदों पर सीधे सीधे आधारित हैं।लेकिन दूसरे सम्प्रदायों के अनुयायियों को भी जिनके मूल भूत दावों को वेदों से विशेष कुछ लेना देना नहीं है,कम से कम औपचारिक रूप से यह कहना पड़ता था कि उनकी दृष्टि में श्रुति का प्रामाण्य सबसे बढ़कर है।

इसी प्रकार वैशेषिक सूत्रकार भी यद्यपि उनकी मुख्य दिलचस्पी का विषय द्रव्य,गुण-कर्म आदि की दार्शनिक मान्यताएं हैं,घोषणा करते हैं कि उनकी इन मूलभूत मान्यताओं के समर्थन में मुख्य प्रमाण श्रुति है। ऐसे ही यद्यपि न्याय सम्प्रदाय की मुख्य दिलचस्पी तर्कशास्त्र की समस्यायों में था,स्वयं न्याय सूत्र में विस्तार के साथ इस मान्यता के समर्थन में युक्तियां दी गईं हैं कि वेदों में मिथ्या,परस्पर विरुद्ध या पुनरुक्त जैसी कोई बात नहीं और ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह जताना था कि यज्ञ अर्थात कर्म कांड सम्बन्धी वैदिक विधि निषेधों में गलत कुछ नहीं।यह ठीक है कि बौद्धों और जैनों को वेदों का प्रामाण्य स्वीकार न था लेकिन उनके भी अपने-अपने शास्त्र थे जिनके प्रति पूर्ण वफादारी का वे दावा करते थे।एक मात्र लोकायत या भौतिकवादी ही ऐसे थे जिन्होंने शास्त्र के सामने इस आत्मसमर्पण के विरोध में आवाज उठाई।”2

यहां डीपी चट्टोपाध्याय ने दर्शन की उन सीमाबद्धताओं की ओर इशारा किया है जो शास्त्रों द्वारा तय कर दी जाती हैं। यहां डॉ. अम्बेडकर का वह प्रसिद्ध कथन स्वाभाविक रूप से याद आ जाता है जहां उन्होंने शास्त्रों पर आधारित धर्म को त्यागने की बात की थी।उन्होंने कहा था मनुस्मृति के नियम के अनुसार वेदों और स्मृतियों की व्याख्या करने वाले सिद्धान्त के रूप में तर्कणावाद को पूर्णतः निराकृत किया गया है। इसे नास्तिकता के समान ही अनैतिक माना गया है और इसके लिए ‘बहिष्कार’ करने की दंड व्यवस्था की गई है। इस प्रकार जहां कोई विषय वेद या स्मृति से सम्बंधित होगा वहां हिन्दू तर्कपूर्ण विचार नहीं कर सकता। 3

यहाँ डॉ. अम्बेडकर और डीपी चट्टोपाध्याय के विचारों में जो साम्य है वह वस्तुतः द्वंद्वात्मक चिंतन की स्वाभाविक परिणति है। चट्टोपाध्याय जाति व्यवस्था को दर्शन व चिंतन के विकास में बाधा मानते हैं, वहीं अम्बेडकर भी जातिव्यवस्था को अलोकतांत्रिक और अमानवीय व्यवस्था मानते हैं दोनों ही विचारक इसके लिए धर्मशास्त्रों को जिम्मेदार मानते हैं। अम्बेडकर ने लिखा है-“यदि आप जातिप्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगाना होगा,क्योंकि वेद और शास्त्र किसी भी तर्क से अलग हटाते हैं और किसी भी नैतिकता से वंचित करते हैं।”4

अम्बेडकर के विचारों की संगति में चट्टोपाध्याय ने भारतीय दर्शन में वर्चस्व की विचारधारा की राजनीति को स्पष्ट करते हुए लिखा है-“हमारे कानून निर्माताओं ने,जिनका दबदबा हमारे दार्शनिकों पर बेहद था,अनुभव किया कि कानून-निर्माण का काम-अर्थात ‘जनता को नियंत्रण में रखने’ का काम अबाधित रूप से न चल पाएगा यदि बुद्धिवादी दृष्टिकोण को जन साधारण के बीच बेरोक टोक विकसित होने दिया जाएगा। श्रुतियों और स्मृतियों में अपार श्रद्धा की- उन श्रुतियों और स्मृतियों में-जिनमे हम विश्व के अधिकांश घटना-चक्र की और असमानतामूलक वर्ण-व्यवस्था की पौराणिक कल्पनाओं से भरी व्याख्या पाते हैं – आवश्यकता थी जनता को समुचित रूप से कानून पालन करने वाली बनाये रखने की,और एक पूर्ण रूप से विकसित बुद्धिवादी दृष्टिकोण इस श्रद्धा के लिए खतरा पैदा कर रहा था।”5

वेदों या श्रुतियों पर आधारित दार्शनिक परम्परा के समानांतर एक पदार्थवादी भौतिक चेतना पर आधारित दर्शन के रूप में लोकायत या चार्वाक दर्शन की पुनर्खोज के प्रक्रिया में डीपी चट्टोपाध्याय का कालजयी ग्रंथ ‘लोकायत’ अस्तित्व में आया। इसमें उन्होंने ढाई हजार साल के दर्शन के इतिहास में भाववादी और भौतिकवादी धारा का संघर्ष को सामने रखा है। चार्वाक मत के सम्बंध में जनकारी के स्रोत बहुत ही सीमित हैं,लगभग न के बराबर। ज्यादातर लोग मध्वाचार्य के ‘सर्वदर्शन संग्रह’ में संकलित वृहस्पति के सूत्रों के जरिये चार्वाक दर्शन के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं जिसके बारे में एस एन दासगुप्ता और चट्टोपाध्याय ने कहा है कि यह मध्वाचार्य के पुराग्रहों से युक्त है और उसने चार्वाक के बारे मे भ्रम ही ज्यादा फैलाया है। डीपी चट्टोपाध्याय ने चार्वाक के दर्शन को स्पष्ट करने के लिए वेदांत से भौतिकवाद की तुलना करते हुऐ तथ्यों का संधान किया।

लोकायत की भूमिका में उन्होंने लिखा-” जितना मैं भारतीय दर्शन की भौतिकवादी परम्परा को जानने का उपक्रम करता हूँ उतनी ही स्पष्टता से मुझे दिखाई पड़ता है कि भारतीय दर्शन में इस विरोधी परम्परा का कुछ विवरण दिये बिना यह काम पूरा नहीं किया जा सकता।खासकर उस भाववादी परम्परा का विवरण दिए बिना जो विश्व को नकारती है।”6

इसी में वे आगे लिखते हैं-”जिस तरह भौतिकवादी प्रवृत्ति हमेशा धर्मनिरपेक्षता, विवेकवाद तथा विज्ञान से प्रतिबद्ध थी। भाववादी प्रवृत्ति के साथ रहस्यवाद, दकियानूसीपन और धर्म ग्रन्थों के प्रति अटूट आस्था जुड़ी हुई थी। संघर्ष के इस मूल दृष्टिकोण से विचार करने पर भारत की दार्शनिक परम्परा का जो चित्र उभर कर आता है,उस आधारभूत विचारधारात्मक संघर्ष को समझने में उसका महत्व बहुत ज्यादा है। यह संघर्ष अभी भी चल रहा है।”7

यह बात उन्होंने 1973 में लिखी थी। आज के भारत मे इस बात के मायने और अधिक स्पष्ट और गहरे हो चुके हैं। पूंजी के संकट के दौर में भारत में हिंदुत्व और उग्र रूप में सामने है। अपने फासीवादी मंसूबे के साथ भारतीय जीवन पद्धति को वेदों और मनुस्मृति के सिद्धांतों के आधार पर निर्देशित करने की कोशिश चल रही है। ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टि को भारतीयता की मूल आत्मा की तरह पेश करने का प्रयास जारी है। हालांकि यह भी भुलाया नहीं जा सकता कि आधुनिक और स्वन्त्रता के बाद का भारत मूलतः वर्णाश्रम व्यवस्था के हिसाब से ही संचालित रहा है। हमारी चिंतन परम्परा में भौतिकवाद का संधान आज भी अधूरा कार्यभार है जिसे पूरा किया जाना है।

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का महत्व बताते हुए जर्मन दार्शनिक और प्राच्यविद वाल्टर रुबेन ने लिखा है–“आज भारत को अपनी परम्परा के आधार पर अपने दर्शन का विकास करना है,और जब तक भारत मे वर्ग रहेंगे तथा वर्ग संघर्ष चलता रहेगा, तबतक दर्शन के क्षेत्र में भी दो प्रमुख धाराएं-भौतिकवाद तथा प्रत्यय वाद एक दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करती रहेंगी। प्रत्ययवादी वेदांत की पुनर्व्याख्या से अपने को संतुष्ट करेंगे,जबकि भौतिकवादी देवी प्रसाद के रास्ते चलकर उस भारतीय द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का निर्माण करेंगे जो वर्ग संघर्ष में विजय प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।”8

आज 19 नवम्बर 2018 को देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की जन्म शताब्दी वर्ष की समाप्ति हुई है।पिछले आधी सदी से भी ज्यादा समय से इनके विचार भारतीय चिंतन परम्परा को वैज्ञानिक व तर्कशील दिशा दिखा रहे हैं।आज के संघर्ष में विचार हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ की तरह हैं।

संदर्भ–

1. भारतीय दर्शन: सरल परिचय , देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ,पृष्ठ संख्या 15, राजकमल प्रकाशन प्रथम संस्करण 1965

2. वही पृष्ठ सं. 28

3.जाति प्रथा उन्मूलन, बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खण्ड 1 पृष्ठ सं 97, प्रकाशक डॉ अम्बेडकर प्रतिष्ठान

4. वही पृष्ठ सं 99

5. भारतीय दर्शन: सरल परिचय पृष्ठ सं 27

6.‘लोकायत’ की भूमिका, देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय , राजकमल प्रकाशन

7. वही

8. भारतीय दर्शन: सरल परिचय का वाल्टर रुबेन द्वारा लिखित प्राक्कथन

 

(युवा आलोचक, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रामायन राम ‘जन संस्कृति मंच’ उत्तर प्रदेश इकाई के राज्य सचिव हैं )

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