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January 20, 2020
जनमत सिनेमा

राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

मेघना गुलज़ार की फ़िल्म राज़ी लंबे समय तक सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए एक जरूरी पाठ बनी रहेगी।

इस फ़िल्म के बारे में कहा गया है कि यह हरिंदर सिक्का के एक उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ पर आधारित है। न्यूज़ एटीन डॉट कॉम पर एक इंटरव्यू में सिक्का ने कहा है कि फ़िल्म क़िताब के एक छोटे से हिस्से का इस्तेमाल करती है।

उपन्यास लिखने के पीछे सिक्का का मूल मक़सद एक कश्मीरी लड़की द्वारा देश के लिए किए वीरतापूर्ण कार्य और बलिदान की अज्ञात कहानी को सामने लाना था। कहानी तो कह दी गई, लेकिन अनेक कारणों से वास्तविक नामों को बदल दिया गया।

भले ही अनेक समीक्षक इस फ़िल्म की तारीफ़ इसी बात के लिए कर रहे हों, लेकिन फ़िल्म किसी और ही जमीन पर है। यह देशभक्ति, राष्ट्रवाद, सैन्यवाद, युद्धवाद, वीरता और बलिदान जैसी तमाम पवित्र समझी जाने वाली धारणाओं के बारे में एक गहरा संशय पैदा करती है।

फ़िल्म में 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि है, जिसके नतीज़े में स्वतंत्र बांग्लादेश का उदय हुआ। मगर असली युद्ध नायिका के दिलोदिमाग़ में चलता है। इस भीतरी युद्ध को दिखाने के लिए बाहरी घटनाएं बहुत कम हैं। या शायद जानबूझकर बाहरी घटनाओं का सहारा नहीं लिया गया है। बाहर से भीतर को ठीक ठीक कैसे दिखाया जा सकता है?

इस नाज़ुक अंतः संघर्ष को केवल अभिनय के जरिए दिखाना है। केवल चेहरे से, भावभंगिमाओं से, चोरी छुपे बहाए गए चंद आंसुओं से।

आलिया भट्ट इस कठिन परीक्षा में सौ टंच खरी उतरी हैं। अगर वे कहीं भी नाकाम होतीं तो दर्शकों की सबसे मजबूत पूर्व मान्यताओं को झकझोरने के फ़िराक़ में यह फ़िल्म औंधें मुंह गिर पड़ती। लेकिन बाकी कलाकारों ने भी इस चुनौती में आलिया का भरपूर साथ दिया है।

राष्ट्रवादी उन्माद के इस दौर में अगर ऐसी कोई फ़िल्म लोकप्रिय होती है तो कहना चाहिए कि फ़िल्म की निर्देशक और कलाकारों को तलवार की धार पर चलकर सफलता मिली है।

सहमत एक कॉलेजिया लड़की है, जिसके पिता हिदायत खान (रजित कपूर) भारतीय जासूस हैं। उन्होंने जासूसी के मकसद से पाकिस्तान के फौज़ी अफ़सर ब्रिगेडियर सईद से दोस्ती गांठ रखी है। उन्हें ट्यूमर है। मौत क़रीब है। लेकिन देशभक्ति के जज्बे के कारण वे अपने काम को जारी रखने और आगे बढ़ाने का जिम्मा अपनी बेटी को सौंपना चाहते हैं।

पिता के जज्बे से प्रभावित युवा बेटी राजी हो जाती है। लेकिन प्रतिबद्ध पिता बेटी का आखिरी इम्तहान लेता है। पिता का भावनात्मक कार्ड खेलता हुआ कहता है कि वह कमजोर पड़ रहा है। अपनी बेटी को ऐसे ख़तरे में नहीं डाल सकता। ऐसा फैसला लेना उसकी गलती थी।

इस पर बेटी कहती है कि फिर तो सेना के लिए अपने बच्चों को भेजने वाले सभी लोग ग़लती पर हैं! ऐसा कहने से पिता आश्वस्त हो जाते हैं कि बेटी उनकी ही तरह सैनिक सेवा को सबसे महान सेवा के रूप में स्वीकार कर चुकी है। एक ऐसा दायित्व मान चुकी है जिसके लिए कोई भी कुर्बानी दी जा सकती है।

इस महान दायित्व के लिए ब्रिगेडियर सईद के बेटे इक़बाल सईद से उसकी शादी करा दी जाती है। वह प्रशिक्षण लेकर दुश्मन देश में प्रवेश करती है। बहू बनकर।

अब दुश्मन देश राजनीतिक रूप से दुश्मन देश तो है, लेकिन वहां के लोग बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे अपने देश के लोग हैं। यहां दर्शक के मन में बैठी पाकिस्तान की शैतानी छवि टूटने लगती है।

पाकिस्तानी फौज़ी भी देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की उसी भावना से प्रेरित हैं, जैसे भारतीय सैनिक। पाकिस्तान का घर परिवार , नाते रिश्ते, इंसानी व्यवहार और गली बाज़ार वैसे ही हैं, जैसे भारत में होते हैं। इस सब का मतलब यह होता है कि अब सहमत को अपना काम केवल कर्तव्य भावना से पूरा करना है।इस भावना में जान डालने वाली नफ़रत की आग अब नहीं है।

इस सब के बीच कॉलेज दिनों में एक गिलहरी को बचाने के लिए अपनी जान जोख़िम में डालने लड़की एक कुशल वधिक में बदल जाती है। अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाने की कोशिश में इसके सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं रह जाता।

एक सच्चे नागरिक की भूमिका का निर्वाह उसे अपनी ही मनुष्यता के विरुद्ध जाता हुआ लगता है। कहीं न कहीं यह सवाल पैदा होता है कि अगर मनुष्य अपनी मनुष्यता को ही न बचा सके तो किसी भी चीज का क्या अर्थ है। उस देशभक्ति की सार्थकता क्या है जो मानुष को अमानुष बनने के लिए बाध्य करती है।

मेघना ने ‘तलवार’ में एक सिनेमाई प्रयोग किया था कि हिंदी फिल्मों के भावुक दर्शक को कैसे किसी ऐसी बात पर ध्यान देना सिखाया जाए जो कॉमन सेंस के ख़िलाफ़ जाती हो, कैसे उसे अपने मजबूत पूर्वग्रहों पर दुबारा सोचने के लिए मनाया जाए.

अगर एक ही कहानी के तीन रूप हों और हर रूप को इस तरह पेश किया जाए कि किसी का पलड़ा भारी न लगे तो दर्शक इस बात को समझना सीखता है कि एक ही घटनाक्रम के कई विवरण हो सकते हैं, जो अलग अलग लोगों को एक ही तरह से प्रामाणिक लग सकते हैं।

वह समझता है कि कहानी की किसी भी प्रस्तुति को डिकोड करने के लिए सुनाने वाले के पूर्वग्रहों पर ध्यान देना और उन्हें डिकोड करना जरूरी है।

तलवार फ़िल्म में एक इशारा यह भी था कि दर्शक के भी अपने पूर्वग्रह होते हैं।इन पूर्वग्रहों का सीधा सम्बंध नैतिक मान्यताओं औऱ मूल्य निर्णयों से होता है। यानी इस बात से कि समाज किसे सही और किसे ग़लत समझता है। और इस सब के पीछे एक डर होता है। समाज के बिगड़ जाने का डर।

आम जनमानस ने कैसे इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार कर लिया कि तलवार दम्पति ही अपनी बेटी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार होंगे?

जनमानस में पहले से यह ख़याल था कि आजकल की लड़कियां ‘बिगड़ गई हैं’। माँ बाप युवा लड़कियों को संस्कार नहीं दे पा रहे क्योंकि वे ख़ुद बिगड़े हुए है। ऐसे में घर की इज़्ज़त बचाने के लिए कोई शहरी मध्यवर्गीय परिवार भी ‘ऑनर किलिंग’ की घटना को अंजाम दे सकता है।

लड़कियों के बिगड़ने का नैतिक डर अगर समाज के मन में गहरे धंसा न होता तो आरुषी की त्रासद कथा इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय सनसनी न बनी रह पाती।

तलवार फ़िल्म की सफलता पूर्वग्रह के इस खेल को उघाड़ने में थी, न कि यह पता लगाने में कि आरुषि मामले में वास्तव में क्या हुआ था!

राज़ी फ़िल्म में मेघना पूर्वग्रहों के एक दूसरे संसार में प्रवेश करती हैं। इस संसार की धुरी देशभक्ति है। इस संसार का नियम है -देशहित सर्वोच्च है। इसी का अधिक प्रचलित रूप देश सबसे पहले या नेशन फर्स्ट है।

राज़ी में मेघना एक क़दम आगे जाती हैं। वे सीधे उन धारणाओं को चुनौती देती हैं, जिनसे पूर्वग्रहों का निर्माण होता है। जैसे यह कि एक देशभक्त के लिए देशहित सर्वोपरि होना चाहिए। और यह कि देशभक्ति से बड़ा कोई धर्म नहीं है।

देश के सर्वोपरि होने का क्या मतलब है? क्या देश के लिए झूठ बोलना, धोखा देना या किसी निर्दोष की हत्या करना भी जायज है? क्या देश के लिए अपनी ही मनुष्यता का गला घोंट देना भी जायज है?

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है।

इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

अगर एक बार इस डर को दरकिनार कर सोचा जा सके तो इंसान इंसान होने की खूबसूरती और प्यार को जीने लायक बन सकता है।
फ़िल्म का अंत भले ही आलिया के भीषण अवसाद से होता हो, लेकिन इस अवसाद में ही उम्मीद की यह किरण छुपी हुई दिखती है।

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समकालीन जनमत

1 comment

Ankit May 17, 2018 at 1:17 am

राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में इस फ़िल्म ने भारत और पाकिस्तान के दरमियान दशकों से बनी हुई नफरत, अविश्वास और शक की दीवार मे एक रदा और लगाया है, बाकी कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उल्लेखनीय है,
मेघना गुलज़ार की कोशिश वही पर आकर कमजोर पड़ जाती है जब फ़िल्म उसी मोड़ पर खत्म होती है जहां पर इस विषय पर बनी दसियों फिल्में खत्म हुई हैं, ,

श्रीमान , आपको बहुत कुछ नजर आया इस फ़िल्म में, लेकिन मेरा व्यक्तिगत मानना है कि यह फ़िल्म सिने अध्येताओं के लिए
कोई ‘पाठ’ बनने नहीं जा रही, क्योंकि इतनी कूबत फ़िल्म में है नहीं,
एक अदना दर्शक

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