जेरे बहस

‘रा’ से राम, ‘रा’ से राफेल

आर एस एस न राम को छोड़ रहा है और न कांग्रेस राफेल को। दोनों ‘राम’ और ‘राफेल’ को कस कर पकड़े हुए है। अगले वर्ष लोकसभा का चुनाव है जिसमें राम सबसे बड़े हथियार हैं। राफेल तो है ही।

राम मन्दिर दीवानी मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लम्बित है। 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने सुनवाई का समय बढ़ा दिया है और जनवरी 2019 में इसके लिए बेंच बनाने की बात कही है जो सुनवाई की तिथि तय करेगी। इसके पहले 18 अक्टूबर को अपनी वार्षिक दशहरा रैली में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट और आर एस एस में अन्तर है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भारत का संविधान है। आर एस एस हिन्दुत्ववादी संगठन है। उसके लिए धर्म और आस्था प्रमुख है। सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता में धर्म और आस्था नहीं है। होना भी नहीं चाहिए। यह अपेक्षा करना भी गलत है क्योंकि कोई आस्था, भावना से नहीं चलता। देश संविधान से चलेगा या आर एस एस के आदेश से। न्याय का कोई संबंध आस्था से नहीं है।
आर एस एस, विहिप, भाजपा सबके लिए राम प्रमुख हैं। अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण उनके लिए जरूरी है क्योंकि वहां राम लला का जन्म हुआ था।

कोर्ट का सम्मान 1992 से ही कम किया जाने लगा था जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को दिये अपने आश्वासन का पालन नहीं किया था। उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और केन्द्र में कांग्रेस की। इस समय दोनों जगह भाजपा है। एक केन्द्रीय मंत्री ने राम मन्दिर निर्माण में राम भक्तों के सब्र टूटने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट को कुछ लोगों ने मन्दिर विरोधी भी कहा। उसे शीघ्र निर्णय लेने को कहा जा रहा है। संघ के कार्यवाहक भैया जी जोशी ने यह कहा है कि ‘न्यायालय हिन्दू समाज की भावनाओं को समझ कर न्याय देगा, ऐसा हमारा विश्वास है।’

न्यायलय पर क्या यह परोक्ष दबाव नहीं है ? आर एस एस की प्राथमिकता में संविधान नहीं ‘हिन्दुत्व’ है। न्यायालय की प्राथमिकता में संविधान है, ‘हिन्दुत्व’ नहीं। ऐसी स्थिति में यह समझा जा सकता है कि न्यायालय के प्रति आर एस एस और हिन्दुत्ववादियों का क्या रुख होगा ? राम मन्दिर निर्माण को लेकर अब कानून बनाने, अध्यादेश लाने की बातें की जा रही हैं। आर एस एस के संयुक्त महासचिव मनमोहन वैद्य राम मन्दिर निर्माण को ‘राष्ट्रीय गौरव का विषय’ मानते हैं। उनके अनुसार अदालतों में अभी तक अयोध्या विवाद का कोई हल नहीं निकला है। भैया जी जोशी ने हिन्दू समाज के अपमानित महसूस करने की बात कही क्योंकि करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े विषय को सप्रीम केार्ट ने महत्व नहीं दिया। क्या ऐसा कथन हिन्दू समाज को एक प्रकार से उद्वेलित-उत्तेजित करने के लिए नहीं है ? इस कथन का क्या अर्थ और औचित्य है कि 1992 की तरह फिर से आन्दोलन किया जाएगा।

6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी थी। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद भाजपा को काफी राजनीतिक लाभ मिला था। इस बार भी उसका सारा ध्यान राजनीतिक लाभ पर है, अगले लोकसभा चुनाव पर है। अभी तक मस्जिद ढाहने वालों को कोई सजा नहीं मिली है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस की जांच के लिए 16 दिसमबर 1992 को गृहमंत्रालय ने एक जांच आयोग का गठन किया था। इस जांच आयोग के अध्यक्ष एम एस लिब्राहन  बनाये गये थे जो आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के सेवा निवृत मुख्य न्यायाधीश थे। इस आयोग को बाबरी मस्जिद ढहाने और उसके बाद फैले दंगों की जांच करना था। तीन महने के भीतर आयोग को रिपोर्ट पेश करनी थी, पर इसका कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया। लगभग 18 वर्ष बाद 30 जून 2009 को जांच रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी गयी।

आयोग को कुल पांच बिन्दुओं की जांच करनी थी – ‘रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद के विवादित परिसर में घटी प्रमुख घटनाओं का अनुक्रम और इससे संबंधित सभी तथ्य और परिस्थितियां, विध्वंस के संबंध में मुख्यमंत्री, मंत्री-परिषद के सदस्य, सरकारी अधिकारी, गैरसरकारी व्यक्ति, संबंधित संगठन और एजेंसियों की भूमिका, सुरक्षा उपाय और सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमियां, तथा अन्य मामले।’

24 नवम्बर 2009 को संसद में 1029 पृष्ठों की यह रिपोर्ट रखी गयी थी। उस समय केन्द्र में संप्रग, संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार थी। पांच भागों की यह रिपोर्ट 399 सुनवाई, 48 विस्तार और सौ से ज्यादा गवाह की थी। आठ करोड़ रुपये इस पर खर्च किये गये थे, और इस सबसे लम्बी अवधिवाला जांच आयोग कहा गया था। उस समय आर एस एस के प्रवक्ता राम माधव ने यह कहा था कि बाबरी मस्जिद ध्वंस ‘पूर्ववर्ती सरकारों की असफलता का सामूहिक परिणाम’ है और विध्वंस के लिए ‘नेताओं को जिम्मेदार ठहराना’ ‘राजनीतिक षडयंत्र’ होगा।

लिब्राहन जांच आयोग ने बाबरी मस्जिद ध्वंस को न तो अनायास माना था और न अनियोजित। इस रिपोर्ट में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को ‘सूडो माॅडरेट्स’ कहा गया था और मस्जिद विध्वंस में उनकी भूमिका के कारण उन्हें दोषी ठहराया गया था। अडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती पर आपराधिक प्रकरण के तहत आरोप-पत्र दाखिल किया गया था। चार खंडों की इस रिपोर्ट में संघ परिवार को दोषी माना गया था। अटल बिहारी वाजपेयी पर भी आरोप था। रिपोर्ट में यह कहा गया कि इन नेताओं ने जनता के विश्वास की उपेक्षा की और उन्होंने एक ‘ग्रूप’ को मस्जिद-ध्वंस की अनुमति दी। जांच आयोग ने एक लोकतंत्र में इस मस्जिद ध्वंस को अपराध और विश्वासघात कहा। लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में आर एस एस, विहिप, शिवसेना, बजरंग दल सबका जिक्र है।

लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का क्या हुआ ? मस्जिद विध्वंस में जिनकी भूमिका थी, वे आज कहीं अधिक शक्तिशाली हैं और उन्हें देश का सबसे बड़ा और जरूरी काम राम मन्दिर निर्माण लग रहा है। अभी 2 नवम्बर को अपनी एक टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने विधायी प्रक्रिया द्वारा उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में अवरोध पैदा किये जाने के पहले के कुछ उदाहरणों की बात कही है। उनके अनुसार कानून का बनना संभव है। विधायी प्रक्रिया द्वारा अदालत का निर्णय बदला जा सकता है।

अगले लोकसभा चुनाव के पहले राम मंदिर निर्माण के श्रीगणेश की पूरी संभावना है। इस वर्ष 6 दिसम्बर को अयोध्या में किसी बड़े कार्यक्रम की भी संभावना है। अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ है। दीपावली के अवसर पर उन्होंने अयोध्या में ‘दीपोत्सव’ आयोजित किया। फैजाबाद नाम बदल कर अयोध्या किया गया। अयोध्या को ‘आन बान शान का प्रतीक’ माना गया और योगी आदित्यनाथ ने यह कहा ‘कोई अयोध्या के साथ अन्याय नहीं कर सकता।’ अयोध्या की पहचान राम से है। वहां के हवाई अड्डे का नाम श्रीराम के नाम पर करने की भी घोषणा की गयी है। 3 नवम्बर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अखिल भारतीय संत समिति द्वारा आयोजित द्विदिवसीय धर्मादेश संत महासम्मेलन में अयोध्या में यथाशीघ्र राम मंदिर निर्माण का आरम्भ करने का आहवान किया गया। इस संत समिति ने अदालत और सरकार दोनों को इस संबंध में जल्द फैसला लेने की भी बात कही है, इस चेतावनी के साथ कि ऐसा न होने पर संत समाज स्वयं मंदिर निर्माण आरम्भ करेगा। माहौल बनाया जा रहा है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह, योग गुरू रामदेव सब मन्दिर निर्माण के पक्ष में है। अदालत की सुनवाई और उसके निर्णय के लिए सबमें धैर्य की कमी है।

लगभग सभी मोर्चे पर असफल हो जाने के बाद भाजपा अगला चुनाव राम के नाम पर, मन्दिर निर्माण पर लड़ सकती है। राम और राम मन्दिर अब ब्रहमास्त्र हैं। क्या इसकी काट राफेल कर सकेगा ? राफेल को लेकर मोदी सरकार घिर चुकी है। बोफोर्स का मुद्दा भ्रष्टाचार का था। राफेल का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार राफेल के मुद्दे को सामने ला रहे हैं, पर जिसे विपक्षी दल कहते हैं, वह एकजुट होकर इस मुद्दे को नहीं उठा रहा है। तीस वर्ष में बहुत कुछ बदल चुका है। भारतीय राजनीति की सही शक्ल-सूरत सब के सामने है। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशान्त भूषण ने रफाल मुद्दे को लेकर सी बी आई के निदेशक वर्मा से भेंट की थी जो सरकार को नागवार लगी।

राहुल गांधी राफेल को लेकर लगातार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमले कर रहे हैं। वे इसे ‘दलाली का केस’ कह रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि रफाल सौदे में शीर्ष स्तर पर घपलेबाजी हुई है। अब राफेल विमान निर्माता कम्पनी ‘द साल्ट’ के सी ई ओ एरिक टैपियर पर सच को छुपाने का आरोप है। राहुल गांधी को विश्वास है कि जांच होने पर पी एम मोदी नहीं बचेंगे। उनका आरोप है कि सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को जांच के डर से अवकाश पर भेजा गया है। भाजपा का, हिन्दुत्ववादी-शक्तियों का फिलहाल एक सूत्री कार्य राम मन्दिर निर्माण है और कांग्रेस का रफाल। कांग्रेस का नया आरोप यह है कि घाटे में चलने वाली अनिल अम्बानी की एक कम्पनी को द साॅल्ट ने 284 करोड़ रुपये दिये जिससे अनिल अम्बानी ने जमीन खरीदी। कांग्रेस के इस आरोप को रिलांयस झूठ कह रही है। रफाॅल अब सुप्रीम कोर्ट में है।

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने राफाॅल डील की निर्णय प्रक्रिया के बारे में 29 अक्टूबर को 36 राफाल फाइटर जेट की कीमत का विस्तृत ब्यौरा दस दिनों के भीतर एक सीलबंद लिफाफे में देने को कहा है। महान्यायवादी (अटर्नी जनरल) के यह कहने पर कि यह संसद में भी नहीं दी गयी थी और देने पर असमर्थता प्रकट करने पर सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामा देने को कहा है।

रफाल में अब रहस्य जैसा कुछ भी नहीं है। ‘डीफेन्स सेक्रेट’ में कुछ भी छुपा नहीं होता। जनता को उसकी जानकारी भले न दी जाय। रफाल एक बड़ा मुद्दा है। वह अब एक राजनीतिक हथियार भी है। क्या रफाल के सहारे मोदी और भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है ? संभव नहीं लगता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को लेकर पिछले कुछ महीनों में जैसे बयान आये हैं उन्हें नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता।

राकांपा ने कहा है कि राम मन्दिर मसले पर आर एस एस सुप्रीम कोर्ट को धमका रहा है, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है। लोकतंत्र और संविधान की चिन्ता किसे है ? सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि दीपावली की रात में दस बजे के बाद पटाखे नहीं छोड़े जायेंगे। पटाखे खूब छोड़े गये। क्या राज्य की सरकारों ने पटाखा छोड़ने वालों के विरुद्ध कोई कार्रवाई की ? सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमल मन्दिर में दस से पचास साल की औरतों के प्रवेश पर लगी रोक को ‘समानता के अधिकार के खिलाफ’ मानकर इसे समाप्त किया जिसका विरोध हो रहा है। केरल की सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया। पर भाजपा अध्यक्ष वहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान नहीं कर रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अयप्पा के भक्तों के साथ हैं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ नहीं। क्या केरल के मुख्यमंत्री विजयन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन ‘कुचक्र’ है ? भाजपा अध्यक्ष ने केरल के मुख्यमंत्री को यह चेतावनी दी है ‘यदि आपने यह कुचक्र बन्द नहीं किया तो भाजपा के कार्यकर्ता आपकी सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे’।

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