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एक तरफ ‘ स्वच्छ भारत ‘ का ढोंग दूसरी तरफ हर 3 दिन में एक सफाईकर्मी की मौत

तस्वीर एनडी टीवी से साभार

उर्मिला चौहान

पूरे देश मे सफाई कर्मचारियों की हालत दिन पर दिन और खराब होती जा रही है। विडम्बना तो ये है कि 2014 में जब मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की घोषणा की तब से अब तक सैकड़ों मजदूर सीवरों और गटर की भेंट चढ़ चुके हैं। ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ द्वारा किये गये सर्वे के अनुसार, हर तीसरे दिन पर एक मजदूर की मौत होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले 2017 में 300 सफाई कर्मचारियों की जाने गयी। पिछले सितंबर-अक्टूबर में दिल्ली शहर के ही सीवर के अंदर सात मजदूर मारे गये। मोदीजी चाहे जितना जुमला बाज़ी कर लें पर सच्चाई तो यही है कि मरने वाले इन मजदूरों के परिवारों को न ही कोई न्याय मिला न ही उचित मुआवजा।

जेएनयू ऑल इंडिया जनरल कामगार यूनियन (ऐक्टू) द्वारा चलाये लंबे आंदोलन के बाद दिसंबर 2014 में हमने इस मामले में एक बड़ी जीत हासिल की थी और जेएनयू प्रशासन को मजबूर किया कि वो ये सर्कुलर लाये कि जेएनयू कैंपस में कोई मजदूर सीवर के अंदर नहीं घुसेगा। पर पूरे देश में अभी भी ये अमानवीय काम जारी है, इसके खिलाफ एकजुट होने की ज़रूरत है।

एक तरफ मोदीजी ‘स्वच्छ भारत का जुमला फेंक रहे हैं, दूसरी तरफ दलितों के साथ जातीय हिंसा जारी है। मोदी राज के ‘स्वच्छ भारत’ में सफाई कर्मियों के लिए कोई जगह नहीं है। हर दिन जातिय हिंसा जारी है और ये सब खुले आम चल रहा है। ज्यादातर संस्थानों में काम के दौरान न ही मास्क, बूट, सेफ्टी किट दी जाती है और न ही समान काम का समान वेतन मिलता है। ठेका प्रथा की सबसे ज्यादा मार आज सफाई कर्मचारी झेल रहे हैं।

 हाथ से मैला उठाने पर रोक लगाने, जाति आधारित भेदभाव व हिंसा खत्म करने,  समान काम का समान वेतन लागू करने, सफाईकर्मियों के अधिकार और सम्मान की गारंटी करने की मांग के साथ 16 नवंबर को सुबह 11 बजे से जंतर – मंतर पर आयोजित राष्ट्रीय कन्वेंशन में देश भर से सफाई कर्मचारी इकट्ठा हो रहे हैं।

(उर्मिला चौहान आल इंडिया जनरल कामगार यूनियन, जेएनयू यूनिट ,ऐक्टू की अध्यक्ष हैं )

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