प्रेमचंद किसान जीवन की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार धरम, महाजन और साहूकार की भूमिका की शिनाख्त करते हैं

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31 जुलाई 2018 को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय , बैकुंठपुर(छत्तीसगढ़) में ‘प्रेमचंद और हमारा समय’ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गई |

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. पीयूष कुमार ने कहा कि किसानों की जिस स्थिति को प्रेमचंद ने आज से बहुत साल पहले अपने कथा साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया था, वह आज भी बदली नहीं है बल्कि और ज्यादा भयावह हुई है | उदारीकरण ने लूट का जो तंत्र खड़ा किया है उसने अनंत जीवटता वाले किसानों को अत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया है | शोषण का स्वरूप और शोषण करने वाले लोग बदल गए, यदि कुछ नहीं बदला है तो वह किसान का जीवन | किसान के मजदूर बनने की प्रक्रिया आज भी निरंतर जारी है, अपनी जमापूंजी लगा देने के बाद भी पूरे देश के लिए अनाज पैदा करने वाला किसान आज भूखों मर रहा है | लेकिन यह सब बातें हमारी खबरों का अंश नहीं होती | खबरों के केंद्र कुछ खास विषयों तक सीमित हो गए हैं, देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि किसान के आत्महत्या करने वाली खबर हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं होती |

अपने वक्तव्य में आगे उन्होने कहा कि प्रेमचंद का सम्पूर्ण कथा साहित्य और उनके पात्र हमें आज भी कई समस्याओं के हल सुझा जाते हैं | उनके पात्र हमें सत्य और न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा प्रदान करते हैं | देश में फैले सांप्रदायिक वातावरण पर बात करते उन्होंने प्रेमचंद के मशहूर कथन ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है’ को उद्धृत किया| साथ ही उन्होंने नारी सशक्तिकरण , राष्ट्रीय चेतना और समाज में नैतिकता के बिन्दुओं पर सौ साल पहले प्रेमचंद के लिखे और वर्तमान परिस्थितियों पर विस्तृत चर्चा की |

दूसरे वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. विनय शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियाँ हमें घरेलू सी लगती हैं | आज भी हम उनकी कहानियों के पात्रों को अपने आस-पास उसी तरह का जीवन जीते देख सकते हैं |

डॉ. दीपक सिंह ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि प्रेमचंद का सम्पूर्ण कथा साहित्य एक विकास यात्रा है, किसान के मजदूर बनने की प्रक्रिया और मजदूर बनने के बाद के जीवन की जो समस्याएँ है ,बहुत बारीकी से उसका चित्रण हम प्रेमचंद के कथासाहित्य में देख सकते हैं | किसान के शोषण के यंत्र के रूप में प्रेमचंद धरम, महाजन और जमींदार की शिनाख्त स्पष्ट रूप में करते हैं गोदान इसका जीवंत दस्तावेज़ है | यदि हम प्रेमचंद की कहानियों सवा सेर गेहूं, पूस की रात और कफन का एक क्रम बनाएं तो हमें न सिर्फ शोषण बल्कि मनुष्य के अपने परिवेश से कटकर अमानवीय होते जाने की सपष्ट प्रक्रिया दिखाई पड़ती है | शंकर को कर्ज में फसाने से लेकर हलकू के किसानी के झंझट से तंग आकर मजदूर बनकर मुक्ति पाने का स्वप्न और फिर मजदूर जीवन की अमानवीयता… जिसकी परिणति कफन के घीसू माधव के रूप में होती है | कहानी में घीसू माधव बहुत आलसी हैं लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत करने वालों की स्थिति भी उनसे कुछ बेहतर नहीं है मतलब उनका आलसीपन चरम निराशा और हताशा की परिणति है ऐसे में उनके पास जीवन काट देने का चारा क्या बचता है ? आज की भी स्थिति इससे कुछ बेहतर नहीं है | प्रेमचंद की कहानी बूढ़ी काकी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज परिवार की सीमा पति,पत्नी और बच्चे तक सीमित होकर रह गई है | जैसे ही ये बच्चे बड़े होते हैं और उनकी शादी होती है माता –पिता परिवार के दायरे से बाहर हो जाते हैं | पूंजीवाद इस कदर हमारी संवेदना को नष्ट कर रहा है कि हम अपने माँ-बाप के प्रति भी अमानवीयता की हद तक व्यवहार करते हैं | बूढ़ी काकी के पास तो एक छोटी बच्ची थी या उसकी बहू को पाप जैसा कुछ एहसास भी होता है लेकिन पूंजीवाद ने तो उस दिखावे के पाप बोध को भी नष्ट कर दिया है | यह बात व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तर पर घटित हो रही है आज जबकि गाय के नाम पर हत्याएं की जा रही हैं प्रेमचंद को हम इस रूप में भी याद कर सकते हैं कि एक गरीब व्यक्ति के लिए पूरे जीवनभर में एक गाय का जुगाड़ कर पाना टेढ़ी खीर है | होरी जीवन भर गाय की लालसा में रहता है , किसान से मजदूर बनता है और मर जाता है लेकिन गोदान करने के लिए उसके पास कोई गाय नहीं जुड़ती | इससे हम उस व्यक्ति और उसके परिवार वालों की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं जो किसी तरह एक गाय पालता है लेकिन धर्म के नाम पर उस व्यक्ति की हत्या कर दी जाती है लेकिन शर्मिंदा होने की जगह समाज हत्यारों का उल्लास मंच बन जाता है |

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य श्रीमती अनुराधा पॉल ने की तथा संचालन डॉ कामिनी ने व धन्यवाद ज्ञापन डॉ रंजना नीलिमा कच्छप ने किया | पूरे कार्यक्रम के दौरान डॉ मनीषा सक्सेना, के.जेड. उस्मानी, महेंद्र कुर्रे व बड़ी संख्या में महाविद्यालय की छात्राएँ उपस्थित रहीं | छात्राओं ने वक्ताओं से सवाल जवाब भी किए |

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