प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था : प्रो. रविभूषण


इलाहाबाद में प्रेमचंद जयंती पर ‘ प्रेमचंद के सपने और आज का यथार्थ ’ पर संगोष्ठी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में जसम, जलेस और प्रलेस द्वारा प्रेमचन्द के जन्म दिवस 31जुलाई के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी में शहर के तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यप्रेमी और छात्र उपस्थित रहे.

संगोष्ठी में आरम्भिक वक्तव्य देते हुए आशुतोष पार्थेश्वर ने कहा कि वर्तमान समय में सत्ता के द्वारा न केवल संपदा पर अपितु इतिहास का भी अतिक्रमण किया जा रहा है. इसके द्वारा सत्ता वर्ग इतिहास के जननायकों को भी हथियाने की कोशिश कर रहा है और अपनी इस कोशिश में वह भारतीय इतिहास के आम जनता के नायकों का विरुपिकरण भी कर रहा है.

विचार-विमर्श की इस श्रृंखला को आगे बढ़ते हुए इलाहाबाद हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि प्रेमचन्द ने जिस तरह का सपना देखा, आज उसके उलट सपने देखने वाले कम हो गए और सपने दिखाने वाले अधिक.

प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि सेवासदन में प्रेमचंद ने महिलाओं की समस्याओं के पीछे के आर्थिक नज़रिए का उल्लेख किया है. प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि प्रेमचन्द के उपन्यास सेवासदन की सौंवी वर्षगाठ भी है और महिलाओं की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में प्रेमचन्द के विचार आज भी प्रासांगिक हैं.

उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक अली अहमद फातमी ने फैज़ की नज़्म सुबहे आज़ादी की पंक्ति- चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई- से अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि उस मंजिल को हासिल करना होगा जिस मंजिल का सपना प्रेमचन्द के साथ फैज़ अहमद फैज़ ने देखा था. उन्होंने कहा कि हमें सपने देखना चाहिए जैसे प्रेमचंद और फैज़ देखा करते थे जिस तरह सभी बड़े लेखक भविष्य की, समाज की बेहतरी का सपना देखते हैं.

विचार की श्रृंखला को और आगे ले जाते हुए आलोचक प्रो. रविभूषण ने प्रेमचंद की राजनीतिक टिप्पणियों का हवाले से कई बातें सामने रखीं. उन्होंने प्रेमचंद की दूरदृष्टि की चर्चा करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने आज से काफी पहले ही आवारा पूंजी के ग्लोबल चरित्र और उसके साम्राज्यवादी गठजोड़ की शिनाख्त कर ली थी . प्रेमचंद ने अपने लेखन से उस समय के नैरेटिव को बदला.

प्रो. रविभूषण ने आगे कहा कि प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था.

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रविभूषण ने किया. संचालन के.के. पाण्डेय ने किया. धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ कवि हरिशचंद पांडे ने किया. कार्यक्रम में रामजी राय, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. संतोष भदौरिया, डॉ. कमल, संध्या नवोदिता, राजन विरूप, मीना राय, डॉ. सूर्य नारायण. डॉ. मुदिता, विष्णु प्रभाकर, सुधा, अमृता, जसम इलाहाबाद इकाई के संयोजक डॉ. अंशुमान कुशवाह आदि उपस्थित रहे.


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