प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ : विह्वल करने से ज़्यादा विचार-विकल करती हैं

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( प्रदीप की ये कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगा, जैसे कविता का कोई कैलिडोस्कोप मेरे हाथ लग गया है. ऐसा कैलिडोस्कोप, जिसमें झाँकते ही आँखों का सामना ऐसे ऐसे दृश्यों से हो रहा है, जो अन्यथा ओझल रह जाते हैं. कभी देखा है, नदी को ‘भिखारिन’ बनने को बेकल? कभी देखा है, नदी को स्त्री के दुःख की तरह बहते? कभी गौर किया है, बारिश में भीगती कोई स्त्री, बारिश में भीगते पेड़, पहाड़ और पुरुष से कितनी अलग दिखती है ! पुरुष की लोलुप निगाह में मात्र देह!
यह सब नहीं देखा है तो कविता के इस कैलिडोस्कोप से देखिये. तब आप देख पायेंगें, नदी ने चुना है ‘भिखारिन’ होना, ख़ुद कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि उन ग़रीब बच्चों की ख़ुशी के लिए जो उसके पानी में सिक्के ढूँढने के लिए डुबकियाँ लगा रहे होते हैं.

नदी होना जल-संपन्न होना ही नहीं होता. संपन्न हों तो भी एक अर्थ में विपन्न स्त्री होने से नदी भी कब बच पाई है? नदी होना अपने उद्गम स्थल से आगे ही आगे प्रवाहित होना होता है. लेकिन स्त्रियों की इस नियति को झेलने को तो नदियाँ भी अभिशप्त हैं कि घर हमेशा-हमेशा के लिए छूट जाता है.

नदी समुद्र में जाकर गिरती है, यह तो सब जानते हैं. लेकिन यह सच्चाई तो प्रदीप की कविता को पता है कि नदी अपना दुःख दूसरी नदियों को सुनाने जाती है. क्योंकि स्त्री का दुःख स्त्री ही समझ सकती है. नदी जानती है कि समुद्र में उसका अस्तित्व खो जायेगा. इसलिए अपने होने का अर्थ एक नदी को दूसरी नदी ही बता सकती है.
लोकतंत्र के नाम पर जिस तंत्र का त्रास हमारे जन-सामान्य को झेलना पड़ रहा है, प्रदीप की निगाह उस पर भी रहती है. करुणा और व्यंग्य के मेल से ऐसी कविताएँ विह्वल करने से ज्यादा विचार-विकल करती हैं –प्रो. राजेन्द्र कुमार )

 

प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ –

 

नदी -1

पुल के नीचे बहती हुई नदी
किसी भिखारिन सी हाथ फैलाये
हर आने जाने वाले यात्रियों से मांगती है
कुछ सिक्के
अपने लिए वह कुछ नहीं मांगती
वह मांगती है उन बच्चों के लिए
जो चुम्बक लटकाये
दिन भर नदी में ढूंढते हैं सिक्के
बच्चों की खुशी के लिए
नदी ने भिखारिन होना चुना है।

नदी-2

नदियाँ कभी नहीं
लौट पाती
अपने-अपने उदगम स्थलों पर
स्त्रियाँ भी कहाँ लौट पाती हैं
अपने-अपने घरों को ।

नदी- 3
मै चाहता हूँ
हमारे बीच न हो
कोई पुल
मैं चाहता हूँ
हमारे बीच
बहती रहे इक नदी

नदी–4

नदियाँ समुद्र से मिलने नहीं
वरन दूसरी नदियों को
सुनाने जाती हैं अपना दुख
पुरुष भला कहाँ सुनते हैं
स्त्रियों के दुख ।

स्त्री देह

बारिश में भीगते पेड़
सिर्फ पेड़ होते हैं
बारिश में भीगते मकान
सिर्फ मकान होते हैं
बारिश में भीगते पुरुष
सिर्फ पुरुष होते हैं
बारिश में जो भी भीग रहे होते हैं
वे वही होते हैं जो हैं
सिवाय स्त्रियों के
बारिश में भीगती स्त्रियाँ
सिर्फ देह होती हैं।

संसद

भूख और रोटी के बीच
जो खाई है
उस पर संसद ने पुल बना दिया है
पुल के ठीक बीचोबीच
एक बाघ खड़ा कर दिया है
बाघ भूखों को चबा रहा है
संसद रोटी खा रही है
जनता जुमले पगुरा रही है।

माहौल

उसने हत्या का नया तरीका ईजाद किया है
अब वह सीधे-सीधे
हत्या का आदेश नहीं देता
अब वह रोजी-रोटी नहीं देता
अब वह लिखने-पढ़ने नहीं देता
अब वह हँसने नहीं देता
अब वह बोलने नहीं देता
अब वह हत्या का माहौल देता है।

लौटना

सुनो राजा!
जब तुम लौटना
इस बार युद्ध के मैदान से
चाहे जीतकर लौटना
या लौटना हार कर
पर युद्ध लेकर न लौटना
जब इस बार लौटना तो
गोला बारूद लेकर नहीं
शांति लेकर लौटना
जब इस बार लौटना तो
महमूद गजनवी या तैमूर की तरह नहीं
तुम लौटना
जैसे अशोक लौटा था कंलिग से
तुम युद्ध लेकर नहीं
बुद्ध होकर लौटना ।

हाथ

जो लोग सौंप देना चाहते थे
यह दुनिया औरतों के हाथ में
ताकि वह खूबसूरत हो सके
आने वाली पीढियों के लिए
उन्हीं लोगों के हाथ शामिल थे
उन औरतों के हाथ काटने में ।

 

राजा का नाच

सिंहासन पर जब बैठा राजा
मंत्री लगे बजाने बाजा
प्रजा नाची
राजा नाचा
फिर और जोर से बाजा, बाजा
प्रजा बेसुध होकर नाची
सारी प्रजा बेहोश हो गयी
राजा उनकी छाती पर नाचा
बाजा अब भी बाज रहा है
राजा अब भी नाच रहा है
प्रजा अब भी बेहोश पड़ी है ।

(कवि प्रदीप कुमार सिंह, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, कप्तानगंज में प्राध्यापक हैं.
टिप्पणीकार प्रो. राजेन्द्र कुमार इलाहबाद विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं, समकालीन कविता और आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं.)

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One Thought to “प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ : विह्वल करने से ज़्यादा विचार-विकल करती हैं”

  1. आशीष मिश्र

    सहज और अच्छी कविताएँ

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