हृदय में व्यथा का रिसाव करती हैं सुरेश सेन निशांत की कविता

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श्याम अंकुरम

सुरेश सेन निशांत नहीं रहे. स्तब्धकारी खबर ! मेरा उनसे परिचय राजवर्धन के संपादन में कविता संकलन ‘स्वर –एकादश ‘ से हुआ था. राजवर्धन से जब यह संग्रह मिला था उनकी कुछ ही कविताओं को पढ़ पाया था जो दिल में गहरे से धंस गई.  उनकी कविता मुझ सहित लोगों के हृदय में व्यथा का रिसाव प्रवाहित कर गई . चाहे वह कविता ‘ गूजरात’ हो या’ पिता की छड़ी ‘ हो . यही मेरा उनसे प्रथम परिचय था . दुर्भाग्य है कि मैं कभी उनसे मिल नहीं सका.

मेरा उनका यह मानस परिचय तब और गहन और घना हुआ जब समीक्षा की दृष्टि से संकलन ‘स्वर -एकादश’ का पाठ किया. सुरेश सेन निशांत की कविता ‘गुजरात ‘ संशय , शक,फिर भी आम आदमी के लिए उनके बच्चों के लिए एक संभावना , आसरा ,रोजी ,रोजगार ,ठौर के बतौर बना हुआ है ,जहां भेज रहा है अपने बेटे को नौकरी के लिए जिसमें रोपे हैं बहुत से प्यारे से संस्कार. वह सेब की मीठी सुगंध से भरा है और गुजरात के गांधी जैसा थोड़ा अड़ियल है. समझे की पहाड़ी बादाम का पेड़ रोप रहा है गुजरात की ऊर्वरा धरती पर ,पर सशंकित है – – – – – – – – गुजरात मैं भरा हूं भय से /मैं भरा हूं आशंका से /मैं उस ईर्ष्या और हिंसा की आग से भयभीत हूं /जिसमें झुलसा हुआ है तुम्हारा बदन /उस लहू से डरा हूं /जिसके छींटे तुम्हारे वस्त्रों पर पड़े हुए हैं /उन कांटो से डरा हूं जो आ गये हैं /तुम्हारी उर्वरा धरती पर /उस बंजरपन ,उन खर पतवारों से /डरा हुआ हूं मैं /जो सोख रही है तुम्हारी देह की नमी को ……..

सुरेश सेन निशांत का जन्म 12अगस्त 1959 को हुआ था . दसवीं तक पढ़ाई के बाद विद्युत संकाय में डिप्लोमा किया और हाल तक वरिष्ठ अभियंता के पद पर कार्यरत रहे. 1976 से लिखना शुरू किया. पांच साल तक गजलें लिखते रहे. उसी समय एक मित्र ने ‘ पहल ‘ पढ़ने को दी . निशांत के अनुसार ‘ पहल ‘ पढ़ना अद्भुत अनुभव रहा. कविता पढ़ने की समझ बनी. 1992 से कविता लिखना शुरू किया. उनकी कुछ कवितायें पहल , वसुधा ,हंस, कथाक्रम , आलोचना, कथादेश ,कथन, सर्वनाम , नया ज्ञानोदय, लमही , समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, आधारशिला, उद्भावना,साखी, पाखी और जनसत्ता आदि में प्रकाशित हुईं .

उनके मनपसंद कवियों में त्रिलोचन,विजेन्दर्,केदारनाथ अग्रवाल, कुमार अंबुज, राजेश जोशी, अरूण कमल, एकान्त व स्वपनिल श्रीवास्तव और पाश थे| विदेशी कवियों में नाजिम हिकमत, महमूद दरवेश थे. उन्हें पहला प्रफुल्ल स्मृति सम्मान, सूत्र सम्मान -2008, सेतु सम्मान 2011 से सम्मानित किया गया. ‘वे लकड़हारे नहीं हैं’ उनका चर्चित कविता संग्रह रहा है. उन्होंने ‘आकंठ’ पत्रिका का समकालीन हिमांचल कविता विशेषांक का भी सम्पादन किया. वे संभावनाओं से भरे रचनाकार रहे हैं. उनकी कविता का रचाव जीवन के बीच से हुआ. उनका असमय जाना साहित्य समाज को व्यथित कर देने वाला है | हम इस दुख में उनके परिवार और दोस्तों के साथ शरीक हैं और जन संस्कृति मंच की ओर से कवि सुरेश सेन निशान्त को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं |

(श्याम अंकुरम जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद तथा जन संस्कृति मंच, लखनऊ  के संयोजक हैं ) 

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