सत्ता का प्रतिपक्ष रचती हैं कौशल किशोर की कविताएं

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‘वह औरत नहीं महानद थी’ तथा ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का हुआ विमोचन
लखनऊ. ‘हंसो, इसलिए कि रो नहीं सकते इस देश में/हंसो, खिलखिलाकर/अपनी पूरी शक्ति के साथ/ इसलिए कि तुम्हारे उदास होने से/उदास हो जाते हैं प्रधानमंत्री जी/हंसो, इसलिए कि/तुम्हें इस मुल्क में रहना है’। 
ये पंक्तियां हैं कवि कौशल किशोर की ‘तानाशाह’ सीरीज कविता की जिसका पाठ 5 मई को उन्होंने यूपी प्रेस क्लब में किया। अवसर था जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित उनके कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ तथा गद्य कृति ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ के विमोचन तथा उन पर परिचर्चा का। इस मौके पर उन्होंने ‘वह औरत नहीं महानद थी’ कविता भी सुनाई जिसमें नदी से महानद में रूपान्तरण के माध्यम से औरतों के संघर्ष और जिजीविषा का रूपक रचा गया है।
कविता पाठ से पहले कौशल किशोर ने कार्ल मार्क्स की दौ सौवीं जयन्ती पर उन्हें याद किया। उनके कथन ‘कविता मनुष्यता की मातृभाषा है’ को उद्धृत करते हुए कहा कि विडम्बना है कि आज मनुष्यता को लहूलुहान किया जा रहा है। ऐसे में संवेदनशील नागरिक की हैसियत से कवि को प्रेम और घृणा, सच और झूठ के बीच के इस जंग में अपना पक्ष साफ तौर पर रखना होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना ने की। उन्होंने कहा कि कबीर, रसखान, तुलसी की कविताएं हमें याद रहती हैं लेकिन आज के कवि की कविताएं याद नही रहती। हमारे पाठक कम होते जा रहे हैं। कविताएं तो ऐसी होनी चाहिए जो बुरे वक्त में काम आये। ऐसी कविताएं कम लिखी जा रही हैं जो हमारी स्मृतियों में समा जाय। राजेश जोशी, मंगलेश डबराल आदि के पास ऐसी कविताएं हैं। कौशल किशोर के पास भी ऐसी कुछ कविताएं हैं जो कला और संवेदना के स्तर पर प्रभाव छोड़ती है। इस संबंध में उन्होंने खास तौर पर ‘मलाला’, ‘धरती और आग और अन्न की चर्चा की और कहा कि ये हमारी यादों में बस जाती हैं।
विशिष्ट अतिथि फैजाबाद से आये जाने माने कवि स्वप्निल श्रीवास्तव थे। उन्होंने कहा कि कौशल किशोर की कविताओं में राजनीतिक अनुभव और इतिहास की प्रतिध्वनियां दर्ज हैं । वे उन बर्बर घटनाओं को हमारे सामने लाते हैं जो सत्ता में निर्ममता के साथ घटित हो रही हैं । इस तरह कवि सत्ता  के प्रतिपक्ष में खड़ा है। आज की कविता को कोमलकांत पदावली नही ऐसी भाषा चाहिये जो हमारे यथार्थ को व्यक्त कर सके। इस संग्रह की कविताओं में कवि ने उस शक्तियों की पहचान की है जो आम आदमी के जीवन को दूभर बना रही हैं। ऐसे समय में जब सम्प्रादायिकता और फासिस्ट तत्व नये रूप में सामने आ रहे हैं. कवि का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है।
संग्रह की प्रतिनिधि कविता ‘वह औरत नही महानद थी’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह कविता किसी कुलीन स्त्री पर नही लिखी गयी है। इसमें स्त्री जुलूस में शामिल एक स्त्री है। उसके साथ चल रही स्त्रियां संघर्षशील स्त्रियां है। ये स्त्रियां अभिजात्य के खिलाफ हैं। यह कविता स्त्री का महात्म रचती है। संग्रह में स्त्रियों और उनके जीवन और संघर्ष  को केन्द्र कर कई कविताएं हैं। इनमें उनकी दयनीयता को नहीं संघर्षशीलता को सामने लाया गया है।
कौशल किशोर की कृतियों पर आयोजित परिचर्चा में बीज वक्तव्य कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने दियां। उनका कहना था कि कौशल किशोर की काव्य यात्रा करीब आधी सदी की है। वे 1967 से कविताएं लिख रहे हैं। यह महत्वपूर्ण समय है जब नक्सलबाड़ी जैसा आंदोलन हुआ जिसने राजनीति और साहित्य को प्रभावित किया। कौशल किशोर की कविताओं पर इसका प्रभाव हुआ। इनकी बाद की कविताओं में जनतंत्र व साझी विरासत को बचाने की चिन्ता है। ये ज्यादा संवादधर्मी हैं। इनकी कविताओं से गुजरते हुए लगता है कौशल किशोर जुनूनी और जिद्दी कवि हैं। यह जिद्द उनकी तमाम कविताओं में दिखती है।
कवि व पत्रकार सुभाष राय का कहना था कि कौशल किशोर की कविताएं युद्धरत आदमी की कविताएं है। संग्रह के पहले खण्ड में त्वरा व गत्यात्मकता है तो दूसरे में स्थिरता व दार्शनिकता है। यह यात्रा आम आदमी के संघर्ष की अनन्त यात्रा है। ‘एक मुट्ठी रेत’ में प्रतिरोध के काव्यात्मक बिम्ब की उन्होंने चर्चा की। उनका यह भी कहना था कि कविता अपने समय में जरूर रची जाती है लेकिन वह उसके पार जाती है। कौशल किशोर की कविताओं में कहीं कही नारे बन जाने तथा समय तक सीमित रह जाने का खतरा है जिससे कवि को बचना चाहिए।
कथाकार-आलोचक डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने संग्रह की तीन कविताओं ‘कैसे कह दूं’, ‘कारखाने से लौटने पर’ की चर्चा करते हुए कहा कि यहां संपूर्ण क्रान्ति की असफलता से लेकर उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो मजदूरों और आम आदमी को सहना पड़ती है। लेकिन यहां स्थितियों के सामने समर्पण नहीं है। यही बात ‘जनता करे तो क्या करे’ में ज्यादा मुखर तरीके से आई है। कविता सवाल खड़े करके समाप्त होती है कि साम्राज्यवादियों के हाथों कठपुतली बनी सरकार को जनता कब तक बर्दाश्त करे। वह या तो डूब मरे या डुबो दे ऐसी सरकार को।
प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने ‘सुजानपुर गांव के लड़के नाटक खेल रहे हैं गांधी मैदान में’ कविता के पाठ से सामंतों और दलितों की बीच के अन्तरविरोध तथा दलितो की बढ़ती दावेदारी को लक्षित किया।
नाटककार राजेश कुमार ने गद्य कृति ‘प्रतिरोध की संस्कृत’ पर बात करते हुए कहा कि कौशल किशोर की इस किताब में नाटक, कला,  फिल्म आदि क्षेत्रों में प्रतिरोध के नए नए रूपों से साक्षात्कार है तथा यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमले को सामने लाती है। सत्ता किस तरह झूठ गढ़ रही है तथा संवैधानिक अधिकारों पर उसके द्वारा हमला हो रहा है, किसान आत्महत्या से लेकर नाटकों पर रोक जैसी बीते सात साल की घटनाओं को कौशल किशोर ने अपने विचार का विषय बनाया है।
इप्टा के महासचिव राकेश ने कार्ल मार्क्स के समकालीन मशहूर कवि व आलोचक मैथ्यू  अरनाल्ड के इस कथन को उद्धृत किया कि कविता को पढ़ते हुए यदि क्लासिक रचनाओं की याद आ जाय तो कवि को सफल माना जाना चाहिए। कौशल किशोर की कविताओं से गुजरते हुए मायकावस्की याद आ जाये, ‘लखनऊ’ वाली कविता पढ़ते हुए कैफी की लखनऊ पर लिखी कविता याद आये तो यह सृजनात्मक परम्परा का विकास है। कौशल और हमलोग जिस विचार से प्रेरित हुए और चार दशक के हम संघर्षों के साथी रहे उसमें मैं नहीं हम पर जोर रहा। यही कारण है कि कौशल किशोर का संग्रह उम्र के इस पड़ाव पर आ पाया।
कार्यक्रम का संचालन कवि व जसम लखनऊ के संयोजक श्याम अंकुरम ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कवि भगवान स्वरूप कटियार ने किया । इस अवसर पर शकील सिद्दीकी, अजय सिंह, ओमप्रकाश नदीम, नसीम साकेती, अवधेश श्रीवास्तव, नलिन रंजन, बी एन गौड़, राम कठिन सिंह, प्रताप दीक्षित, विनय दास, सत्यवान, वीरेन्द्र सारंग, प्रतुल जोशी, अनीता श्रीवास्तव, निर्मला सिंह, विमल किशोर, इंदू पांडेय, रविकान्त, अजीत प्रियदर्शी, मंजू प्रसाद, रोली शंकर,  के के वत्स, वर्षा श्रीवास्तव,  आरती श्रीवास्तव, आदियोग, ज्ञान प्रकाश, के के शुक्ला, राम किशोर,, धर्मेन्द्र, एम जोशी हिमानी, कल्पना पांडेय, एस आर सिंह, हरीश मुदावल, अमर सिंह, राम कृष्ण, तरुण निशान्त, डंडा लखनवी, तुकाराम वर्मा, नूर आलम, अवधेश कुमार सिंह, प्रबाल सिंह, अनिल श्रीवास्तव, रफत फातिमा, राजीव यादव सहित बड़ी संख्या में साहित्य, संस्कृति व सामाजिक आंदोलन से जुड़े लोगों की उपस्थिति थी।

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