कविता

स्त्री को उसके वास्तविक रूप में पहचाने जाने की ज़िद हैं शैलजा की कविताएँ

दीपक कुमार


शैलजा पाठक से परिचय मित्र पीयूष द्वारा शेयर की गई उनकी कविता ‘कुसुम कुमारी’ के माध्यम से हुआ। पहली ही नजर में इस कविता ने दिमाग में हल-चल पैदा कर दी।

इस कविता में बोध का एक अलग रूप, एक नया स्तर दिखाई पड़ता है। यह कविता विमर्शों की सीमा से बाहर यथार्थ की सघन अनुभूति को सरल और क्लासिकल तरीके से पेश करती है।

कविता में आई दोनों लड़कियों से कक्षा के दूसरे बच्चे बात नहीं करते क्योंकि एक बेहद गरीब है और दूसरी गरीब होने के साथ अछूत भी. दोनों की भौतिक स्थितियां उन्हें बेहद करीब ले आती हैं लेकिन जैसे ही यह करीबी स्कूल के उपेक्षित कोने से निकल कर बाहर जाना चाहती है पहली ही सीढ़ी पर उसका दम घुट जाता है.

इसका कारण स्कूल और स्कूल के बाहर एक सा ही है ,और वह है भारतीय समाज की मनुष्य विरोधी संरचना.

इस संरचना पर पर्दा डालने और इसे बनाए रखने के लिए तमाम अंतर्विरोधी मिथक रचे जाते हैं. ऐसा ही एक मिथक है योग्यता का.

सदियों से पिछड़ों, दलितों, काले लोगों के खिलाफ़ एक मिथक गढा गया कि वे कमतर हैं , अयोग्य हैं , जाहिल हैं इसलिए उन्हें नियंत्रण में रखा जाना चाहिए दूसरी तरफ आपको जोर शोर से यह बात सुनाई जायेगी कि साहब अब कोई भेद नहीं रहा सब बराबर हैं जो योग्य है उसकी हर जगह पूछ है.

कविता की ताक़त यह है कि वह इन कल्पित , झूठे मिथकों को एक पंक्ति द्वारा चटाक से तोड़ देती है –
‘और तुम्हे कुसुम कुमारी ?
हम लोग छोटी जात
और काले हैं
हमारे बाप मुहल्ले की नाली धोते
हमारी अम्मा लोगों के घर का पैखाना धोती
इसलिए कोई बात नहीं करता
लेकिन तुम्हारा गणित और इतिहास में सबसे ज्यादा नंबर आया था न ?
उससे कोई फर्क नहीं पड़ता’
इन पंक्तियों से गुजरते हुए मुझे बरबस गोरख जी के उस गीत की याद हो आई जिसमें राजकुमार मैना के पंख काट कर उससे उड़ने के लिए कहता है और गला मरोड़ कर गाने के लिए-
‘पहिले पाँखि कतरि के कहलें अब तू उड़िजा मैना
मेहनत कै के उड़िजा मैना ना’
कविता आगे बढ़ते हुए कुसुम कुमारी , गीता कुमारी और शैलजा कुमारी के बीच एकता के जिस धरातल का निर्माण करती है वह महज काव्यात्मक न्याय न होकर सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रस्थान बिंदु भी है.

एक कवि के रूप में शैलजा पाठक की दृष्टि बहुआयामी है. वे चीजों को 360 डिग्री के कोण से देखने की हिमायती हैं जिससे उनकी कविताओं में अनुभूति की सघनता के साथ विमर्शों का दायरा बड़ा होता जाता है.

‘ये देश है वीर जवानों का’ कविता में समय की भयावहता को वे सिर्फ स्त्री के लिए ही नहीं रेखांकित करतीं बल्कि घर से बाहर जाने वाला हर शख्स उसके दायरे में है.

अपने मृत बच्चे को पानी में सौंपता पिता है , एक घटना से दूसरी घटना पर शिफ्ट होते हम हैं और किसी भी चीज से संवेदनशीलता को ख़त्म कर उसे महज एक मृत खबर में तब्दील कर देने वाली राजनीति है –
‘अब आप आदत डाल लें जनाब
घर से बाहर जाने वाले को छाती से लगा लें
उसके आने की उम्मीद न पालें
अगर शाम उसके आने की दस्तक होती है तो देश इसे सकारात्मक घटना की तरह देखे और आप हैरान होकर
———–
बेटियां काला मुंह करा कर नहीं आ रही
वो घर के बाहर ही काली कोठरी में जा रही
वो उम्र नहीं देह से नापी जा रही
वो घर से बाहर जाएँ तो आप मन ही मन इनके नाम का तर्पण कर सकते हैं
ये भयानक ख़बरों का समय है’

शैलजा के पास अनुभवों का विस्तृत संसार है. वैसे तो हमारा सामाजिक गठन ही ऐसा है जिसमें महिलाओं को अनचाहे ही ढेरों अनुभव मिल जाते हैं. उनकी लड़ाई वस्तु से स्वतंत्रचेता मनुष्य की तरफ अग्रसर होने की लड़ाई है जिसमें सहज कुछ भी नहीं है लेकिन उसे बड़ी सहजता से लिया जाता है मसलन विवाह के लिए स्त्री को जो वह नहीं है उसे वह होने के लिए मजबूर होना पड़ता है और किसी को कुछ भी असहज नहीं लगता. बल्कि स्त्री जो है उसका जस का तस सामने आ जाना असहज है , उसका प्रेम असहज है , उसका कुंठामुक्त होना असहज है.

शैलजा की कविताएँ स्त्री को उसके वास्तविक रूप में पहचाने जाने की जिद करती हैं। वे अकुंठ प्रेम करना चाहतीं हैं। ‘मेरे गुणों की झूठी लिस्ट’ , ‘जब होना प्रेम में’ जैसी कविताओं में इन बातों को बहुत आसानी से परिलक्षित किया जा सकता है।

हमारे सामाजिक गठन में ही कुछ बुनियादी खामियां हैं जिसके चलते कुंठायें तमाम बदशक्ल रूपों में सामने आती रहती हैं जिसका शिकार बड़े पैमाने पर स्त्रियों को होना पड़ता है। ‘बुझी लालटेन के सीसे काले होते हैं’ कविता से गुजरते हुए एक शर्मिंदगी भरा एहसास जेहन में तारी हो जाता है।

कविता आपको स्त्री होने की पीड़ा से कुछ इस तरह गुज़ारती है कि आप दुःख, क्षोभ, घृणा से लहूलुहान हुए बिना नहीं रह सकते ठीक वैसे ही जैसे कि शशिकांत –
‘शशिकांत घंटे भर की औरत था
शर्मिंदा रहता
आदमी होने की घिन से भरा रहता
मजबूरी उसे नचाती’
शैलजा पाठक के पास बेहतरीन भाषा है और उसे बरतने वाला शिल्प भी जिससे उनकी कविताओं में स्त्री जीवन के तमाम बिम्ब इतनी जीवन्तता से चित्रित हुए कि लगता है हमारे सामने कोई फिल्म चल रही है।

तो आइए आज जनमत पोर्टल पर शैलजा की कविताओं से मिलते हैं |

शैलजा पाठक की कविताएँ

1.कुसुम कुमारी

क्योंकि क्लास में मुझसे कोई बात नही करता
इसलिए मैं तुम्हारे पास बैठती
तुमसे तो कोई भी नही करता था
यही बात कॉमन थी हमारे बीच

मेरे पास कारण था कि
मैं स्मार्ट यूनिफॉर्म नही पहनती
जल्दी हाथ उठा जबाब नही देती
कभी टीचर मुझे चाक लाने नही बोलती
न मुझे कभी रीडिंग का मौका मिला
मेरे टिफिन का लॉक टूटा था उसपर रबड़ लगा होता
मेरे जूते भी इतने साफ नही थे

और तुम्हे कुसुम कुमारी?
हम लोग छोटी जात
और काले हैं
हमारे बाप मुहल्ले की नाली धोते
हमारी अम्मा लोगों के घर का पैखाना धोती
इसलिए कोई बात नही करता

लेकिन तुम्हारा गणित में और इतिहास में सबसे ज्यादा नम्बर आया था न ?

उससे कोई फर्क नही पड़ता
वो मेरी ढीली चोटी को कस देती
हम आधी छुट्टी में साथ मे टिफिन खाते
मेरे पराठे भुजिया की तरह ही उसका पराठा होता

हम दोनों एकदम लास्ट में पानी पीते चुल्लू लगा के जब पाँचवी घण्टी बजती

अम्मा को बताया मैंने
कुसुम कुमारी का घर पास में है अम्मा
आज हम गए थे
उसकी अम्मा बोली जल्दी चली जाओ
कोई देख न ले

मैं जल्दी घर लौट आई थी
कुसुम कुमारी ,लेकिन
देर तक
महीनों तक
सालों तक
मेरी बेचैनी जस की तस है

तुम्हारी कसी चोटी से असहज होते बालों को सुलझा लेती हूं

पर ये दुराव न सुलझा मुझसे
प्रार्थना में तो एक साथ हम हाथ जोड़ते
जन गण पर एक साथ खड़े हुए
मोम के सात रंग का डिब्बा भी सेम था

कुछ बातें मुझमे अजीब थी बचपन से
मैं आजमा कर देखती

मैं ये बोल कर देखती “शैलजा कुमारी”
मैं प्यास को मार बाद में पीती पानी
बच्चों की बात में मैं बोलती
हमलोग गरीब है
पिताजी किसान मेरे
बाद दिनों ये चिढ़ ऐसा बदला कि मुझे लगता मैं बोल दूँ
किसी को नही पता न
मेरे साथ ही हुई थी बलात्कार वाली घटना

मैं उस दर्द की नदी को पार करने नही डूबने के लिए ऐसा बोलने लगी
मुझे बहुत बातों का जबाब तो नही मिला कुसुम कुमारी

बस तुम याद आई
टिफिन की सूखी पूड़ी की तरह
अचार की खटाई की तरह

आती हो याद जब भी किसी को देखूं अलग थलग तो जी करता है
ये भी होगी कोई गीता कुमारी /आखिर में पानी पीने वाली
मैं उनके साथ बड़ा पाव खाती हूँ
उन्हें बताती हूँ

अतीत के पन्नो में कितने अनसुलझे सवाल हैं ………

 

2. मेरे गुणों की झूठी लिस्ट थी

मैं कर सकती थी तकरार
पर शादी टूट जाती यार
तो झूठ में मैं भी थी शुमार
सिलाई बुलाई कढ़ाई का क नही जानती थी
फिर भी मेरे नाम के तमाम चादर पर्दे टेबल क्लॉथ की प्रदर्शनी हुई

खाने की लज़ीज प्लेटों के एक मसाले का नाम न पता था मुझे
पर उनलोगों ने मेरे नाम के साथ उँगलियाँ चाटी

मेरी ग्रहों से पीड़ित कुंडली को तन्त्र मन्तर से ठीक कराया गया
और मुझे ठिकाने लगाया गया

मैं सवालों से भरी दूसरे आँगन में खड़ी सर का पल्लू ठीक कर रही थी
मैं सच कहने को मर रही थी

यूँ के मुझमे कोई गुण नही जो सुन कर मुझे व्याह लाये आप
यु तो हूँ मैं खुली किताब
हथेली पर सरसों उगाने का करिश्मा नही कर सकती
मैं सामान्य हूँ ज्यादा सर्कस नही कर सकती

मैं पतंग को देर तक उड़ते देख सकती हूँ
मैं उसके कटने पर घण्टो उदास रह सकती हूँ
मैं बेवजह खिड़की पर बैठी आसमान तकती हूँ
बक्से में भरा तमाम आर्ट झूठ है

मुझे क्यों नही बतानी चाहिए वो बात जो है मुझमे
मुझे क्यों होना था सर्व गुण सम्पन्न

नही मैं बेहद एवरेज हूँ
घर के बरात भर मेहमान संभाल लूँ मैं वो नही
रसोई मजबूरी है
घर बेतरतीब अच्छे लगते मुझे
मैं ज्यादा सजधज से बीमार हो जाती हूँ
आपकी उचाई से मैच करने को हील नही पहन सकती

सॉरी
पर मेरे मुँह में जुबान है
मैं देख और सुन सकती हूँ
मैं भींगे गानों के बोल पर भींग जाती हूँ
मैं बेसुरा ही सही जोर से गाती हूँ
पिक्चर देखते हुए रोती और हँसती भी हूँ

हमें हमारे होने के साथ प्यार किया जाय
राजरानी के दिल हैं टूटते भी हैं

दिखावे के लेप से दूर मैं जो हूँ
अर्जी में लिख रही हूँ
बक्से की बात फर्जी है

और ये बताते हुए मैं जरा भी शर्मिंदा नही…….

अम्मा रोइ थी
दीदी की सगाई में
बेटियों की विदाई में
भाई के उदासी में
पिता की दुरूह खासी में
पूजा घर में भी न जाने क्या क्या याद कर
दुसरो की दुःख में पीड़ा में

एक बार तो भाई को नौकरी मिलने पर भी रोई
कई त्योहारों पर रोइ थी
अपनी बेटियों को याद कर
उनके भरे खुश हाल परिवार की फोटो पर भी
हाथ फेरती भिंगोति रही आँखें

एक बार मुझे खिल खिलाते देख भी सुबक पड़ी की
सुबह चली जाने वाली हूँ मैं
ससुराल

एक दिन एकदम से चुप लगा गई
कितने ही कन्धे कांपे पर अम्मा न हिली
सब रहे रोते
अम्मा न रोईं

ये पहली दफा था
बिना आँचल बिना गोद हमनें अपने आप को अकेले रोते देखा….

3.बुझी लालटेन के शीशे काले होते हैं

कुछ शशिकांत नाम के लड़कों को लवंडा कहा गया
वो शादी बरात जचगी ऐसे अवसर पर बुलाये जाते
नचाये जाते लूट लिए और लूटा दिए जाते

मौसम का हिट गाना बजता
मैं रात भर न सोई रे नादान बालमा अरे बेईमान बालमा

घर में सबको पता है ये लड़का है लड़की के भेष में
पर इस भेष का नशा चढ़ता
शाम बढ़ती
लाइट लट्टू गैस पेट्रो की पीली रौशनी बढ़ती और जवानी चढ़ती
छोरा कमर के खुले जगह पर घर की अम्मा का हाथ धरवाता और मोटी रकम निकलवाता

हम छोटी लड़कियों ने ये नाच किसी चाची किसी भौजी के पीठ पीछे छिपकर देखा
छत पर रंग फैलता
गाना ढोलक पर बिजली सा तड़प कर कुलांचे भर कर नाचता शशिकांत

घर के मर्द दूर छतों पर बैठे इशारे करते
फब्तियां कसते
रुपया निकाल उसे अपने पास बुलाते
उसके पास जाते उसकी कमर में हाथ डालते
उसकी छाती पर हाथ मारते
उसके देह से उठती पाउडर की खुशबु में मदहोश वो भूल जाते
ये लड़का है कई बार खैनी खाते हुए रस्ते में मिला है
उसकी छाती में पैसा ठूसते

खम्भा पकड़ के रोईं मैं नादान बालमा से सुर ताल सब इस पल बेसुरे हो जाते
शशिकांत साड़ी ठीक करते आता
और महफूज औरत की टोली में रोता सा नाचने लगता

महफ़िल खत्म होती
वो धीरे धीरे अपने ऊपर पहनी औरत उतारता
बक्से में सहेजता
वो चाहता अपनी देह से उतारी उस औरत को गले लगाये
माग ले माफ़ी
सहेज ले घुंघुरू बिंदी की थाती
उनकी कमर के नाख़ून पर हल्दी मल दे
उनकी छातियों को नर्म फाहे सा सेंक दे

शशिकांत घण्टे भर की औरत था
शर्मिंदा रहता
आदमी होने की घिन से भरा रहता
मजबूरी उसे नचाती

वो रात भर नही सोता
वो ढोल पर गाती आवाजो के साये में सांस लेता
और महफ़िल की भीड़ में कूद कर मटकता

एक शाम घर से निकली टमटम पे बैठ कर मैं सैंया ने ऐसे देखा …..

हैरान होके रोईं मैं नादान बालमा अरे बेईमान बालमा …..

 

4. ये कहरती कुंखती औरतें / ये घर अजायबघर बन रहा

बीमार औरत के दुःख से उसके ऊपर झूलता पंखा काला पड़ गया है
दवाई के महक से उसके कमरे की हवा में जहर घुल रहा है
औरत अकेली कमरे में पड़ी है
बस आवाजों का आना जाना है

बीमार औरत की काया से लिपटा कपड़ा उसके शरीर के ताप सा गरम रहता है
ये रंगीन कपड़ों के सबसे बदरंग दिन है

बीमार औरत आईना नही देखती
सिंदूर की डब्बी से दूर है
कंघी में फसे हैं उसके पिछले दिनों के बाल
उसके रिंकल क्रीम में गढ्ढे पड़े हैं
ये काँपती इकलौती चूड़ी को तसल्ली देती है

असमय बड़े हो रहे हैं उसके बच्चे
उनकी हरकतों से घर की दिवार उदास है
घर की जालियों में उलझन से सवाल हैं
दिन दोपहर रात की दवाई की पन्नी फहचानती बेटी
ब्रेड जैम के लिए कभी जिद्द नही करती

औरत कंहरती सी जाग रही
सो रही तो शरीर से दर्द की सुगबुगाहट हो रही
पसीने से भींग रही देह
सर्द हवा से पायताने रखी चद्दर
कोशिश भर उसे ढाँक रही
घड़ी बन्द पड़ी है कमरे की
अलमारियों में बिखरे कपड़े दुःख से पसर गए हैं चारो ओर

बीमार औरतें पूरेे घर को असहाय बना देती है
एक घर के छत के नीचे
दर्द से बेहाल औरत अपने परिवार को तसल्ली दे रही
अपने बच्चे से कर रही अगले हफ्ते की प्रोमिस
अपने पति को निहार रही
अपनी बेबसी में बार बार अपना बिस्तर बुहार रही
इनके कंहरने से बिस्तर की सलवटे बढ़ जाती हैं

बीमार औरत की रसोई में अस्त व्यस्त है डिब्बे
दुःख फैलता है तो
शक्कर में नमक
नमक में शक्कर घुल जाता है
हल्दी से पीला पड़ा है रसोई का कपड़ा

ठीक वैसे जर्द पड़ी है औरत
ठीक वैसे गर्द पड़ी है घर में
ठीक पहले सा
कुछ भी ठीक नही आजकल…..

 

5. मदर्स डे

लकड़ियाँ भींग जाना चाहती थी
घाट डूब जाना चाहते थे
शहर ने बाँध लिया था सामान
बचे पेड़ जंगल में जाकर दुबक गये थे
सड़के अपनी जड़ों समेत कहीं
आकाश में विलुप्त होना चाहती थी
तुम्हारे नही होने की खबर पर
नही किया किसी ने यकीन

पर जिद्द तो तुम्हारी अम्मा
तुम्हे अपनी मनवाने की आदत
आंगन के विलाप ने शहर को
रुलाया
तुम्हें क्या करता कोई विदा
शहर के रंग ढंग में रची तुम
अंजली भर पानी दिखा
सूरज को ललकार देने वाली
अपने पूजा घर की दीवारों पर
भगवान् को कील से ठोककर रखने वाली तुम
बस चली गई

आँख की नदी में तिड़क गई लकड़ियों की चिंगारी
राख पर सवार मुस्कराहट
शहर घाट लकड़ियों से उतर कर
अनंत आकाश बन गई हो ना

अभी अभी तुम्हारे मेजपोश का खरगोश
अपनी आँख पोछता दिखा
राख अब भी उड रही है अम्मा

जरा आंचल को फूंक कर हमारी आँख पर भी तो रखो…..
शहरी रास्ते पर तेज़ गाड़ियाँ भाग रही हैं
हाथ पकड़ो………..

.सब कह रहे है आज…..मदर्स डे है

6.हम नमक से बने हैं

तुम्हारी देह से चन्दन की महक उठती है
तुम्हारी हथेली के नन्हे विस्तार पर चाँद टुकड़ा हुआ पड़ा है
तुम्हारी छाती में तमाम फ़िक्र धड़कते सुना मैंने
दुनियाँ को तुम्हारी आँख सा छोटा गहरा खारा मीठा और अमृत का सोता होना चाहिए
जहाँ कितने ही दर्द पनाह पाते हैं

तुम्हारे पेट के समतल पर एक मिट्टी की धरती का टुकड़ा है
बच्चे कूदते उछलते मिट्टी की महक से भर जाते हैं
तुम्हारी चाहतो की तिजोरी खाली है
तुम्हारे सपनें काई लगे मैदान से सरपट कहीं सरक गए है
तुम प्रेम से भरी इस भोथर बंजर दुनियाँ में एक कन्धे की तलाश में कितनी बेचैन हो मेरी दोस्त

वो कन्धे तुम्हारे चुप की इस काया की अर्थी भी नही उठा सकते
वो तुम्हे कभी कहीं नही पहुचा सकते

तुम्हारी पीठ की नीली नदी में दर्द गोते लगाता है
अठखेलियां करता समन्दर भरम है

नाहक प्रेम में छिझ रही हो
कर रही हो विलाप
इतने कातर प्रार्थना की सुनवाई नही होती
झूठ के बाजार में नही खरीदी जाती सच्चाई

जाओ अपनी बची साँसों का आदर करो
पौधों को कहो तुम्हारी हथेली के उर्वर में खिले मुस्कराएं
बच्चों को कहो तूम्हारे पेट की समतल मिट्टी में भींग जाए

प्रेम को किसी स्याही के दवात में सूखने दो
मन को हूकने दो
मन की बेचैनियों को किसी गरम तवे पर सेक लो
धड़कनों को रोक लो

रुक जाओ मेरी दोस्त
बंजर पथरीली प्रेम की धरती पर कितने चोटिल है तुम्हारे पाँव

इन्हें किसी और रास्ते मोड़ लो
चोट के ताजा हैं निशान
खुद ही घिसो चन्दन लगाओ लेप
बनो लोबान
सब हैं तुमसे अनजान

सब पतथर में ढ़ले हैं
क्या करें हम नमक से बने हैं ……

7.जब होना प्रेम में

प्रेम में होना तो मत देखना स्वप्न
हक़ीक़त के इस नए पन्ने पर यकीन से रख देना अपने कदम
और चल पड़ना

प्रेम में होना तो शक मत करना
अपना भरोसा उलीच देना उसकी अंजुरी में और खाली हो जाना
मुस्कराना और कहना
सहेज सकते हो तो सहेज लेना
मैंने आज इस रोज इस तारीख के होठ चूमें हैं
मैं शक में रहकर प्रेम नही कर सकती

प्रेम में होना तो जीवन में होना
पुराने दुःख को जाने देना जाती लहरों के साथ
जो लौट कर तुम्हे भींगा रहीं उनके कन्धे पर शाम रखना
किसी गुमनाम दिशा की ओर लगाना उसके नाम की पुकार
प्रेम में लौट आने देना स्पर्श
हाथो में कस कर रखना वक़्त
झुकना प्रेम के समक्ष

प्रेम में होना तो मत लेना जन्म जन्म के वादे
बस सहेज लेना स्मृतियाँ जनम भर के लिए

प्रेम में परपंच से दूर रहना । बेरोजगारी गरीबी मौसम की बात मत करना ।किसी और सा नही है तुम्हारा प्यार। तुम खुद नया दृश्य गढ़ रहे हो । तुम फ़िल्मी आशिक़ से मत मिलाना प्रेम का चेहरा । सच से आँख मिलाना
खाली हो जाना फिर भर जाने के लिए।

सुनो ! तुम बहुत सुंदर हो को पहली बार सुनना । ठीक ऐसे ही प्यार के वक्त सुरमई होती है शाम । प्रेम को मत कहना दलदल है धंस रहीं हूँ मैं । गहरी नदी है ये डूब जाना । उबर जाने के लिए।

“जाने क्या बात है नींद नही आती है “ये गुनगुनाते हुए करवट बदलना। चूमना अपनी खाली हथेली। कल शाम किसी ने उसे मुहब्बत से भर दिया था।

प्यार में हरसिंगार सी बिछ जाना। चुपके से। रात के किसी पहर । समय संशय की टेर में तमाम उलझने मत बनाना।
अगर प्रेम में हो तो मेरी जान प्रेम की हो जाना

होठों पर घुलता नमक सीने की धधक आँख में उतरा गुलाबी रंग मुबारक हो तुम्हे

 8. तुम पानी के रंग की हो…

नींद और काम में अगर इन्हें चुनना हो तो ये झपकी चुनेंगी
ये ओघाते झपकी लेते बना लेती हैंस्वेटर
घस लेती है गैस पट्टी
नींद इन्हें खुद ब खुद चुन लेती है

बोलने और चुप रहने में ये भुंभुनाना चुनती हैं
ये बोलती हैं तो सुनी नही जाती
चुप रहती हैं तो काम पहाड़ हो जाते इनके
दिवारों से घिरी टिफिन के डिब्बे पकड़ाती
सबको विदा करती
बनाती है ग्लास भर चाय
अकेले बैठ सुड़कती हैं
चुप्पी इन्हें खुद ही चुन लेती

प्यार और शादी में इन्हें कुछ नही चुनना होता
इनके लिए शादी चुनी जाती है
ये सपनें चुनती हैं
तमाम पढ़ी कहानियों के प्रेमी इन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं
फिल्मों के किसी दिलकश गाने का हीरो इनकी कलाई थाम फूलों की दुनियाँ में खिंचता है
ये उनकी हो जाती हैं

जहाँ चुनने बुनने सुनने के सभी दरवाजें बन्द हो जाते हैं इनपर
ये उस सात रंग के डिब्बे की रंगोली चुनती हैं

तुम्हे लगता है ये दरवाजे के बाहर सजा रही घर
पर ये घण्टों झुक कर बना रहीं है बगिया जहाँ ये फ़िल्मी हीरो के साथ हैं
ये बना रही है नदी और लहरें जहाँ ये पानी पर उठी लहर सी खिलखिला रहीं हैं
ये बना रहीं है पर्वत जहाँ सर्दी सफेद बरफ सी उतरी है इनका प्रेमी इन्हें अपनी बाहों में घेर रहा है
ये बसन्त पतझड़ के मौसमों से होतीं हुई
रंग के किसी तालाब में डूब रहीं हैं

ये सात रंग के डिब्बे को बार बार भर देती हैं
ये बार बार खाली होती है
घर की ड्योढ़ी पर

बार बार हकीकत के पैरों रंग बिखर जाते हैं
पर बार बार सुबह भी होती है …

9. ये देश है वीर जवानों का

अब आप आदत डाल लें जनाब
घर से बाहर जा रहे को छाती से लगा लें
उसके आने की उम्मीद न पालें
अगर शाम उसके आने की दस्तक होती है तो इसे देश सकारात्मक घटना की तरह देखे और आप हैरान होकर

अब आप आदत डाल लें
बच्चियों के बैग में चन्दा मामा खोजने के चक्कर में आपके हाथ कोई पोर्न किताब हाथ लगे
तो बच्ची को नाक कटने की ख़ातिर कुवें में न उतारें
बल्कि उसके मन में उतरें
और देखे की कौन रिश्ता उसे छल रहा
उसकी छातियों को मल रहा
लड़कियाँ चन्दामामा पढ़ती हैं तो देश चल ही रहा है ठीक ठाक
वरना आप कुछ भी नही कर सकते ज़नाब

बेटियां काला मुँह करा कर नही आ रही
वो घर के बाहर ही काली कोठरी में जा रही
वो उम्र नही देह से नापी जा रही
वो घर से बाहर जाएँ तो आप मन ही मन इनके नाम का तर्पण कर सकते हैं

ये भयानक खबरों का समय है
पहली घटना से दूसरी घटना पर हम शिफ्ट हो रहे
तबतक तीसरी और चौथी घटनाओं से राजनीती गरमा रही

हमारे देश में बाढ़ है
भुखमरी है
कालाबाजारी है
अस्पतालों में लाचारी है
बलात्कार की बढ़ती जा रही बीमारी है

एक बच्चे को पानी में सौपता पिता रोता नही है
एक आखिरी हिचकी पर काँपती ऊँगली वाली बच्ची को देख माँ की छाती नही फटती

हम वीरों की धरती से हैं
क़ुरबानी देना जानते हैं
हमे मरणोपरांत खबर बनाया जायेगा
हमारे हिस्से यही सिस्टम आएगा

ये फ़्रॉक को गोल गोल घुमा कर डरी हुई मुनियाँ घबरा रही
कहती है स्कूल नही जा रही
अंदर की चढ्ढि दिखती है
लड़के चिढ़ाते है

बात इतनी ही होती तो बात थी
पर इन नन्ही चढ्ढियों को देख किसी उम्र के अंकल भी मचल जाते हैं
रिक्शा वाला काँख में दोनों हाथ डाल जोर से उठा कर सीट पर बैठाता है
हाथ पर नील उतर जाता है

ये परियों की कहानियों का देश है
लक्ष्मी के पैर पूजे जाते यहाँ
और यहाँ ही उतारे जाते कपड़े
नंगी की जाती देह
उबाल खाती है वहशियत
यही गाया जाता ये गीत

ये देश है वीर जवानों का । इस देश का यारों क्या कहना

 

10. ये कहीं जा कर मर क्यों नही जातीं

क्या बनना चाहते हो
पर चुप रहती है लड़की
लड़का देता है अपने सपनों के हिसाब
लड़की मुस्कराती भाई की बात पर ताली बजाती

खूब सारी लड़कियां हैं जो कुछ नही बनना चाहती
वो बनी रहना चाहती हैं लड़कियां
वो घर को घर बनाने का जादू सीखती हैं
वो बन जाना चाहती है तकलीफों पर मरहम
तपते समय की माथे की पट्टियां बदलते रात बिताना चाहती है

वो बनना चाहती है अम्मा के खटिया का मजबूत पाया
पिताजी के अखबार पर बड़ा अक्षर बन जाती है
भाई के कड़वे हो गए जुबान पर मिसरी
ये पौधों पर फूल पेड़ों की छावं बन जाती है
ये चूड़ियाँ त्यौहार बनना चाहती हैं
ये दूब पनघट कुवां प्यार बनना चाहती हैं
खपरैल पर खिल जाती है बेहया फूल सी कभी
ये मिटटी की जमीन होना चाहती हैं

ये पांच मीटर की साडी में लिपटी हुई लाश बन जाती हैं ये कभी मातमी पलाश सी जल जाती हैं
ये अख़बारों में शोर सी नजर आती है
ये बस लड़कियां बनना चाहती थी
कारोबार बन गई

ससुराल से वापिस आई लड़की को देख कर
सर पकड़ लेते हैं पिता
भाई आँख दिखाता है
अम्मा समझाती है रोती हैं
दीवारे भरक कर गिर जाती हैं
ये लड़कियां बात बात पर नैहर क्यों आ जाती है
ये कही जाकर मर क्यों नही जाती….

 

11. मेरे पास योजना थी

मैं तुम्हें पत्रिकाओं के लिए लिखूंगा
तुम छप जाओगी
मैं तुम्हारे हाथ को देर तक थामे बैठूंगा
मैं लिखना चाहता हूँ इस अनुभव पर कोई कविता
मेरे हिस्से आये प्रेम ने मुझे विषय बना दिया

मैं बेचैन प्रेमी सा
दूरियों को परे हटाकर चूम रहा तुम्हारे होठ
तुम्हारी पीठ पर आश्वस्ति में सरकते मेरे हाथ
कुछ इंटेंस अनुभव से गुजरना चाहते हूँ
मेरी आने वाली किताब में रहना तुम

मैं छद्म में गले तक फंस गई
मैं तुम्हें आलिंगन करना सिखाउंगी
तुम प्यार से लैस किसी और के हो जाओगे
तुम्हारी कविता में आलिंगन आते ही
कोई काँटा गले में फंस जाता है

उसकी नजर पैनी दिमाग शातिर था
अपने खाली वक़्त को रंग से भरने वाला मुसाफिर था

मेरी उदासी की स्याही में मुस्कराकर डुबोता है कलम
मेरी देह से चुराए पलों से रंगीन संसार रचता है

भेष बदल कर तुमने कहा फकीर हूँ
रहा हूँ घर से दूर
प्यार को नही जानता
स्मृतियों में डरावनी कहानी है मेरे
रोक लो रुकना चाहता हूँ

मैंने। कील से ठोक कर रोक दी अपनी यात्रा
तुम जरूरत भर अनुभव लेकर
किसी और रास्ते के हो गए

मैंने जिंदगी के लिए चुना तुम्हें
तुमने मुझे कविता में चुन दिया..

 

12. हमारे पास भी ख्वाब है

आँखों में दुनियां देखने की ललक है
आईने के इश्क से निकलना चाहते हैं
हम प्यार में पड़ना चाहते हैं
एक बार जिंदगी को अपने तौर जीना चाहते हैं

मौत के भय से घर की दिवारें सुफेद हुई जाती हैं
लिखती हूँ तो नाफार्मरदार हुए जाते हैं शब्द
सही जगह नही बैठते
प्रेम लिखते ही ऐंठते हैं

एक समन्दर के स्याही से भरी दवात है
एक कोरी नीब वाली पेन भी
पटरी पर ककहरा लिखने से ककहरा सिखाने की लम्बी यात्रा में उम्र से ढ़ले हैं
तबियत है की नासाज़ हुई जाती है
मन है की टूटे तार का तानपुरा
इसे कसना चाहते हैं
ये सा प सा से झन्न से भर जाए उदासी का शून्य
कोई तो भुला राग याद होगा
किसी आरोह पर लड़खड़ा भी सकता है सुर
किसी अवरोह से उतरते सम्भल भी सकते हैं

कागज से रंगी जा रही है लड़कियाँ
औरतों की आँख में कोंख में पलने वालियों का खौफ है
ये कुसूरवार जात है
इन्हें चुप रहना सिखाया गया ये बोल रही हैं
इन्हें झुकने कहा गया
ये तान कर छाती चलने का दम भर रही हैं
समय छल कर रहा
बड़ी लम्बी लड़ाई की बलि चढ़ रहीं लड़कियों को हम डर डर ताक रहे
गिध्धो की नई नसल आदम के भेष में है
कुवें में बाल्टी डुबाओ तो नन्ही जान के चीथड़े निकल रहे
ये दिन इतिहास में सबसे डरावने दिनों सा दर्ज हो रहा

दूसरे पटरी की जिंदगी फिरोजी सफ़र पर है
प्रेम में गाल की भाषा गुलाबी हो रही
शब्द मुस्कान भर है
रास्ता बस तुमतक जा रहा
आवाज बस तुम्हारी सुन रही हूँ

जलती चिता का घाट होता है
जहाँ तिडकती जिंदगी राख हो रही
एक दीया डगमग कदम से किसी मन्नत से भरा कही जा रहा
कोई गंगा को चुनरी पहना रहा
लाल है आर पार
नावों पर ख्वाहिशें हैं सवार

मैं अकेली नदी में पैर डुबोये तुम्हारा इंतजार कर रही

ये दुनियां आग मिट्टी हवा पानी से बनी कोई इंतजार का धुन गा रही

प्रीत बिना जग सूना के धुन पर कोई फकीर मतवाला है
छले जाने के छाले से बेजार हूँ शायद
ये पक गए हैं
मैं लम्बी यात्रा में हूँ
मुझे चलना होगा…

(बकौल कवयित्री उनका नाम है जिंदगी, हम उन्हें शैलजा पाठक के नाम से भी जानते हैं। रहने वाली रानीखेत की हैं। पढ़ाई लिखाई बनारस। आजकल मुम्बई में । कविता की दो किताब “मैं एक देह हूँ फिर देहरी” और “चुप्पी टूटती है” । टिप्पणीकार दीपक सिंह छत्तीसगढ़ में प्राध्यापक हैं और जन संस्कृति मंच में सक्रिय हैं।)

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