युवा कविता की एक सजग, सक्रिय और संवेदनशील बानगी है निशांत की कविताएँ

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जब भी कोई नई पीढ़ी कविता में आती है तो उसके समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि वह अपने से ठीक पहले की पीढ़ी की कविताओं को किस तरह पढ़े. इस पढ़ने में उसकी अपनी अनुपस्थिति जरुरी है या उपस्थिति.

कवि का पढ़ना उसका लिखना भी होता है. इस कठिन-कविता के दौर में निशांत ने न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया है, बल्कि अपने से पहले की पीढ़ी की कविता को पढ़ने का ढब भी विकसित किया है.

बेरोजगारी, प्रेम, अकेलापन, संघर्ष और यारबासी- ये कुछ ऐसे विषय है जिससे हर युवा कवि जूझता है, लेकिन निशांत की कविताओं में इनका एक अलहदा रंग दिखता है. उसकी कविता में निजी अनुभव तो हैं- संभवतः उसकी पीढ़ी के तमाम कवियों में सबसे अधिक-लेकिन वह अनुभवों को एक ऐसी भाषा में बदलता है, जिसमें विशिष्टता बोध न के बराबर हो.

उसके पास सवाल हैं लेकिन वह उन्हें सवाल की तरह नहीं विडंबनाओं की तरह रखता है. जीवन कविता में वह कहता है “पृथ्वी घूमती है /घूमती ही रहती है…”
युवा कवि अक्सर इस तरह की भाषा को सवाल की तरह रखते हैं लेकिन निशांत उसे एक बेहद ठंडी बेलौस सी भाषा में रखता है. यह भाषिक ठंढापन उसकी सबसे बड़ी ताकत है.

आवेग उसकी कविता में कम ही आता है लेकिन यह भी नहीं है कि वह आवेगहीन कविता लिखता है. वह आवेग की गति को भीतर रोकता है और उस रुके हुए बोध से वह शब्द चुनता है-

मैं विस्मृत होता हूँ तुम्हे देखकर
मंत्रमुग्ध होता हूँ
प्यार कर।

यह विडंबना उसकी तमाम कविताओं में देखी जा सकती है. वह अनुभव के वैपरित्य को बार-बार सामने लाता है. यह वैपरित्य निजी अनुभवों में भी है और सामूहिक बोध में भी. निजता और सामूहिकता के बीच एक बेहद झीना पर्दा है. शब्द दोनों तरफ की भूमिका निभाते हैं.
अपनी कविताओं में कभी वह कवि निशांत बन जाता है तो कभी 28 साल का युवक. लेकिन निशांत होते हुए भी वह उतना ही उदास और बेजार होता है जितना 28की उम्र में घर, पिता,माँ और दुनिया को देखते हुए. वह देखते हुए, सोचते हुए और लिखते हुए अपने से बाहर आ जाता है, लेकिन अपने साथ अपने अनुभवों को भी लाता है –

दूसरों की सफलता से ज़्यादा ज़रूरी था
अपनी असफलता को रोकना
सफल होना मज़बूरी थी .

उसकी कविता मजबूरी का राग नहीं बोध पैदा करती है. युवा कविता के परिदृश्य में शोर अधिक है अनुभव पर यकीन कम. निशांत कविता के इस शोरगुल भरे माहौल में सिर्फ कविता पर यकीन करता है.

उसकी कविता दौड़ने से ज्यादा ठहरने की है.कई बार यह भी लगता है कि यह कवि एक ही रास्ते की कविता क्यों लिखता है- लेकिन ज्यों ज्यों वह कविताएँ लिखता जाता है उतना ही वह अपने रास्ते के प्रति दृढ़ दिखाई देने लगता है.

निशांत ने खूब लम्बी कविताएँ भी लिखी हैं. संभव है कि उन कविताओं में कहीं-कहीं  अधिक विवरण या अतिरिक्त विस्तार देखने को मिल सकता है, लेकिन उसकी लम्बी कविताओं में भी अनुभव पर ही जोर अधिक है.

मिथकों का सामान्यीकरण करते हुए उसने फैशनेबल लम्बी कविताएँ नहीं लिखी. उसकी लम्बी कविताओं की जमीन वही है, जो उसकी तमाम छोटी कविताओं की जमीन है .

भविष्य में निशांत की कविताएँ अपने सीमित दायरे में रहते हुए एक नया वितान रचेंगी -एक सजग सक्रिय और संवेदनशील कवि से यह उम्मीद तो की जा सकती है. – अच्युतानंद मिश्र

निशांत की कविताएँ-

 

1. ग्लोबल वार्मिंग

जहां एक पेड़ को होना चाहिए था
वहाँ एक हीरो-होंडा खड़ा है।

जहां एक हीरो-होंडा को होना चाहिए था
वहाँ एक सूअर का बच्चा खड़ा है ।

जहां सूअर को होना चाहिए था
वहाँ एक विशाल लंबा और महान आदमी खड़ा है ।

2. राष्ट्राध्यक्ष

एक घोड़ा था
अपने डैनों को खोले
उड़ा जा रहा था स्वपनाकश में

एक साइकिल थी
दौड़ी चली जा रही थी हवा में
ट्रिन ट्रिन की आवाज के साथ

एक मछली थी
रात को आकाश में उड़ी जा रही थी
देशों के बीच से

कुछ
अद्भुत से दिखनेवाले लोग थे
जोकरों की पोशाक में
उनके एक हाथ में पृथ्वी थी
दूसरे में एक चाबुक

रोज रात में
घोड़े को
साइकिल को
और मछली को
साँप की तरह एक बार डसते थे वे

पृथ्वी को उछालकर
चाबुक से पिटता था मुझे किसी किसी दिन
दिन में उनमें से कोई बौना सा आदमी ।

3 प्रमाणपत्र

पिता जी पेंशन के लिए
जिंदा रहने का प्रमाणपत्र लेते रहे
जब तक जिंदा रहे

मैं जिंदा हूँ
इसे बतलाने के लिए
बार बार पॉकेट से निकालकर
दिखलाता हूँ अपना फोटो प्रमाणपत्र
सब मान लेते हैं-मैं जिंदा हूँ !
वही हूँ ,जो फोटो में हूँ !

रात के अकेले में
वह मेरे ऊपर शक करता है
मांगता है मुझ से
मेरे जिंदा होने का प्रमाणपत्र
मेरे मनुष्य होने का प्रमाणपत्र

वह कागज के टुकड़ों को नहीं मानता
मेरी नब्ज नहीं टटोलता
मेरा चेहरा भी नहीं देखता
वह हर रात सीधे मेरी आँखों में झाकता है और
हर रात मुझे मृत घोषित करता है.

4. इस समय

बाज के डैने पर सफेदी पुती है !
गौरैया अंडे देना बंद कर रही है !

हवाई जहाज में
टावर नहीं पकड़ रहा है मोबाइल का !

कंप्यूटर से एक जानवर निकलता
और ठप्पा लगाकर वापस चला जाता कंप्यूटर में
दो आँखों की बीच वाली जगह में !

पृथ्वी ,तलाश रही है
थोड़ी-सी जमीन
बैठकर सुस्ताने के लिए ।

5. अंदर कोई नहीं है

किसी बात का इतना सरलीकरण ठीक नहीं
कुछ भी कर के देखने के लिए
नहीं करना चाहिए कुछ भी

एक छोटे से कस्बे से उड़ते उड़ते एक कागज
सुप्रीम कोर्ट में जाकर गिरता है
न्याय एक भ्रम है

आजकल ज्ञान की आँधी से
भ्रम की टांटी और मजबूत होती है
अहंकार उत्पन्न करता है ज्ञान

दो लोगों के बीच प्रेम
सच और झूठ की तरह है
है भी और नहीं भी

क्या करेगा कोई ऐसे समय में
किसका दरवाजा खटखटाएगा
लोग घरों में है और बाहर बोर्ड टंगा है
अंदर कोई नहीं हैं।

6. काला जादू हो तुम

एक बच्ची सी हिरणी की तरह है
तुम्हारा चेहरा और
एक परिपक्व शेरनी की तरह है
तुम्हारा व्यवहार

बारिश होती है
झम झम झम भीतर
एक बांध टूटता है
तुम्हारा लिलार
आँखे गाल होंठ कान गला बुबू कन्धों को
चूमता हूँ
तनती है तुम्हारी देह
चम चम चमकने लगती है तुम्हारी त्वचा

अद्भूत !
अद्भूत है यह संयोजन
प्यार आता है तुम पर
डर लगता है तुम से

समुद्र की तरह हरहराती हो तुम
सुराही की तरह है तुम्हारा मीठा जल
कितने आकाश है तुम्हारे पास

क्या हो तुम ?

जादू हो तुम !
काला जादू !

मैं विस्मृत होता हूँ तुम्हे देखकर
मंत्रमुग्ध होता हूँ
प्यार कर।

7. अनवांटेड 72

वह शुरू से ही इसके खिलाफ थी

पहले थप्पड़ मारती
फिर रोते हुये कहती
-क्यों करते हो ऐसा ?
-अभी इस काबिल नहीं हुये हो
की मेरे बच्चे को अपना नाम दे सको
-प्लीज ,ऐसा मत किया करो
और मेरे गले से लटक कर
फिर रोने लगती

मैं अपनी नजरों मे ही गिरने लगता
इतना गिरता ,इतना गिरता
की गलीज होने लगता
उसी तरह पिचपिचा और गँधाता हुआ

समय इतना काला है
की किसी को कुछ नहीं दिखता
हत्या जीवहत्या आत्महत्या परहत्या भी नहीं

इस समय
अपने दुखों के साथ
अभिशप्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं हम
समय की गोद मे ऐंठती है हमारी देह
दम तोड़ देता है हमारा भविष्य

यह अनवांटेड-72 टैबलेट नहीं
दैवीय फल है
इसे मुंह में रखकर
हर बार मौत के मुंह से बाहर निकलते हैं हम
हमारी पीढ़ी को बतला दिया गया है
सत्तर रूपए में
बहत्तर घंटे जीवन जीना असंभव है
असंभव है सत्रह हजार की नौकरी का फार्म भरना
संभव है अनवांटेड-72 पाना
इस काले समय में
इस उम्र में ।

8. नैपकिन

1
खून अगर लाल हो
हिंसा का आनंद आता है
खून अगर काला हो
लाश के साथ संभोग करने की वितृष्णा
पैदा होती है अंदर

सफ़ेद नैपकिन
आमंत्रित करता है हिंसा के लिए
काला नैपकिन
हत्या करता है आनंद की उन्मादकता का

दुनिया
दो धुर्वों में बात गई है
सफ़ेद नैपकिन
काला नैपकिन ।

2
तुम्हारे लिए
यह भी
सुख को उपभोग करने की
एक उन्मादक विधि है

हमारी यंत्रणाए
और
हमारा खून

दर्द से
दुखता हुआ हमारा शरीर
रक्त छोड़ता हुआ हमारा अंग और
अंधेरे में विस्थापित
एक काला नैपकिन
तुम्हारी परपीडक मानसिकता को
परितृप्त करता है

हमारी यह लज्जा
साधारण आत्मविश्वास में तब्दील नहीं हो पाती
दुनिया में इतने आंदोलनों के बावजूद
आंदोलनों का इतिहास
वहीं से शुरू होता है
जहां से फूटती है रक्त की धार

हमारे रक्त छोड़ते अंगों से डरनेवाला पुरुष
हमारे रक्त रहश्यों को जानने के बाद
लांक्षित करता है हमें
धमनियों में बहनेवाले रक्त को अपना नाम देता है
भूल जाता है वह
वीर्य का रंग सफ़ेद और लिजलिजा होता है
उसे उसी खून से पिता बनती है हम
जो लगा है इस काले नैपकिन में

उड़ाती हूँ इसे मैं इतिहास की किताब में
इंडिया गेट की मशाल में
अमेरिका के व्हाइट हाउस में
ब्राज़ील के फुटबाल के मैदान में
मंदिर मस्जिद गिरजाघर में
एक काला खून छूटा हुआ नैपकिन

इतना सब होने के बावजूद
अभी भी
दुनिया दो धुर्वों में बटी है
सफ़ेद नैपकिन
काला नैपकिन ।

3
पेड़ों पर टांग दिये हैं नैपकिन
गदर में पेड़ों पर टांग दिये सिपाही की तरह
अली गली सभी जगह ,पूरे कैम्पस में
रातों रात चिपका दिये गए नैपकिन
जैसे होली दिवाली की सरकारी शुभकामनाओं के पोस्टरों से
भर दिया जाता हैं शहर

अपने हक की लड़ाई लड़ रहीं हैं हम
संवैधानिक दायरे में रहकर
सरकार और समाज
हमें आतंकवादी नजरों से देखते हैं
हमें अराजक कहते हैं
पेड़ों पर टंगे नैपकिनों को
असंवैधानिक लड़ाई कहते हैं

एक साधारण सी क्रिया
एक पुरुष की जगह
एक स्त्री घोषित करती हैं हमें

एक स्त्री होने के घोषणे के खिलाफ
सिंदूर और मंगलसूत्र की जगह
सर पर चिपका लिया हैं नैपकिन
गले में पहन लिया हैं नैपकिन

पुरुषों का सम्मान करती हैं हम
हम नैपकिन महिलाएं ।

4
माँ ऋतु स्त्राव कहती है
बड़े नियम कानून से रहती है
पिता माँ की गिरफ्त में रहते है

दुनियाँ के सारे पुरुष
गुप्तांग भेद कर रक्त बहाने को
विरोचित भाव से बतलाते हैं
स्वेच्छा से बहते हुये रक्त से डरते है
रक्त के इतिहास को गंदला करना चाहते हैं
सफ़ेद लिजलिजे से हमें बांधना

इस खून से हमारे अंदर कुछ भी नहीं बदलता
कहीं कोई ऋतु परिवर्तन नहीं होता
बस शर्म को जबर्दस्ती लाद दिया जाता है
हमारे देह के घोड़े पर
एक सफ़ेद नैपकिन बनाकर
इसमें शामिल है माँ भी
दीदी और दादी भी
भाभी चाची मामी मौसी नानी बुआ भी

मैं अपनी बच्ची को शर्म नहीं
नैपकिन दूँगी
सफ़ेद नैपकिन
काला नैपकिन ।

5
माँ ने ऐसी शिक्षा दी है
न चाहते हुये भी
अपने को मानती हूँ अपवित्र

पैरों से बहती है खून की नदी
होती हूँ पवित्र

तीन दिन चार दिन
पाँच दिन त्वचा रहती है खुश्क

फेसबुक पर लगती हूँ
लाल नैपकिन का फोटो
होती हूँ खुश

सफ़ेद नैपकिन को कहती हूँ
टा टा बाय बाय फुस्स ।

9 ओ नहीं,पीरियड कहो

मेरा दोस्त कहता है –
कल से बहुत चिड़चिड़ी हो गई है ।
‘ओ’ हुआ है क्या?

मैं ज़ोर से डाटती हूँ –
‘ओ’ नहीं हुआ है ।
पीरियड हुआ है ,पीरियड ।

हिन्दी में कहते शर्म आती है
तो अँग्रेजी में कहो
जैसे अक्सर झड़ने के बाद कहते हो –
“ डोंट से एनिथ्हिंग ।
आई एम डेड।“

10. तलाक- 1

परिवार के दुख से
सबसे ज्यादा लड़कियां दुखी होती हैं
होती है मां, बहन, पत्नी, बेटी, दादी

आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी देन है तलाक
कहती है वकील
कहती है महिला मजिस्ट्रेट
कहती है सरकार और पुलिस
कहता है एक पुरूष

दुख में सबसे ज्यादा लड़कियां दुखी होती हैं

तलाक- 2

महिला मजिस्ट्रेट
जितना मैं लिखती हूँ तलाक
हत्या करती हूँ अपने ही किसी ‘मैं’ की

वकील :
जितनी बार मैं दाखिल करता हूँ ऐसा केस
एक्सीडेंट में क्षत- विक्षत शव को लेकर दाखिल होता हूँ
किसी नर्सिंग होम में

पुलिस :
जितनी बार कोई आता है
मेरे पास यह शब्द लेकर
लगता है कोई अनाथ बच्चा
भूल गया हो अपना घर

पुरूष :
सभ्यता समीक्षा में लिखा गया
भावना पर भारी पड़ा वर्तमान
वर्तमान पर भारी पड़ा मनुष्य
मनुष्य का मैं

तलाक-3

सिर्फ महिलाएँ ही नहीं भोगती हैं यंत्रणा, लांछना
पुरूष भी उतने ही भागीदार होते हैं
कही कहीं कुछ ज्यादा ही

दो व्यक्तियों के मिलकर रहने के फैसले में
शामिल नहीं हुई थी सरकार
पुलिस, वकील, पैसा, श्रम, समय
दुख और न ही यंत्रणा

प्यार या प्यार जैसा कुछ था
जिसमें शामिल था आकाश या आकाश जैसा कुछ बड़ा- सा
या कुछ और जिसका नाम नहीं दिया जा सकता
सिर्फ महसूस किया गया था कुछ- कुछ वैसा ही

अब शामिल है इसमें प्यार, तकरार, हिंसा जैसा कुछ
कुछ- कुछ मालिकाना हक या तानाशाह जैसा कुछ
कुछ- कुछ भागते हुए चोर और पुलिस जैसा कुछ
वास्तव में मनुष्य
जो कानून की परिभाषा में पति- पत्नी जैसा कुछ है
तय नहीं कर पाता कि कौन है चोर
कौन है पुलिस
किसमें है पति के गुण
कौन रहता है पत्नी की तरह

पति जैसा आदमी कोर्ट से बाहर आकर कहता है :
‘अपने से हारल, मेहरी के मारल
केकरा से कही? ’ और मुस्कुरा देता है फिच्च से

पत्नी जैसी महिला गाती है गीत :
‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’
और फेसबुक पर अपलोड करती है एक फोटो जैसा कुछ
उसमें एक लड़का
एक लड़की की तरफ बढ़ाता है गुलाब जैसा कुछ
जब स्टेशन से गाड़ी खुल चुकी होती है

तलाक- 4

तलाक की अंतिम परिणति क्या होती है?

कौन जीतता है?
कौन हारता है?

अंततः मुक्त होता है कौन?
पाता क्या है कोई?
पाना खोना मुक्ति जीतना हारना खुशी गम प्यार
शब्दों में जल जाते हैं

‘तलाक आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी देन है’
किताबी भाषा में तब्दील हो जाती है यह पंक्ति
सभ्यता व्यक्तिकेंद्रित हो गई है
इस समय

11. गपशप

कमरे में
मेरे अलावा दो मछलियाँ हैं

घंटों बतियाती हैं वे मुझ से.

12. 15 अगस्त 1947

हाथ धोते धोते याद आया
सुबह बिना हाथ धोये खा लिया था रोटी सब्जी

सब्जी खाते वक्त
याद आई थी माँ सुबह सुबह

सुबह से याद आया
दादा जी बतलाते थे
रात को सोया था हिंदुस्तान में
सुबह पाकिस्तान में खुली थी नींद .

13. झण्डा ऊँचा रहे हमारा

देश का सबसे बड़ा हत्यारा
राजधानी में झण्डा फहरा रहा है ।

गली का सबसे बड़ा गुंडा
गली में झण्डा फहरा रहा है ।

लोग ताली बजा रहे हैं
लड्डू खा रहे हैं ।

राजधानी में बैठा एक बुढ्ढा कवि
गली का युवा कवि और
झंडे के पीछे छिपा पुरस्कृत कवि
कुछ शब्द उच्चारते हैं
कोई धमाका नहीं होता

आजादी के इतने सालों में
शब्दों से निकल गया है उनका रसायन
सिर्फ जबानी प्रतिकृया होती है
कोई धमाका नहीं होता

हत्यारे झण्डा फहरा रहे हैं
गीत ग रहें हैं
-झण्डा ऊँचा रहे हमारा …

14. मुंतजीर अल जैदी

मैं
मुंतजीर अल जैदी हूँ ।
मैंने ही जार्ज बुश पर
जूता फेका था ।

आप भूल जाए
तानाशाह मुझे याद रक्खे ।

तानाशाह
जब तक बनते रहेंगे
मैं भी रहूँगा
मैं, मुंतजीर अल जैदी ।

15.समुद्र के सामने जाने पर

समुद्र के पास पहुचकर पता चला
कितना ?
कितना बड़ा है आसमान !

कितना ?
कितना बड़ा है समुद्र !

और
कितने ?
कितने छोटे है हम
घर के एक पानी के नल से भी छोटे

सच्चाई क्या है ?
किसे सच माने बैठे है हम !
पानी के लिए
चपरासी पर हुक्म चलाते हुए

समुद्र के सामने जाने पर
चपरासी के सामने
शर्म से झुक जाता है मेरा सर .

16. गौरीपुर की एक सुबह

चूल्हे से उठता हुआ धुआँ
पूरे आसमान में फैल गया है

एक काली लड़की
अच्छे पति की आशा में
सोमवारी कर रही है

माँ की आँखों में
धुए जैसी उदासी बैठी है

थोड़े से लाल
थोड़े से गुलाबी
और थोड़े से हरे रंग की जरूरत हैं
इस चित्र में ।

17.जीवन

बिस्तर पर
एक जोड़ा पैर पड़े हैं
एक जीवित व्यक्ति के

बहुत ही ऐसे कम छण आते हैं जीवन में
जब पुराने को याद करके
एक लड़का रोता है

एक बच्चा जन्म लेता है और
बूड्ढा हो जाता है
माँ है उसकी चिर यौवना

बार-बार ‘समय’ को याद रखने के लिए
तारीख देखना पड़ता है

पृथ्वी घूमती है
घूमती ही रहती है …

18. शादी की उम्र में नौकरी की चिंता

चौबीस साल
पच्चीस साल छब्बीस साल
उनतीस साल इकतीस साल
तैंतीस साल और अब पैंतीस साल
इतनी उम्र कम नहीं होती शादी के लिए
अब तो शादी कर लो बेटा- घरवाले फोन पर कहते
इसी डर से जल्दी घर नहीं जाता
किसी की शादी में तो एकदम नहीं

छोड़ो उसे
और उस प्रसंग को
घरवालों को कहो
या कहो तो मैं देखुँ – बड़े भाई कम
दोस्त सरीखे गौतम दा कहते

जुनियर संजय ने मजाक में ही सही
पर एकदिन कह ही दिया
भैया कर लीजिए शादी, नहीं तो
एक्सपायरी डेट में चले जायेंगे

कुछ काम समय से हो जाना चाहिए
उन्हें समय से कर लेने में ही भलाई है
जैसे शादी
जैसे नौकरी

बात यह नही है कि मैं नौकरी कर रहा हूँ
बात यह है कि उस नौकरी में पैसे बहुत कम है
एक बार हंसते हुए गुरूवर केदारनाथ सिंह से मैंने कहा था
गुरू जी इतने कम पैसे में बीवी छोड़कर भाग जायेगी
वे भी हंसने लगे थे
एक अहिंसक चमकीली हंसी

जब क्लास में बी. ए के बच्चों को
अपना परिचय देते वक्त कहता हूँ –
मैं बिजय कुमार साव
एम.ए, एम.फिल, पिएच.डी फ्राम जे.एन.यू
यहीं कॉलेज के बगल में रहता हूँ
उम्र छत्तीस साल
अभी तक कुंवारा हूँ
तो बच्चियों की आँके बड़ी-बड़ी हो जाती है
तब मुझे वो विज्ञापन याद आता
मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता
,.कई बच्चों ने पूछा –
सर अभी तक शादी क्यों नही किए
मैं हारकर कहता – हाथी खरीदने से ज्यादा
उसके खुराक का जुगाड़ कर लेने में बहादूरी है
इस तरह पहले दिन से क्लास जमने लगता

बच्चों को पहले बतला दिया करता था
मैं सिर्फ सोम मंगल बुध आता हूँ
पार्ट टाईमर हूँ और मेरी तनख्वाह
नौहजार चार सौ पचास रूपये है और यह सरकार
नेट स्लेट जे आरएफ पी.एचडी किये हुए हम बच्चों से
ठेके के मजदूरों की तरह करती है व्यवहार
ज्यादा खटवाकर कम देती है पैसे
तो उनकी निगाहें बदल जाती थी
एक शिक्षक से
एक बेचारे की तरह दिखने लगता था मैं उन्हें

एक आश्चर्य की बात बतलाऊँ
तब बेचारा जैसा ही पढ़ाने लगता था उन्हें

अब कहता हूँ – दाल रोटी भर मिल जाता है
तो कर लीजिए सर शादी
हाँ, हाँ बस सब्जी का जुगाड़ हो जाए
तो कर लूंगा शादी
और बच्चे हँसने लगते
लड़कियाँ कुछ ज्यादा ही खी खी खी करके

कलकत्ता ही नहीं
वहाँ त्रिपुरा छत्तीसगढ़ और दिल्ली तक में
उच्च शिक्षा को
मजदूरों की भेड़ में तब्दील कर दिया गया है
तीन स्थायी पद के लिए
चार सौ दो अभ्यार्थियों को बुलाया जा रहा है
मेरी एक क्लासमेट का इसी चक्कर में ब्रेकअप हो चुका है
कई बच्चे का रिस्क नहीं ले रहे है
पढ़ने लिखने छपने से हमारा विश्वास उठता जा रहा है
और सरकारें कहती है
सरवाईवल ऑफ द फिटेस्ट

इतना पढ़ने – लिखने का क्या मतलब हुआ?
अब पिता नहीं पूछते
खूद से पूछने लगी है आत्मा
मुटिया – मजदूर बनने तक की ताकत
चुरा ले गई है यह पढ़ाई
अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया मुक्तिबोधीय पंक्ति
बड़ी मौजूं लगने लगती है
इस पढ़ाई के संदर्भ में

कभी कभी बी.ए के न बच्चों को देखकर
बड़ा ही दुखी हो जाता है मन
बच्चों को बेहतर बनाने का लक्ष्य
इस पूँजीवादी व्यवस्था में
खो गया है कालनेमी की गुफा में
जो मशीन नहीं बन सकता
वो मरने के लिए तैयार रहे या
किसी मानसिक बीमारी के घर में रहने के लिए

दूर के ढ़ोल बड़े सुहावने लगते हैं
जब टूटेगा यह भ्रम
तो क्या होगा इन बच्चों का सोच कर
क्लास रूम में माथे पर चुहचुहा आता है पसीना
बच्चे पूछते हैं – सर तबीयत तो ठीक है?
मैं कहता हूँ – हाँ, गर्मी बढ़ गई है, आजकल

जनसंख्या एक बड़ी समस्या है
या भ्रष्टाचार
या भाई भतीजाबाद
या गुरू चेला प्रभाववाद
या पर्वत पठार सौन्दर्यवाद
समझ में तो सब आता है
पर समझ भी नहीं पता

इतनी नौकरियों की भीड़ में
एक मनचाही नौकरी चाहिये
एक नौकरी हो जाती तो शादी भी हो जाती ।

19.कोटा

1
वे इतने भोले होते हैं
किसी गैंग में शामिल नहीं होते
कोई नशा नहीं करते
घर –घरवालों और अपने बारे में सोचते सोचते
एक दिन महज शरीर में तब्दील हो जाते हैं

वे पढ़ने आते हैं
पढ़ते पढ़ते लड़ाकू हो जाते हैं
कुछ पढ़ाकू भी
दीन –दुनिया से कट जाते हैं
कौन सा भूत है जो शिकारी कुत्ते सा
उनका पीछा करता है

दौड़ते दौड़ते वे कोटा पहुचते हैं
जिसे जीत समझते थे
वह तो एक बूंद भी नहीं है इस संसार के लिए
तब बौद्धत्व की प्राप्ति होती है
ज्ञान से जिंदगी में सब पाते पाते
सब खो गया
सिर्फ औया सिर्फ
देह को कमरे से बाहर निकाला गया
ज्ञान कोटा में ही रह गया

2
वे क्या बनना चाहते थे
उन्हें नहीं पता था
जब पता चला
वे कोटा पहुँच चुके थे

एक लड़की अपने पिता की तरह बनना चाहती थी
माँ नफरत करती थी उसके पिता से
एक लड़का माँ बनना चाहता था
पिता के साए से दूर रहना चाहता था
छोटी छोटी इच्छाओं में कैद होकर
वे यहाँ पहुचे थे

दूसरों की सफलता से ज्यादा जरुरी था
अपनी असफलता को रोकना
सफल होना मज़बूरी थी
लज्जा के कीचड़ में गिरने से बचने के लिए
सफलता से पहले वर्जित था
प्रेम के फल का बढ़ना पकना चखना
पढ़ रही थी वह
दांव पर लगी थी परिवार की सफलता

‘लगा चुनरी में दाग घर जाऊ कैसे ‘
सुनते सुनते सो गई एक पूरी गैंग
लड़कियां भावुक होती हैं
वो लड़की भी गई इस संसार से
जिसके सामने सारी दुनियां
अपने इलाज के लिए झुकाती सर
इतना प्यार वो अपने माँ बाप और अमेरिका रहनेवाली
आइआइतियन बहन से भी नहीं कर पाई थी !
बेचारी लड़की !

चार माएं –पांच बाप रो रहे थे
एक भाई चुपचाप अपनी माँ को कोस रहा था
बहन की हत्या के लिए
खुद को जिम्मेदार ठहराते हुए

अभाव में स्वभाव ख़राब होता है
महत्वकांक्षा में व्यक्ति
सफलता से नहीं लोभ से भ्रष्ट होता है मस्तिष्क
दरअसल सारे लोग
पैसा छापने की मशीन लाना चाहते हैं
बच्चों को कोटा पहुँचाना चाहते हैं

बच्चे क्या बनना चाहते थे
उन्हें पता नहीं था.

3
चौदह साल की उम्र में
अकबर ने इस देश की बागडोर संभाल ली थी
शिक्षक पिता
इतिहास की किताब पढ़कर सुनाता है
बेटा दसवीं की परीक्षा देगा
कोटा जायेगा

लड़का पिता को देखकर मुस्कुराता है
दरअसल वह अकबर नहीं
अकबर का पिता बनना चाहता है
इतिहास की किताब में जाकर

पिता खांसते है
उनका खांसना पूछना है-ध्यान किधर है ?
वह सर झुकाकर
पढ़ने लगता है सामने खुली गणित की किताब

उसकी इच्छा अकबर बनने में नहीं
उसके बाप बनने में है .

4
हमारे ज़माने के व्यंग्य और अपमान
तुम्हारे ज़माने में भी
लदे रहते हैं हमारे कन्धों पर बेताल की तरह
तुमने कहाँ देखे हैं हमारे घाव
घाव के अन्दर रेंगते हुए कीड़े

सारे दुःख हमने झेले हैं
कष्टों को फूल
परेशानियों को धूल समझा है इसके लिए
जीवन को जीवन नहीं पानी समझा था और
पानी की तरह खर्च किया था तुम्हारे लिए

पानी पानी पानी
हाय पानी
पानी ने छीन ली जिंदगानी
हाय पानी
‘कोटा’ का पानी
‘जनरल ‘वाले तो मरेंगे बिना दाना-पानी कहनेवाले
अपने दर्द को नहीं
अपनी कमजोरियों को ढकने का
एक आसान सा पत्थर उछालते है आसमान की तरफ
अधजल गगरी छलकत जाए की तरह .

5
हमारी इच्छाओं के जंगल में
हमने भटका दिए अपने अकबरो को
दरअसल हमने सम्मान और रुआब के चक्कर में
चुकाए है जीवन

क्या करते ?
हम अपनी जिल्लत को भूल नहीं पा रहे थे
देख नहीं पा रहे थे
आबादी और नौकरी का औसत
‘सर्वाइवल ऑफ़ दि फिटेस्ट ‘को मंत्र की तरह पढ़ाते
भूल गए थे
हारनेवाले को मरना भी पड़ता है

सबके लिए नहीं
अपने लिए जीवन की तमाम सुविधाओं की मांग ने
बनाया हैं हमें
हत्यारा डकैत और लूटेरा

हम समाज को लूटते हैं
लूटते हैं देश के भविष्य को
अपने बच्चे की जिंदगी लूटते हुए
शर्मशार होते हैं हम

हम कोटा नहीं बनाते
तृतीय विश्वयुद्ध के लिए हथियार बनाते हैं .

20.कमीज में शरीर

एक दिन में
मैली हो जाती है कमीज

शरीर को
कपड़े से लत्ता बना
पहनती रहती है कमीज
कटता रहता है जीवन ।

(कवि निशांत बहुत समय से कविता लेखन में सक्रिय हैं और कविता के लिए उन्हें प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार 2008, शब्द साधना युवा सम्मान 2010, और प्रथम नागार्जुन कृति सम्मान 2009 मिला है। कविता संग्रह  ‘जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा’ एवं लम्बी कविताओं का संग्रह ‘जी हां लिख रहा हूँ’ प्रकाशित ।  फिलहाल काज़ी नज़रुल इस्लाम विश्विद्यालय में प्राध्यापक हैं। टिप्पणीकार अच्युतानंद मिश्र जनमत पोर्टल के नियमित लेखक और समकालीन युवा कविता का चर्चित नाम हैं.)

संपर्क :निशांत : nishant.bijay@gmail.com

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