रेतीले टिब्बों पर खड़े होकर काले बादलों की उम्मीद ओढ़ता कवि : अमित ओहलाण

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कविता जब खुद आगे बढ़कर कवि का परिचय देने में सक्षम हो तो फिर उस कवि के लिए किसी परिचय की प्रस्तावना गढ़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती.

कविता की पहली पंक्ति ही यह पता दे कि कवि उस ज़मीन में जीवन रोप रहा है जहाँ उसने किसान की सहज बुद्धि और श्रम के साथ मौसम की भंगिमाओं को जाना है, वह जानता है कि बीजों की गुणवत्ता के साथ-साथ, पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे के बीच कितनी दूरी रखी जानी चाहिए, उसे ज्ञान है कि किन फसलों की बुआई के समय कम तापमान और उसके पकने के वक़्त खुश्क और गर्म वातावरण की जरुरत होती और उसने यह भी विचार लिया है कि रबी में उगने वाली फसलों, गेहूं, चना, जौ, सरसों या चना में से इस बार किसे चुनना है या और फिर खरीफ की फसलों बाजरा, धान, मूंग, ज्वार में से इस बार किसकी बारी है. अक्तूबर-नवम्बर के सुहाने महीनों में जब लोग दिवाली को रोशनी की बाट जोहते है तब भी कवि फसल, मौसम, आँगन में बंधे पशुओं के बारे सोचता है. बारिश के दिनों में अपनी माँ के साथ उसे बटोरने में भी साथ होता है, यतन से जचाये उपलों के भीग जाने की फ़िक्र भी होती है.

वह उस प्रदेश की रेतीली धरती का किसान है जहाँ बारिश बहुत कम होती है, हरियाली के नाम पर कीकर के कांटेदार पेड़ नज़र आते हैं, त्वचा को छील देने वाली लगातार चलने वाली लू में वह बड़ा हुआ है. यही कवि का जन्मस्थान है और यही उसकी कविता का कर्मक्षेत्र-

कीकरों का गाँव था, लू से झुलसा हुआ
वहां, जहाँ मेरा जनम हुआ
कोई सिन्ड्रेला स्टोरी नहीं थी
बारिशें बस बरसती थी
कभी कभी सावन में
या दो दफा सर्दियों में
बाग होने चाहिए थे
बागों की कमी थी
कुछ लाजवाब नहीं था यहाँ-
लोगों की बातों में वजन जरुर था
मगर अहम् से कम
पंचायती दकोसले थे
डेमोक्रेसी से दोयम
जहाँ खेती निवाला थी
नौकरी हराम,
कीकरों का गाँव था
लू से झुलसा हुआ,
एक किरकिरा सुकून
खीरों की ठंडक
पूड़े गुलगुलों का स्वाद
मिट्टी, मोरी ,जोहड़
तितर, मोर ,काबर।

मगर
जैसे गायब हो गयी
चिट्ठी और घड़े
और
कच्चे रास्ते
देश में गाँव भी गायब हो चले

अपने भीतर की संवेदनाओं को जमीन की करवटों से साझा करता यह अल्हड कवि जो कवि होने के अपने परिचय देने से झिझकता, शर्माता अपने खेतों की तरफ जाता है जहाँ धरती प्यासी है, आज रात अपने खेतों को पानी देने की बारी है, पहले वह धरती को उसकी प्यास लौटाएगा और इसी प्रक्रिया में उसके भीतर भी एक कविता अंकुरित होगी और अन्न पकने से लेकर उसे काटे जाने की प्रक्रिया के दौरान किसी भी समय वह कागज़ पर अपने पैदा होने के घोषणा कर देगी.
कविता का काम स्म्रतियों, सम्वेदनाओं, उम्मीदों और सपनों से ऊर्जा समेटकर कवि के भीतर के उस कोने को बचाए रखना है जिसपर दुनियादारी की नज़र है.

एक कवि, अपनी कविता रचते समय उसी कोने से कच्चा माल ले कर प्रस्तुत होता है, कवि को उसकी थाती लौटते समय भीतर का वह कोना उस वक़्त चमक उठता है जब वह संभाल कर रखी अनुभूतियों को उसे लौटा देता है ताकि एक कवि उसके भीतर अपना असली परिचय पा ले. एक कवि, कविता के रूप में अपनी आदमकद अनुभूतियों को ही सामने लाता है, अमित ओहलाण का कवि किसान के साथ-साथ एक दार्शनिक कवि है जो लगातार सवाल करता है उसने गाँव से महानगरों की यात्राएँ की है जीवन को समझा है अपनी तरह से उसकी विवेचना की है, बनावटी प्रतिरोध उसके यहाँ नहीं है बस जीवन को समझने की ललक है जो उसकी कविता के फ़लक को पारदर्शी बनाए रखती है.

कवि ने अपने दादा अपने पिता को खेतों में अपना पसीना बहाते हुए देखा है, पुराने समय में जहां संसाधनों की कमी के चलते बेंड़ी, रहट और ढेकुलि से सिंचाई हुआ करती थी और आज के आधुनिक समय जहाँ किसान सोलर पंप, ट्यूबवेल आदि से सिंचाई करते है वह गवाह रहा है वह जीवन के हर पक्ष को जमीन से जोड़ता है और जब खेतों से दूर होता है तो उसका दार्शनिक पक्ष उजागर होता है.

अमित ओहलाण की कविताएँ पेड़-पौधों के साथ जश्न मनाती हैं, प्रकृति के साथ इंसान के संबध मजबूत करती है उनके यहाँ प्रकृति के कई पहलू अक्सर जीवन के लिए रूपकों और प्रतीक गढ़ते है.

उसका परिप्रेक्ष्य जमीन है, किसान हैं जो इस सेलिब्रिटी केंद्रित युग में हाशिए पर धकेल दिए गए हैं. चुनावी घोषणापत्र में किसानों के सरोकारों के बोलबच्चन के साथ सत्ता पर काबिज़ सरकारी प्रतिनिधियों का चेहरा काला कर उनपर जूते-चप्पल बरसा कर जनता थक चुकी है वह अपने भीतर एक क्रांति को संभाले हैं जिसे किसी चिंगारी की जरुरत है.

अमित की कविताएँ इसी क्रांति का पता देते हुए किसानों की मेहनत की दुहाई देती है, जिसका श्रम हमारी रगों में लहू बन कर हमें ऊर्जा देता रहा है मगर हम अभी भी चुप हैं क्योंकि हमारी नज़रे चमक पर है अंधेरों पर नहीं. ~विपिन चौधरी

 

 अमित ओहलाण की कविताएँ-

 

जिसे समझ आती हो कविताएँ

संभव है वह नहीं जानता हो
पसीने के बारे में
पसीने में नमक के बारे में
नमक में मेहनत के बारे में
मेहनत में संशय के बारे में

जिसे समझ आती हो कविताएँ
और जो गाता हो दर्शन
संभव है वह नहीं जानता हो
शव के बारे में
कि बारिश में कैसे चिता जलाई जाए
कहाँ से जुटाया जाए इंधन

जिसे शब्दों का अभिमान हो
शायद वह नहीं जानता हो
उस गाँव के बारे में
जिसे वह लिख रहा हो

 

यात्री

बौराये से घोड़े पर
ग़रूर की जीन टांक
ज़बान पर चढ़ाये अख़लाखी चाशनी
अन्तहीन सपनों के बस्ते लिए

नापते है शहर
सड़क के बाद दूजी सड़क

हर बार चुरा लेते है
होटल से माचिस
आवाज़ों के मालिकों से कहानियाँ
लड़कियों से हंसी पसीना और उदासियाँ

रास्तों के खर्चे
थकावट के पहर
और थोड़ा कहीं गवांकर
सिर्फ़ रह पाती है, झपकी शेष .

यात्री के स्वाद मौसमी तो नहीं होते –
कोई खोज है
जो मुमकिन नहीं

फिर भी यों ही
बौराया सा घोड़ा लिए
ग़रूर की जीन टांक
मार एड़ी खींच कर !

 

तितलियाँ सड़क पार करती हैं

बचपने से
तितलियाँ उछाल लेती हुई
सड़क पर आती हैं
और मारी जाती हैं

तितलियाँ क्यों मारी जाती हैं?
मेरे हेलमेट से टकराकर
और तेज़ रफ़्तार कार की विंड शील्ड से
किसी भागते धावक से
तितलियों की हत्या होती है –
जैसे कुत्ते, बिल्ली,
भैंस, गाय, नीलगाय,
आदमी, औरत, बच्चे
मक्खी और मेंढक
खत्म होते हैं पार होते हुए

क्या यह आत्महत्याहै ?
क्या यह हादसा है ?
अगर यह हादसा है
तो क्यों है ?

 

प्रेम कविताएँ

क्या –
हर बार के हादसों के लिए
उछाली गयी कविताओं में
प्रेम हो सकता है?

क्या –
दूब उखाड़ने में खोयी
माँ को याद हैं
प्रेम की परिभाषाएँ ?

क्या –
घुप्प वन के भीतर
काँपतें खड़े लड़के की चुप्पी में
प्रेम के चिन्ह बचे हैं?

क्या होता ? जब –
प्रेम की वसंती हवाएँ
मर्ज़ी पर हंसा करती
और
बोझ भरे शहरों की
दबी सड़कें सुबकती

प्रेम की बारिश में!

यात्रियों के भटके पैरों तले
धूल हुए रास्तों के लिए
कितने शब्द झूठे पड़ते
प्रेम किस्से बनने में !

सवाल –
प्रेम कविताएँ-
अब भी क्यों लिखी जाती हैं?
क्यों लिखी जाती हैं?
हर बार के हादसों से बचकर
छिपकर शायद
अखबारी दुःखों से
कई बावले अब भी
लिखते क्यों हैं
प्रेम कविताएँ ?

स्वछंद आत्माओं और
अकड़ी मशीनों के बढ़ते
रोज़गार और
ट्रेन के पहिये नीचे
कई गांवों के प्रेमी
अब भी क्यों भागते हैं – मरने प्रेम में?

कोई बावला
रहता है प्रेम उठानों की खोज में,
भटके हुओं में दिलचस्पी
से उपजी प्रेम कविताओं को
अब भी क्यों पढ़ा जाता है?
इनमें नया क्या है?
इनमें नया क्या हो सकता है?

 

अंधेड़

इस तरह आया
रात का अंधेड़
खेत और कच्चे रास्तों की धूल और
बिदरो का सूखापन लेकर
चिमनियों की ताज़ी बू लेकर –

कुत्ते चिल्लाते हैं
गीदड़ों की मरियल हूऊऊऊउ
राणी गायों और डरपोक रोज़ों के
सिकुड़ते जिस्मों से आवाज़ आ रही है –

जिंदा रहने का भरोसा
और कवायद जारी है
धुँआ होती जमीनों में
खाली होते गाँव में –

 

कीकर-1

कीकर उगाई नहीं जाती
उनमें जिद्द है
जनने, जन्मने और
ऊँचें बढ़ते जाने की
वे बस उग जाती हैं –

पानी की तलाश में
मिट्टी में जडें धंसाती हुई
ठेठ लू और पौ से बचकर
हासिल कर लेती हैं नुकीले कांटें –

जीवन की इस जदोजहद में –

कांटें
चुभ जाते हैं
किसी बेपरवाह की ऐड़ी में
किसी कातिल की उंगुलियों में
जो कीकर पर दरात चलाना चाहता है .

कीकर 2

माँ ने सारी गर्मियां ढोया है तुम्हें –

रोटी से परे
सर्दियों में आंच
चूल्हे की आसक्ति
छत पर पड़ा ईंधन हो –

पिता के गंवारू महकमे में
ओहदे का अभिमान
अलोना दातुन
खेत की बाड़
किनारे पर खड़ा कबाड़ हो –

इतने जिद्दी
जैसे कीकर हो !

 

खेत की चोरी और स्मृतियाँ

 

हथेलियों में पसीजते हैं बीज, और
भीतर सुनहरी रिसती जाती है,
हरे से सुनहरी होती नसें, और
जड़ें फैलती जाती हैं,

गात जमीन हो गया है –

मैं,
गेहूं के नन्हे पौधों से
ओंस की नन्ही बूँदें सोखता हूँ
बूंदों पर धुल चिपकी है
यूँ मेरे भीतर
मिट्टी बढती जाती है –

ये,
बीजों के उबलने
अंकुरों के चटकने और
सहेजने – समेटने का जिक्र नहीं
ये मेहनत को समर्पित
कविता भी नहीं
ये मात्र एक सुचना है –

‘खेत चोरी हो गया है.’

चमकीली तारों, डरावों और
कीकरों की घेराबंदी
लेकिन
सिर्फ बाड़ के भरोसे ही नहीं
रात-दिन, प्रत्येक क्षण की
ठिठुरती, झुलसती, भीगती
पहरेदारी भी,

मगर खेत चोरी हो गया –

किसी परायी मेढ़ पर बैठकर
कीड़नाल को देखते हुए
मेरी आँखे मुंदती हैं
मैं स्मृतियों का शिकार होता हूँ –

बचपन की कुकड़ी
घुटने – घुटने पानी में
आदमी से ऊँची
सड़ती ज्वार देखता हूँ
चिड़ियाओं की लुटी हुई
बाजरे की बालियाँ
बाड़ में उलझा हुआ
सफ़ेद – स्लेटी धुंध में
चोर का सफ़ेद कुरता
उसके हाथ में रोते हुए
कच्चे चने के पौधे
हाथ में कान से ऊँचा लठ्ठ होने के बावजूद
उसे बक्श देता हूँ –

जेठ की दोपहरी में
अंधड़ में भटकी
बारिश की बदमाश बूँदें
धरती चूस लेती है, और
चैत की तमाम कोशिशों से बचा
मरियल सा, पीला पड़ चुका
गेहूं का एक पौधा
खेत के एक कोने में
बे-उम्मीद खड़ा है –
वो मशीनों से बच गया
जिसे नीलगायों और राणी गायों ने भी छोड़ दिया
गेहूं के इस पौधे का
जन्म व्यर्थ गया –

एक लाल ट्रक्टर भी
समय पर अपना हक़ रखता है
उदास जंग खाया सही
मगर अभी खड़ा है
ट्रक्टर चल सकता है
मगर, खेत चोरी हो गया है –

कस्सी और फावड़े
लाल – नीली – हरी – भूरी
नुकीली कटीली गोल
मशीने मायूस पड़ी हैं –
दराती के निशान
उँगलियों पर और
टखनों पर नील चिपके हैं
मैं गिनने की कोशिश करता हूँ
एक
दो
तीन … तभी
आँख में छुपे
तुड़े के तिनके
मचलने लगते हैं

सरसों में दुबके पड़ा
नीलगायों का झुंड
पीले फूलों से बाहर आता है –
उनके सख्त लेकिन छोटे खुरों तले
मिट्टी दबती है
वे कहीं कहीं फसलों की गर्दन उखाड़ लेते हैं –

लेकिन एक तस्वीर स्थायी है
उदास थकी अधेड़ औरत
परिवर्तित नहीं होती
वो ओढने में बथुआ भरने लगती है
ओढने से बथुए के गुच्छे नीचे गिरते ही
माँ, झुंझला उठती है

हथेलियों में पसीजते बीज
गोद से कूदते शिशु की तरह
मिट्टी चाहते हैं,

बीज हमेशा मिट्टी चाहते हैं
मगर खेत चोरी हो गया है –

ये सत्य ही –
कि बीज मिट्टी चाहते हैं
मगर
मेरा खेत चोरी हो गया है

(कवि अमित ओहलाण का जन्म – 21 अक्टूबर 1985 को हरियाणा के रोहतक जिले में गाँव नयाबाँस में हुआ, बचपन नानी के पास पांची जाटान गाँव में बीता और वहीं आरंभिक शिक्षा हुई। उसके बाद सोनीपत से ग्रेजुएट, जामिया से पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन में पोस्ट ग्रेजुएशन का कोर्स किया। अमित ओहलाण कथा के इलाके में सक्रिय एक कर्मठ, लेकिन शोर से दूर रचनाकार हैं. कविताएँ भी लिखते हैं. इनका एक उपन्यास ‘मेरा यार मरजिया’ शीर्षक से गए बरस प्रकाशित हुआ है. टिप्पणीकार विपिन चौधरी समकालीन स्त्री कविता का एक चर्चित नाम हैं.)

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